क्या मुजफ्फरनगर में बैन होगी शोरगुल?
फिल्में सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं हैं। परंतु सच दिखाने का दावा करने वाली फिल्में अक्सर मुश्किल में पड़ जाती हैं। उड़ता पंजाब के विवाद के बाद कहा जा रहा है कि शुक्रवार को आने वाली शोरगुल यूपी के मुजफ्फरनगर में रिलीज नहीं हो सकेगी क्योंकि इसकी कहानी वहां 2013 में हुए दंगों की पृष्ठभूमि पर आधारित है।
कड़वी यादों को भूल पाना आसान नहीं होता। संभवतः यही वजह है क 2013 में हुए मुजफ्फपुरनगर दंगों पर आधारित बताई रही फिल्म शोरगुल वहां प्रदर्शित नहीं हो सकेगी। फिल्म वितरण से जुड़े सूत्रों के अनुसार जिला मजिस्ट्रेट के निर्देश पर सिनेमाघरों फिल्म न दिखाने के आदेश दिए गए हैं। सिनेमाघरों से कहा गया है कि प्राप्त जानकारी के अनुसार शोरगुल मुजफ्फरनगर दंगों पर आधारित संवेदनशील फिल्म है। इससे फिर दंगे भड़कने का डर है। अतः इसे न दिखाएं।
वैसे सरकारी सूत्रों ने ‘अमर उजाला’ से बातचीत में कहा कि ऐसी बात नहीं है। असल में सिनेमाघर मालिकों ने शोरगुल रिलीज करने से इंकार किया है ताकि किसी विरोध या तोड़फोड़ का शिकार न हों। मुजफ्फरनगर में करीब 40 सिनेमाघर हैं। फिल्म शुक्रवार को रिलीज होनी है। इसमें जिमी शेरगिल, आशुतोष राणा, संजय सूरी और नरेंद्र झा जैसे अभिनेता हैं। जितेंद्र कुमार और पी.सिंह ने फिल्म का निर्देशन किया है।
अभिनेताओं को आए धमकी भरे फोन
फिल्म से जुड़े सूत्रों के अनुसार ट्रेलर रिलीज होने के बाद निर्माता और अभिनेताओं को यूपी से धमकी भरे कॉल आए हैं और फिल्म के विरुद्ध कोर्ट में एक केस भी किया गया, जो वापस ले लिया गया। अमर उजाला से बातचीत में जिमी शेरगिल ने कहा है कि यह मूल रूप से एक लव स्टोरी है, जिसकी पृष्ठभूमि में दंगे हैं। जबकि ऐसा प्रचार किया जा रहा है कि फिल्म मुजफ्फरनगर दंगों पर केंद्रित है। फिल्म के ट्रेलर में धर्मगत संवाद काफी मुखर हैं और लोग चकित हैं कि फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) ने इन्हें कैसे हरी झंडी दिखा दी?
शोरगुल में कुछ किरदारों का लुक यूपी के प्रमुख नेताओं से मिलता जुलता दिखाया गया है और उनके नाम भी इन नेताओं की तर्ज पर मिथिलेश यादव, रंजीत ओम और आलिम खान रखे गए हैं। फिल्म के सह-निर्माता व्यास वर्मा के अनुसार, फिल्म में किसी घटना विशेष को नहीं दिखाया गया बल्कि यह उत्तर प्रदेश की पृष्ठभूमि में समाज का सच दिखाती है। उन्होंने निराशा जाहिर की कि अधिकारी फिल्म को मुजफ्फरनगर में प्रदर्शित होने से रोक रहे हैं। वर्मा के अनुसार क्या मुजफ्फरनगर के लोगों को यह देखने का हक नहीं कि देश में क्या हो रहा है?
उत्तर प्रदेश में फिल्मों पर प्रतिबंध की है लंबी कहानी
इसी साल समलैंगिक संबंधों की कहानी कहने वाली फिल्म अलीगढ़ पर आधिकारिक प्रतिबंध तो नहीं लगा लेकिन यूपी के शहर अलीगढ़ में ही यह रिलीज नहीं हुई। कहा गया कि वहां इसका खूब विरोध है। शहर की मेयर और मुस्लिम संगठनों का कहना था कि उनका विरोध फिल्म से नहीं बल्कि टाइटल से है। जो शहर को बदनाम करता है।
फिल्में जिनपर यूपी में लगा प्रतिबंध
आजा नच ले (2007): फिल्म के टाइटल गीत में एक दलित जाति का संबोधन था, जिस पर विवाद हुआ और फिल्म की रिलीज रोकी गई। गीत के बोल बदले और निर्माताओं ने माफी मांगी तब फिल्म रिलीज हुई।
जोधा अकबर (2008): बादशाह अकबर और उनकी पत्नी जोधाबाई के जीवन की इस कहानी का राजपूत संगठनों ने विरोध किया और रिलीज के अगले दिन फिल्म की स्क्रीनिंग रोक दी गई। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हटा प्रतिबंध।
आरक्षण (2011): नौकरियों में आरक्षण के मुद्दे पर बनी इस फिल्म को यूपी सरकार ने दो महीने के लिए प्रतिबंधित किया। कुछ अन्य राज्यों में भी विरोध हुआ और प्रतिबंध लगा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद फिल्म रिलीज।
गोलियों की रासलीलाः राम-लीला (2013): संजय लीला भंसाली की फिल्म का नाम राम-लीला था। यूपी में टाइटल का विरोध हुआ। इसे धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला बताया गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फिल्म पर प्रतिबंध का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा ऐन मौके पर नाम बदलने के निर्देश के साथ फिल्म रिलीज हो सकी।
निशब्द (2007): निर्देशक रामगोपाल वर्मा की इस फिल्म में एक बूढ़े व्यक्ति के किशोरवय युवती से प्रेम संबंध दिखाए गए थे। कांग्रेस के सदस्यों ने फिल्म को संस्कृति के विरुद्ध बताते हुए इसका जबर्दस्त विरोध किया और बैन की मांग की। परंतु फिल्म रिलीज हुई।