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B'Day Special : अमरोहा की कलम ने यूसुफ को बना दिया सलीम
अभिनव चौहान, मुरादाबाद
Updated Mon, 11 Dec 2017 02:02 PM IST
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mughal-e-azam
- फोटो : demo
बाॅलीवुड के इतिहास को जब भी याद करेंगे तो एक नाम ऐसा होगा जिसके बिना इतिहास अधूरा होगा। या यूं कहें कि इतिहास दो हिस्सों में लिखा जाएगा। एक दिलीप साहब से पहले और एक दिलीप साहब के बाद, और ये बात शताब्दी के महानायक अमिताभ बच्चन ने कही थी।
युसूफ खान यानी दिलीप कुमार साहब का नाम आए तो सबसे पहले जहन में एक ही शब्द आता है - सलीम। सलीम जो हिंदुस्तान सिने जगत का वो किरदार है जिससे देखकर लोगों ने अभिनय सीखा है। सलीम जिसने भारतीय सिने जगत को एक नई तरह की शक्ल दी। एक पहचान दी। लेकिन जब सलीम की पहचान की हम बात करते हैं तो सबसे पहले जहन में आता है एक नाम जिसने सलीम को शक्ल दी, पहचान दी। वो नाम है कमाल अमरोहवी।
कमाल अमरोहवी यूपी के अमरोहा के रहने वाले थे। वही अमरोहा जो अपने आम और रोहू मछली के लिए जाना जाता है। लेकिन उसके अलावा उसकी पहचान हुई कमाल अमरोहवी से, जाॅन एलिया से, रईस अमरोहवी जैसे नामों से, जिसने अदबी इदारे में उसका झंडा बुलंद किया।
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कमाल अमरोहवी अपनी पहचान बनाने के लिए अमरोहा से बंबई गई। वो बंबई जो अब मुम्बई, लेकिन उन दिनों सपनों की नगरी होता था। उन्होंने विश्व प्रसिद्ध फिल्म मुगल-ए-आजम के लिए अकबर तो चुन लिया था, लेकिन उस दमदार अभिनेता के सामने एक ऐसे अभिनेता की जरूरत थी, जो उस नम्र दिल शहजादे का किरदार निभा सके जो बगावत भी कर सके और मोहब्बत भी। और उस किरदार के लिए चुना गया यूसुफ खान यानी दिलीप साहब को।
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युसूफ खान यानी दिलीप कुमार साहब का नाम आए तो सबसे पहले जहन में एक ही शब्द आता है - सलीम। सलीम जो हिंदुस्तान सिने जगत का वो किरदार है जिससे देखकर लोगों ने अभिनय सीखा है। सलीम जिसने भारतीय सिने जगत को एक नई तरह की शक्ल दी। एक पहचान दी। लेकिन जब सलीम की पहचान की हम बात करते हैं तो सबसे पहले जहन में आता है एक नाम जिसने सलीम को शक्ल दी, पहचान दी। वो नाम है कमाल अमरोहवी।
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कमाल अमरोहवी यूपी के अमरोहा के रहने वाले थे। वही अमरोहा जो अपने आम और रोहू मछली के लिए जाना जाता है। लेकिन उसके अलावा उसकी पहचान हुई कमाल अमरोहवी से, जाॅन एलिया से, रईस अमरोहवी जैसे नामों से, जिसने अदबी इदारे में उसका झंडा बुलंद किया।
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कमाल अमरोहवी अपनी पहचान बनाने के लिए अमरोहा से बंबई गई। वो बंबई जो अब मुम्बई, लेकिन उन दिनों सपनों की नगरी होता था। उन्होंने विश्व प्रसिद्ध फिल्म मुगल-ए-आजम के लिए अकबर तो चुन लिया था, लेकिन उस दमदार अभिनेता के सामने एक ऐसे अभिनेता की जरूरत थी, जो उस नम्र दिल शहजादे का किरदार निभा सके जो बगावत भी कर सके और मोहब्बत भी। और उस किरदार के लिए चुना गया यूसुफ खान यानी दिलीप साहब को।
दिलीप साहब की ससुराल थी अमरोहा
dilip kumar and saira bano
मुगले आजम के रिलीज के बाद दिलीप साहब कई बार मुरादाबाद के क्षेत्र में आए। उन दिनों अमरोहा, संभल दोनों मुरादाबाद का ही हिस्सा थे। रामपुर रियासत होने की वजह से अलग जिला था। इस पूरे क्षेत्र से दिलीप साहब का अलग लगाव था।
संभल में वो दो बार आए 1967 और 1972 में दोनों बाद मुशायरे में शिरकत करने। यहां अपनी गजल सुनाई और खूब वाहवाही लूटी। मुशायरा मुनकिद किया गया था संभल की लाइब्रेरी की ओर से। आजाद हिंद फौज के अफसर शहनवाज खान भी उनके साथ आए थे। उन्होंने अपनी किताब में संभल और उसके कबाब की लज्जत का जिक्र भी किया है।
अमरोहा से उनका लगाव इस वजह से था कि कमाल अमरोहावी का शहर था। मुगल-ए-आजम रिलीज हो चुकी थी और कमाल अमरोहवी और दिलीप साहब का रिश्ता मजबूत बन चला था। कमाल साहब ने जब मीना कुमारी से निकाह किया तो वह अमरोहा में अपने पुश्तैनी घर में उन्हें लेकर आए, उसी समय दिलीप साहब उनके घर आए।
इस कहानी को बचपन की याद दिलाने वाले कुछ लोग अभी अमरोहा में जिंदा हैं। हां अमरोहा एक वजह से उन्हें और प्रिय था और वो वजह है उनका ससुराल। दरअसल सायराबानो का ननिहाल अमरोहा के कस्बे हसनपुर का है। उन दिनों हसनपुर नवाब जागीर थी। और सायरा बानों की नानी नवाब दरबार की गायिका थीं। उनकी मां भी यहां रहीं, बाद में वह दिल्ली चली गईं। लेकिन सायरा बानों के नाम लिखी जमीन और आम के बाग आज भी उन्हीं के नाम हैं। पिछले कई अरसे से वो यहां नहीं आईं। लेकिन देखरेख के लिए जरूर एक व्यक्ति रहता है।
रामपुर के नवाब मिक्की मियां से दिलीप साहब का गहरा याराना था। वो अक्सर कांग्रेस के पक्ष में रामपुर में प्रचार के लिए आए थे। नवाब मिक्की मियां उनका हमेशा एहतराम करते थे, क्योंकि उनकी बदौलत लोग उन्हें काफी वोट देते थे। मिक्की मियां के गुजर जाने के बाद बेगम नूरबानों के पक्ष में भी रामपुर में दिलीप साहब चुनाव प्रचार के लिए आए।
अमरोहा इसलिए दिलीप साहब को याद रहता है, क्योंकि यहीं की कलम से उनके लिए एक किरदार लिखा गया। वो किरदार तो हिंदुस्तान सिने जगत का एक मयार है। आज भी कई जगह भारी आवाज में एक झटके में आप किसी को कहें - सलीम। तो अनायास ही दिलीप साहब की शक्ल और वो बगावती तेवर सामने आ जाता है जो अपनी अनारकली के लिए शहंशाह-ए-हिंदुस्तान से लड़ने से भी नहीं कतराया।
संभल में वो दो बार आए 1967 और 1972 में दोनों बाद मुशायरे में शिरकत करने। यहां अपनी गजल सुनाई और खूब वाहवाही लूटी। मुशायरा मुनकिद किया गया था संभल की लाइब्रेरी की ओर से। आजाद हिंद फौज के अफसर शहनवाज खान भी उनके साथ आए थे। उन्होंने अपनी किताब में संभल और उसके कबाब की लज्जत का जिक्र भी किया है।
अमरोहा से उनका लगाव इस वजह से था कि कमाल अमरोहावी का शहर था। मुगल-ए-आजम रिलीज हो चुकी थी और कमाल अमरोहवी और दिलीप साहब का रिश्ता मजबूत बन चला था। कमाल साहब ने जब मीना कुमारी से निकाह किया तो वह अमरोहा में अपने पुश्तैनी घर में उन्हें लेकर आए, उसी समय दिलीप साहब उनके घर आए।
इस कहानी को बचपन की याद दिलाने वाले कुछ लोग अभी अमरोहा में जिंदा हैं। हां अमरोहा एक वजह से उन्हें और प्रिय था और वो वजह है उनका ससुराल। दरअसल सायराबानो का ननिहाल अमरोहा के कस्बे हसनपुर का है। उन दिनों हसनपुर नवाब जागीर थी। और सायरा बानों की नानी नवाब दरबार की गायिका थीं। उनकी मां भी यहां रहीं, बाद में वह दिल्ली चली गईं। लेकिन सायरा बानों के नाम लिखी जमीन और आम के बाग आज भी उन्हीं के नाम हैं। पिछले कई अरसे से वो यहां नहीं आईं। लेकिन देखरेख के लिए जरूर एक व्यक्ति रहता है।
रामपुर के नवाब मिक्की मियां से दिलीप साहब का गहरा याराना था। वो अक्सर कांग्रेस के पक्ष में रामपुर में प्रचार के लिए आए थे। नवाब मिक्की मियां उनका हमेशा एहतराम करते थे, क्योंकि उनकी बदौलत लोग उन्हें काफी वोट देते थे। मिक्की मियां के गुजर जाने के बाद बेगम नूरबानों के पक्ष में भी रामपुर में दिलीप साहब चुनाव प्रचार के लिए आए।
अमरोहा इसलिए दिलीप साहब को याद रहता है, क्योंकि यहीं की कलम से उनके लिए एक किरदार लिखा गया। वो किरदार तो हिंदुस्तान सिने जगत का एक मयार है। आज भी कई जगह भारी आवाज में एक झटके में आप किसी को कहें - सलीम। तो अनायास ही दिलीप साहब की शक्ल और वो बगावती तेवर सामने आ जाता है जो अपनी अनारकली के लिए शहंशाह-ए-हिंदुस्तान से लड़ने से भी नहीं कतराया।