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Exclusive: ‘थिएटर डिटॉक्स जैसा लगता है’, बदलते दौर में नाटक की अहमियत पर श्वेता त्रिपाठी ने साझा की खास बातें

Mon, 01 Jun 2026 07:00 AM IST
Kiran Vinod Kumar Jain Kiran Vinod Kumar Jain
Updated Mon, 01 Jun 2026 07:00 AM IST
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सार
Shweta Tripathi Exclusive Interview: ‘मिर्जापुर’ सीरीज फेम अदाकारा श्वेता त्रिपाठी फिल्मों और ओटीटी की दुनिया का जाना-माना नाम बन चुकी हैं। लेकिन थिएटर को लेकर अपने प्यार को वह भूली नहीं हैं। इन दिनों वह अपने एक नए नाटक ‘एक्सटर्नल अफेयर्स’ को लेकर चर्चा में हैं। इस नाटक और करियर को लेकर कई बातें श्वेता त्रिपाठी ने अमर उजाला के साथ साझा की हैं।
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Shweta Tripathi Exclusive Interview Actress Talk About Her New Theatre Show External Affairs And Career
श्वेता त्रिपाठी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मोबाइल स्क्रीन, रील्स और कुछ सेकंड में भटकते मन के इस दौर में थिएटर करना आसान नहीं है। लोग अब लंबी बातचीत से बचते हैं, चुप्पी से बचते हैं। सबसे ज्यादा खुद के साथ अकेले रहने से बचते हैं। ऐसे समय में अभिनेत्री श्वेता त्रिपाठी अपने नए नाटक ‘एक्सटर्नल अफेयर्स’ के जरिए रिश्तों, भावनाओं और इंसानी जुड़ाव की बात कर रही हैं। हाल ही में अमर उजाला डिजिटल से की गई खास बातचीत में श्वेता त्रिपाठी ने बताया कि आज थिएटर सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं बल्कि लोगों के लिए एक जरूरी अनुभव बनता जा रहा है। पढ़िए श्वेता त्रिपाठी से हुई बातचीत के प्रमुख अंश- 

श्वेता त्रिपाठी
श्वेता त्रिपाठी - फोटो : इंस्टाग्राम@ battatawada

हमने खुद को बोर होने देना बंद कर दिया है
अपने नए नाटक के बारे में श्वेता त्रिपाठी कहती हैं, ‘आज हम कहीं भी हों, डॉक्टर के पास, स्टेशन पर या घर पर, दो मिनट खाली मिलते ही फोन उठा लेते हैं। हमने खुद को बोर होने देना बंद कर दिया है। हमें लगता है कि हम फोन पर प्रोडक्टिव हैं। लेकिन असल में हमारा दिमाग हर वक्त इधर-उधर भाग रहा होता है। पहले लोग बैठकर चीजों को महसूस करते थे, अब हर चीज जल्दी चाहिए। ऐसे समय में थिएटर बहुत जरूरी हो जाता है, क्योंकि यहां आप एक कहानी के साथ बैठे होते हैं। आप लोगों के साथ मिलकर हंसते हैं, चुप होते हैं, असहज महसूस करते हैं। आज किसी से कहना कि अगले 90 मिनट फोन मत देखो, तो यह एक क्रांतिकारी बात हो जाएगी।’

अब लोग सुनने से ज्यादा बोलने लगे हैं
श्वेता आगे कहती हैं, ‘आज लोग सोशल मीडिया पर बहुत जुडे़ हैं लेकिन भावनात्मक रूप से दूर होते जा रहे हैं। लोगों के पास बोलने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन सुनने की क्षमता कम हो गई है। मानसिक रूप से भी हम बहुत बिखर चुके हैं। थिएटर उस रुकावट को तोड़ता है। वहां कोई एडिट नहीं है, कोई कट नहीं है, कोई एल्गोरिदम नहीं है। वहां सिर्फ असली इंसान हैं। एक साझा अनुभव है। मुझे लगता है कि आज साथ बैठकर कुछ महसूस करना ही हीलिंग बन गया है। साथ हंसना, अजीब चुप्पी महसूस करना, असहज होना, ये सब अब असल जिंदगी में कम होता जा रहा है। शायद इसलिए थिएटर अब सिर्फ कला नहीं बल्कि इमोशनल डिटॉक्स जैसा लगता है।’ 

श्वेता त्रिपाठी
श्वेता त्रिपाठी - फोटो : इंस्टाग्राम@ battatawada

नाटक में दिखेगी रिश्तों और इंसानी भावनाओं की कहानी  
अपने नए नाटक ‘एक्सटर्नल अफेयर्स’ के बारे में बात करते हुए श्वेता हंसते हुए कहती हैं, ‘पहली बार जब मैंने यह नाम सुना था, मैं भी उत्साहित और उलझन दोनों में थी। लगा था कि शायद कोई राजनीतिक कहानी होगी, लेकिन यह नाटक असल में रिश्तों और इंसानी भावनाओं की कहानी है। आज डेटिंग ऐप्स हैं, तुरंत बातचीत है, बहुत सारे विकल्प हैं, लेकिन असली इंसानी जुड़ाव कम हो गया है। हम आपस में जुड़ बहुत रहे हैं, लेकिन एक-दूसरे को समझ कम पा रहे हैं। मुझे लगता है कि आज रिश्ते परीक्षा जैसे हो गए हैं। प्रश्नपत्र कुछ और निकल आता है और हम तैयारी किसी और चीज की करके बैठे होते हैं।’

पति के साथ साझा किया नाटक का मंच 
शादी के बाद पहली बार पति चैतन्य के साथ मंच साझा करने को लेकर श्वेता कहती हैं, ‘हम दोनों के काम करने का तरीका बहुत अलग है। चैतन्य बहुत अनुशासित अभिनेता हैं। वह डायलॉग पर बहुत काम करते हैं। मैं बिल्कुल उलट हूं। मैं पहले किरदार की भावनाएं पकड़ती हूं और डायलॉग बाद में। कई बार मैं डायलॉग टालती रहती हूं और वो पहले से पूरी तैयारी करके बैठे होते हैं। लेकिन अच्छी बात यह है कि हमारे तरीके अलग होने की वजह से हम लगातार एक-दूसरे से सीखते रहते हैं। जब कोई जोड़ा साथ में आगे बढ़ता है, तो वह तरक्की दोगुीनी हो जाती है।’ 

श्वेता त्रिपाठी
श्वेता त्रिपाठी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

थिएटर में गलती छुप नहीं सकती है
थिएटर और कैमरे के फर्क पर श्वेता कहती हैं, ‘कैमरे में दोबारा मौका मिल सकता है, बाद में चीजें ठीक की जा सकती हैं लेकिन मंच पर अगर आप एक पल के लिए भी डगमगाए, तो दर्शक उसे तुरंत महसूस कर लेते हैं। थिएटर की ऑडियंस सिर्फ देखती नहीं, जीती है। अगर कोई जोर से हंसता है, ताली बजती है या चुप्पी छा जाती है, तो वह एनर्जी  पूरे कमरे में फैलती है। खासकर छोटे थिएटर स्पेस में लोग बिल्कुल पास-पास बैठे होते हैं। यही चीज थिएटर को बाकी प्लेटफार्म से अलग बनाती है।’  

श्वेता त्रिपाठी
श्वेता त्रिपाठी - फोटो : इंस्टाग्राम@battatawada

आज थिएटर के लिए सबसे बड़ा चैलेंज लोगों का वक्त है
थिएटर के भविष्य पर बात करते हुए श्वेता कहती हैं, ‘आज हर चीज लोगों का ध्यान मांग रही है। रील्स, फिल्में, म्यूजिक,  सोशल मीडिया हर कोई आपके फोन पर है। थिएटर के पास बड़े मार्केटिंग बजट नहीं होते हैं। ऐसे में लोगों के बीच बातचीत और माउथ पब्लिसिटी के जरिए पहुंचने वाली चर्चा बहुत जरूरी हो जाती है। कई बार लोगों को पता ही नहीं होता कि कोई अच्छा नाटक चल भी रहा है। लेकिन साथ ही मुझे लगता है कि थिएटर को लोगों तक पहुंचाने के लिए उसे पूरी तरह सोशल मीडिया वाला कंटेंट बना देना भी सही नहीं है। थिएटर की अपनी एक सच्चाई और अलग खूबसूरती है, वही बची रहनी चाहिए।

अपने पति के साथ श्वेता त्रिपाठी
अपने पति के साथ श्वेता त्रिपाठी - फोटो : सोशल मीडिया

थिएटर ने मुझे में मेरा जीवनसाथी भी दिया
बातचीत के आखिर में श्वेता मुस्कुराते हुए कहती हैं, ‘थिएटर ने मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत कुछ दिया है। यहां तक कि मेरी और मेरे पति की मुलाकात भी एक नाटक की वजह से हुई थी। थिएटर आपको सिर्फ अभिनय करना नहीं सिखाता, वह आपको सुनना, महसूस करना, वर्तमान में रहना और लोगों से सच्चे तरीके से जुड़ना सिखाता है। आज लोग कंटेंट बहुत कंज्यूम कर रहे हैं, लेकिन शायद महसूस कम कर रहे हैं। थिएटर वही फीलिंग वापस लाता है।’  


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