Vikrant Rona Review: अनजाने के रहस्य को खोजती सुदीप की ‘विक्रांत रोणा’, पढ़िए कहां कमजोर पड़ी फिल्म
दक्षिण भारतीय सिनेमा के सितारों को हिंदी सिनेमा में लॉन्च करने में निर्देशक राम गोपाल वर्मा अतीत में काफी सक्रिय रहे हैं। साल 1990 में फिल्म ‘शिवा’ में वही तेलुगू सिनेमा के सितारे नागार्जुन को लेकर आए थे। कन्नड़ अभिनेता सुदीप को उन्होंने हिंदी सिनेमा में मौका दिया अपनी 2008 में रिलीज हुई फिल्म ‘फूंक’ में। सुदीप ने बाद में इसकी सीक्वल और फिल्म ‘रन’ के अलावा ‘रक्त चरित्र’ सीरीज की फिल्मों में भी काम किया। किच्चा उनके नाम का हिस्सा नहीं है। ये उनके नाम के साथ उनकी ही एक फिल्म में उनके किरदार को मिले नाम के बाद जुड़ा, वैसे ही जैसे विजय को दलपति विजय और रजनीकांत को थलाइवा रजनीकांत बुलाने की दक्षिण भारतीय सिनेमा में परिपाटी चली आ रही है। सुदीप पिछली बार सलमान खान की फिल्म ‘दबंग 3’ में दिखे थे। और, इसी फिल्म के आसपास बननी शुरू हुई थी रोमांच और फंतासी के घालमेल से निकली फिल्म ‘विक्रांत रोणा’।
50 साल पहले का चुलबुल पांडे
फिल्म ‘विक्रांत रोणा’ उस जमाने की काल्पनिक कहानी है जब देश में इतनी तरक्की नहीं हुई थी। जंगलों की बस्तियों के आसपास आदिवासियों का डेरा था। मोबाइल और टेलीविजन से दूर बच्चे समूह में बैठकर एक दूसरे को फंतासी कहानियां सुनाते थे और इंद्रजाल कॉमिक्स की ‘फैंटम’ सीरीज की किताबें बच्चे चाव से पढ़ते थे। फिल्म ‘विक्रांत रोणा’ का नाम भी पहले ‘फैंटम’ ही था। फैंटम के बारे में किवदंती है कि ये किरदार पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है। एक मरता है तो उसकी अगली पीढ़ी उसकी जगह ले लेती है। इस लिहाज से देखें तो हिंदी सिनेमा का चुलबुल पांडे भी विक्रांत रोणा का वंशज लगता है। कहानी एक पुलिस इंस्पेक्टर की है जो अपनी लापता बीवी और बच्चे की तलाश में घने जंगलों में बसे एक गांव में आता है और वहां लगातार हो रही बच्चों के अपहरण और हत्याओं की गुत्थी सुलझाता है। फंतासी लोक में रची गई इस मर्डर मिस्ट्री में और भी तमाम किरदार हैं और हत्याओं का शक एक से दूसरे पर घूमता रहता है।
कहानी ठीक, पटकथा में लोचा
निर्देशक अनूप भंडारी भी अपनी फिल्म के हीरो सुदीप की तरह इंजीनियरिंग से फिल्ममेकिंग में आए हैं। सलमान खान की फिल्म ‘दबंग 3’ के कन्नड़ संस्करण के गाने भी उन्होंने ही लिखे। अपनी फिल्मों के गाने तो खैर वह लिखते और गाते ही रहे हैं। अनूप भंडारी की फिल्म ‘विक्रांत रोणा’ मूल रूप से कन्नड़ में बनी और तमाम दूसरी भारतीय भाषाओं के साथ हिंदी में भी रिलीज हुई है। फिल्म थ्रीडी में है और कहानी की पृष्ठभूमि व भौगोलिक स्थिति के हिसाब से इसका थ्रीडी में बनाया जाना सही भी लगता है। फिल्म की कहानी भी अनूप ने अच्छी लिखी है, बस इसका फिल्मी विस्तार करने में अगर उन्होंने कुछ और लोगों की मदद ली होती तो नतीजा बेहतर होता। फिल्म की पटकथा शुरू में पकड़ बनाकर रखती है लेकिन एक बार हीरो का लक्ष्य निर्धारित हो जाने के बाद फिल्म भटकने लगती है। फंतासी फिल्म में मर्डर मिस्ट्री के साथ हॉरर के भी तत्व डाले गए हैं और ये दर्शकों को कई बार डराते भी हैं।
ओवरएक्टिंग का शिकार हुए सुदीप
फिल्म ‘विक्रांत रोणा’ अपनी पटकथा से तो मात खाती ही है, फिल्म के हीरो सुदीप का अभिनय भी इसमें खास मदद नहीं करता। वह चुलबुल पांडे की तरह ही पूरी फिल्म में बात करते हैं। बुजुर्गों के सामने सिगार पीना, बदतमीजी से पेश आना और अपने पूरे आभामंडल को एक देसी दारू के ठेके पर नाचने वाली के साथ ठुमके लगाकर तार तार कर देना विक्रांत रोणा के किरदार की कमजोरियां हैं। फिल्म का आधार जाति संघर्ष है। सवर्णों और दलितों के बीच के छुआछूत को लेकर उपजे इस संघर्ष के नतीजे में ही फिल्म का असली रहस्य छुपा है। कहानी 28 साल की यात्रा तय करती है और जिस एक बिंदु पर इस कहानी के खलनायक का बदला छुपा है, उसका संबंध हीरो की बच्ची के साथ स्थापित करने में नाकाम रहती है। इस बच्ची को लेकर भी फिल्म के क्लाइमेक्स में जो खुलासा होता है, वह दर्शकों के फिल्म की कहानी में समय निवेश का रिटर्न जीरो कर देता है।
फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी जैकलीन
फिल्म के अन्य कलाकारों में अधिकतर तो कन्नड़ सिनेमा के ही कलाकार हैं। निर्देशक अनूप भंडारी के भाई निरूप ने फिल्म में उस खोए बेटे का किरदार करने की कोशिश की है जो देवताओं के गहने चुराने के आरोप में घर से भागा और अब 28 साल बाद लौटा है। निरूप भंडारी में अभिनय की संभावनाएं दिखती हैं लेकिन उन्हें अभी चेहरे पर भावों को लाने में और मेहनत करनी होगी। नीता अशोक सुंदर दिखती है और इतना ही फिल्म में उनका काम भी है। वहीं, बचपन में बड़े भाई के सीने पर शिवा की तस्वीर का सेटअप बाद में सही तरीके से इसका पेबैक भी नहीं बन पाता है। फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी है इसमें जैकलीन फर्नांडीस का होना। सलमान या साजिद किसी फिल्म से जुड़ें और उसमें जैकलीन न हो, कम ही मुमकिन है। यहां फिल्म ‘विक्रांत रोणा’ में जैकलीन का किरदार न सिर्फ फिल्म की गति को कमजोर करता है बल्कि इस किरदार को रखने के चक्कर में एक दमदार किरदार विक्रांत रोणा भी छिछोरा दिखने लगता है।
देखें कि न देखें
फिल्म ‘विक्रांत रोणा’ तकनीकी रूप से एक बेहतर फिल्म है। फिल्म का कला निर्देशन शिव कुमार ने किया है और वह व उनकी टीम फिल्म का बेहतरीन वातावरण रचने में सौ फीसदी सफल रहे हैं। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी विलियम डेविड ने की है और वह भी कहानी का रस रचने में मददगार साबित होती है। कथा, पटकथा, निर्देशन और अभिनय में कमजोर रही फिल्म ‘विक्रांत रोणा’ का संगीत भी हिंदी दर्शकों की रुचि का नहीं है। इस फंतासी फिल्म को अगर ढंग से बनाया गया होता तो ये बच्चों और पारिवारिक दर्शकों के लिए एक कमाल की एडवेंचर फिल्म साबित हो सकती थी लेकिन सुदीप या कहें कि किच्चा सुदीप को चमकाने के चक्कर में फिल्म का असली रस बेस्वाद हो गया है। टाइमपास के लिए फिल्म देख सकते हैं लेकिन फिल्म देखने के लिए धैर्य की काफी जरूरत पड़ेगी।