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‘ग्रेट ग्रैंड सुपरहीरो’ को ऑस्कर के लिए भेजना चाहते हैं मनीष, बताया क्यों भारतीय फिल्मों को समर्थन नहीं मिलता
Mon, 24 Aug 2026 07:00 AM IST
किरण जैन
एंटरटेनमेंट डेस्क,अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क,अमर उजाला
Published by: किरण जैन
Updated Mon, 24 Aug 2026 07:00 AM IST
सार
Manish Saini Interview: निर्देशक मनीष सैनी ने फिल्म 'द ग्रेट ग्रैंड सुपरहीरो' को ऑस्कर की रेस में शामिल करने पर प्रतिक्रिया दी। जानें अमर उजाला के खास बातचीत में क्या बोले मनीष…
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मनीष सैनी, निर्देशक
- फोटो : अमर उजला
विस्तार
फिल्मकार मनीष सैनी तीन बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुके हैं। अब वह अपनी फिल्म द ग्रेट ग्रैंड सुपरहीरो को ऑस्कर के लिए भेजना चाहते हैं। मनीष खुद 2022 में फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया (FFI) की उस जूरी में शामिल थे, जो ऑस्कर के लिए भारत की फिल्म चुनती है।
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मनीष सैनी, निर्देशक
- फोटो : सोशल मीडिया
‘ऑस्कर के लिए मन लालची होता है’
अमर उजाला डिजिटल से बातचीत के दौरान, अपनी फिल्म को ऑस्कर के लिए भेजने की इच्छा पर मनीष कहते हैं, ‘जी बिल्कुल। मैं खुद एक बार ऑस्कर के लिए भारत की तरफ से फिल्म चुनने वाली जूरी का हिस्सा रहा हूं। ऑस्कर के लिए मन लालची होता है। लेकिन मैंने कभी ऑस्कर के लिए फिल्म नहीं बनाई।
उसका अपना तरीका है। वहां भारत को एक खास नजर से देखा जाता है। यह हमारे देश का पुरस्कार नहीं है। यह हॉलीवुड का बड़ा पुरस्कार है। फिर भी कोशिश करेंगे। अगर यह बहुत जड़ से जुड़ी भारतीय फिल्म है तो उसे भेजने में कोई बुराई नहीं है। प्रतियोगिता में हिस्सा लेने में भी कोई बुराई नहीं है।’
'हम उम्मीद रखेंगे और कोशिश भी करेंगे'
वह कहते हैं, ‘लेकिन मैं बहुत ज्यादा उम्मीद लेकर नहीं चलता। कई बार चीजें होती हैं, कई बार नहीं होतीं। फिर आपको अपने काम पर शक होने लगता है। हर बार एक जैसा नहीं हो सकता। मछली उड़ नहीं सकती और कुछ पक्षी तैर नहीं सकते। हम उम्मीद तो रखेंगे और कोशिश भी करेंगे। लेकिन जो होगा, देखा जाएगा। बतौर निर्देशक मेरा काम इतना है कि हमने जितनी कोशिश कर सकते थे, उतनी अच्छी फिल्म बनाई।’
अमर उजाला डिजिटल से बातचीत के दौरान, अपनी फिल्म को ऑस्कर के लिए भेजने की इच्छा पर मनीष कहते हैं, ‘जी बिल्कुल। मैं खुद एक बार ऑस्कर के लिए भारत की तरफ से फिल्म चुनने वाली जूरी का हिस्सा रहा हूं। ऑस्कर के लिए मन लालची होता है। लेकिन मैंने कभी ऑस्कर के लिए फिल्म नहीं बनाई।
उसका अपना तरीका है। वहां भारत को एक खास नजर से देखा जाता है। यह हमारे देश का पुरस्कार नहीं है। यह हॉलीवुड का बड़ा पुरस्कार है। फिर भी कोशिश करेंगे। अगर यह बहुत जड़ से जुड़ी भारतीय फिल्म है तो उसे भेजने में कोई बुराई नहीं है। प्रतियोगिता में हिस्सा लेने में भी कोई बुराई नहीं है।’
'हम उम्मीद रखेंगे और कोशिश भी करेंगे'
वह कहते हैं, ‘लेकिन मैं बहुत ज्यादा उम्मीद लेकर नहीं चलता। कई बार चीजें होती हैं, कई बार नहीं होतीं। फिर आपको अपने काम पर शक होने लगता है। हर बार एक जैसा नहीं हो सकता। मछली उड़ नहीं सकती और कुछ पक्षी तैर नहीं सकते। हम उम्मीद तो रखेंगे और कोशिश भी करेंगे। लेकिन जो होगा, देखा जाएगा। बतौर निर्देशक मेरा काम इतना है कि हमने जितनी कोशिश कर सकते थे, उतनी अच्छी फिल्म बनाई।’
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मनीष सैनी
- फोटो : इंस्टाग्राम
‘फिल्म ऐसी हो, जिसे बाहर के लोग भी समझ सकें’
2022 में जूरी का हिस्सा रहे मनीष बताते हैं कि ऑस्कर के लिए फिल्म चुनते समय क्या देखा जाता है। वह कहते हैं, ‘जब मैं जूरी में था, तो मेरे लिए फिल्म चुनने का आधार यह था कि उसे बाहर के लोग भी समझ सकें। फिल्म का संदर्भ ऐसा हो कि दूसरे देशों के दर्शकों को भी समझ आए।’
वह आगे कहते हैं, ‘फिल्म पहले कहां-कहां दिखाई जा चुकी है, यह भी देखा जाता है। अगर फिल्म अलग-अलग फिल्म समारोहों में जा चुकी है तो उसका फायदा मिलता है। जैसे कई फिल्में कान में जीतती हैं और बाद में ऑस्कर में भी नॉमिनेशन पाती हैं। फिल्म कुछ अलग भी होनी चाहिए। ऐसी भारतीय फिल्म, जो अपनी कहानी और अंदाज में अलग हो, उसे वहां ज्यादा पसंद किए जाने की संभावना रहती है।’
2022 में जूरी का हिस्सा रहे मनीष बताते हैं कि ऑस्कर के लिए फिल्म चुनते समय क्या देखा जाता है। वह कहते हैं, ‘जब मैं जूरी में था, तो मेरे लिए फिल्म चुनने का आधार यह था कि उसे बाहर के लोग भी समझ सकें। फिल्म का संदर्भ ऐसा हो कि दूसरे देशों के दर्शकों को भी समझ आए।’
वह आगे कहते हैं, ‘फिल्म पहले कहां-कहां दिखाई जा चुकी है, यह भी देखा जाता है। अगर फिल्म अलग-अलग फिल्म समारोहों में जा चुकी है तो उसका फायदा मिलता है। जैसे कई फिल्में कान में जीतती हैं और बाद में ऑस्कर में भी नॉमिनेशन पाती हैं। फिल्म कुछ अलग भी होनी चाहिए। ऐसी भारतीय फिल्म, जो अपनी कहानी और अंदाज में अलग हो, उसे वहां ज्यादा पसंद किए जाने की संभावना रहती है।’
मनीष सैनी
- फोटो : इंस्टाग्राम
'भारतीय फिल्मों को समर्थन कम मिलता है'
ऑस्कर की वोटिंग प्रक्रिया समझाते हुए मनीष कहते हैं, ‘ऑस्कर के लिए पहले भारत से फिल्म भेजी जाती है। इसके बाद दुनिया भर में ऑस्कर की कमेटी के सदस्य उन फिल्मों के लिए वोट करते हैं। जिन फिल्मों को सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, वे नामांकन की दौड़ में आगे जाती हैं।’
वह बताते हैं कि इसमें वोटरों की संख्या भी काफी मायने रखती है। मनीष कहते हैं, ‘कई बार जिस देश के वोटर ज्यादा होते हैं, उसे थोड़ा फायदा भी मिल जाता है। जैसे जापान और अमेरिका में बहुत सारे वोटर हैं। उनके लिए अपने देश और वहां के संदर्भ को समझना आसान होता है। इसलिए वोटिंग में भी उसका फायदा मिल सकता है।’
भारत की फिल्मों के ऑस्कर तक न पहुंचने की वजह पर मनीष कहते हैं, ‘हम अक्सर सोचते हैं कि हमारी फिल्म ऑस्कर में क्यों नहीं जाती। इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में अच्छी फिल्में नहीं बनतीं। बहुत अच्छी फिल्में बनती हैं। लेकिन ऑस्कर के सिस्टम में हमें आगे जाकर उतना समर्थन नहीं मिल पाता।’
ऑस्कर की वोटिंग प्रक्रिया समझाते हुए मनीष कहते हैं, ‘ऑस्कर के लिए पहले भारत से फिल्म भेजी जाती है। इसके बाद दुनिया भर में ऑस्कर की कमेटी के सदस्य उन फिल्मों के लिए वोट करते हैं। जिन फिल्मों को सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, वे नामांकन की दौड़ में आगे जाती हैं।’
वह बताते हैं कि इसमें वोटरों की संख्या भी काफी मायने रखती है। मनीष कहते हैं, ‘कई बार जिस देश के वोटर ज्यादा होते हैं, उसे थोड़ा फायदा भी मिल जाता है। जैसे जापान और अमेरिका में बहुत सारे वोटर हैं। उनके लिए अपने देश और वहां के संदर्भ को समझना आसान होता है। इसलिए वोटिंग में भी उसका फायदा मिल सकता है।’
भारत की फिल्मों के ऑस्कर तक न पहुंचने की वजह पर मनीष कहते हैं, ‘हम अक्सर सोचते हैं कि हमारी फिल्म ऑस्कर में क्यों नहीं जाती। इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में अच्छी फिल्में नहीं बनतीं। बहुत अच्छी फिल्में बनती हैं। लेकिन ऑस्कर के सिस्टम में हमें आगे जाकर उतना समर्थन नहीं मिल पाता।’