'विलेज रॉकस्टार' क्षेत्रीय सिनेमा की उपलब्धि, करीब 3 दशक बाद मिला नेशनल अवॉर्ड
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इस वर्ष सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करने वाली असमिया फिल्म 'विलेज राॅकस्टार्स' एक बहुत प्रेरणीय और मर्मस्पर्शी फिल्म है। आमतौर पर सिनेमा का मतलब मुंबइया सिनेमा यानी बॉलीवुड, जिसे दर्शकों तक अच्छी फिल्में पहुंचाने का सार्थक उपक्रम मानते आए हैं। हालांकि, दूरदर्शन नेशनल अवाॅर्ड प्राप्त फिल्मों का प्रसारण बाद में करता है, लेकिन उसका बेहतर प्रचार-प्रसार नहीं हो पाता है।
अगर उसका प्रचार-प्रसार होता, तो निश्चित रूप से दर्शकों तक अच्छी फिल्मों की पहुंच और भी सुदृढ़ हो सकती थी। रीमा दास हमारे समय की, इस मायने में एक उल्लेखनीय फिल्मकार हैं, जिन्होंने इस फिल्म को बनाते हुए निर्माण, निर्देशन, कहानी, सम्पादन और सिने-छायांकन का भी दायित्व निर्वहन किया आैर बड़ी ही सादगी के साथ एक विलक्षण फिल्म अच्छे सिनेमा के चाहने वालों को सौंप दी है।
'विलेज राॅकस्टार' को टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ भारतीय फिल्म के रूप में चुना जा चुका है। वहीं कान फिल्म समारोह में इस फिल्म को खासी चर्चा मिली। पिछले साल गोवा में आयोजित अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में इस फिल्म को दर्शकों ने बहुत पसंद किया। रीमा ने लघु फिल्म के निर्माण से अपनी शुरुआत की थी। 2009 में बनाई उनकी फिल्म ‘प्रथा’ को बड़ी सराहना मिली।
जब 2016 में उन्होंने अपनी पहली फिल्म 'अंतर्दृष्टि' बनाई, तब उनको अच्छे काम और उसके प्रतिसाद दोनों का अवसर प्राप्त हुआ। यह एक ऐसे पिता की कहानी है, जिनको रिटायर होने पर उनका बेटा एक दूरबीन भेंट करता है। दूसरी फिल्म 'विलेज राॅकस्टार्स' पहली से एक कदम आगे इस दृष्टि से निकल गई कि इसमें सुदूर गांव, पिछड़े और अशांत राज्य में कहीं बचपन और किशोर उम्र के बच्चों के स्वप्न को पास जाकर, टटोलकर, उसे संवेदनशीलता के साथ छूकर देखने की कोशिश की गई है।
यह एक जुझारू लड़की धुनू की कहानी है, जिसे अपने साथियों के बीच एक बैंड स्थापित करने की ललक है। वह और उसके साथ वाले राॅकस्टार्स बनना चाहते हैं। टीवी और दूसरे साधनों से दूर देश की खबरें गांव तक आती हैं और धुनू अपने लक्ष्य को पक्का करती चली जाती है। अपनी ही तरह के गरीब बच्चों की संगत में उसका यह स्वप्न शनैः शनैः आकार ले रहा है, लेकिन इसमें भी बड़ी बाधाएं हैं।
धुनू की मां अनेक कठिनाइयों में अपना, उसका और अपने बेटे का पेट भर पा रही है। जिंदगी के साथ लड़ रही धुनू की मां को समय ने बहुत मजबूत बना दिया है। धुनू गिटार बजाना सीख रही है, वह अपनी टीम को भी सिखा रही है। कैसे उसके स्वप्न को परिवेश और लोग बाधित करते हैं, कैसे शिक्षा से वंचित सुदूर अंचल में वातावरण और लोगों के मानसिक अभिप्राय इस स्वप्न को पूरा करने में बाधक होते हैं, यह इस फिल्म में बहुत ही सच्चाई के साथ दिखाया गया है।
लगभग तीन दशक बाद एक बार फिर असमिया फिल्म को नेशनल अवाॅर्ड मिला है। इसके पहले 1989 में जाहनू बरुआ की फिल्म 'हालोधिया चैराये बाओधान खाई' को नेशनल अवाॅर्ड हासिल हुआ था।