रामगढ़ वालों के जेहन में आखिर कितनी बची है 'शोले' की यादें
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रामगढ़ बदल गया है। न वे रास्ते दिखाई देते हैं, जहां जय-वीरू दोस्ती का तराना गाते थे, न वह डगर जहां बसंती तांगा दौड़ाती थी। बस कुछ चिपरिचित पहाड़ दिखाई देते हैं, पर वहां ठाकुर की हवेली नहीं दिखती, वह मस्जिद, शिव मंदिर, पानी टंकी और वे आम के पेड़ नहीं दिखते। शोले के नाम पर बचे-खुचे उन पहाड़ों का चौकीदार सागर कहता है कि रामगढ़ ढूंढ़ना है तो पहले शिवलिंगैय्या को ढूंढ़ो। वह सब जानता है...
दो लाख से ज्यादा आबादी वाला रामनगरम अब जिला हो गया है। सुविधाओं के मामले में यह किसी आधुनिक कस्बे से कम नहीं है। यहां राष्ट्रीय स्तर का इंजीनियरिंग कॉलेज है, कमिश्नर दफ्तर, दो पुलिस स्टेशन, दो तीन सितारा होटल, छह सिनेमाघर, वल्चर सेंचुरी, सिल्क बाजार हैं।
शोले पर रामनगरम के नौजवान इतना ही कहते हैं, 'बहुत अच्छी फिल्म है, ऐसी फिल्म आजतक नहीं बनी। इस रास्ते से दो किलोमीटर आगे जाइए, वहां रामदेवरबेटा (शोले हील्स) मिलेगा, शोले की शूटिंग वहीं हुई थी।'
शिवलिंगैय्या को छेड़ने पर शोले सीन दर सीन खुलने लगती है
40 से अधिक के उम्र वालों में शोले के एक गाने की रील अब भी घूम रही है, जिसमें भीड़ बढ़ाने के लिए रमेश सिप्पी ने पूरे रामनगरम को बुला लिया था। रामनगरम स्थित गौसिया कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के प्रधानाचार्य मो. हनीफ कहते हैं कि वह स्कूल से भागकर शोले की शूटिंग देखने जाते थे। लेकिन जिस दिन 'होली के दिन रंग मिल जाते हैं' गाने की शूटिंग थी, शिक्षक खुद ही सभी बच्चों को लेकर शूटिंग के लिए ले गए थे।
शोले के सेट पर अपनी दुकान से दाल, चावल, तेल, घी पहुंचाने वाले पीवी प्रभाकर बताते हैं कि वह जब भी वहां पहुंचते, उन्हें संजीव कुमार को पंखा हांकने का काम दे दिया जाता। क्योंकि धूप में दोनों हाथ कुर्ते के अंदर रखकर ऊपर से सॉल ओढ़ने की वजह से उन्हें खूब पसीना होता था। मोहम्मद गौस शोले को याद करते हुए कहते हैं पानी की टंकी बनाते वक्त लकड़ी का एक टुकड़ा उनके पैर पर गिर गया था।
उस दिन फिल्मवालों ने उन्हें पांच रुपये के बजाय 10 रुपये मजदूरी दी थी। बाकी लोगों से शोले पर बात करने पर बार-बार शिवलिंगैय्या, ईरैय्या और शांता का नाम सामने आता है। ये तीनों शोले का हिस्सा थे, आज भी उन्हीं पहाड़ों के आसपास रहते हैं। शिवलिंगैय्या के जेहन में अभी सबकुछ एकदम ताजा है। उन्हें थोड़ा सा भी छेड़ने पर शोले सीन दर सीन खुलने लगती है।
यहां थी ठाकुर की हवेली, वहां था गब्बर का अड्डाः शिवलिंगैय्या
शोले की शूटिंग के वक्त शिवलिंगैय्या 22 वर्ष के थे। वह बताते हैं कि तब उनके पास कोई काम नहीं था, तो वह रोज हेमा मालिनी को देखने के चक्कर में शूटिंग स्थल पर पहुंच जाते थे। एक दिन एक टोपी लगाए हुए शख्स उन्हें एक बंदूक थमाते हुए पहाड़ी के एक कोने में बैठ जाने को कहा।
बाद में कहा गया कि जब सब हंसने लगे तो उन्हें भी हंसना है। वह शख्स रमेश सिप्पी थे और यह दृश्य 'अब तेरा क्या होगा कालिया' वाला था। इस तरह से शिवलिंगैय्या शोले का हिस्सा बन गए। इसके बाद उन्हें सेट पर अभिनेताओं को चाय-नाश्ता-पानी आदि देने का काम मिल गया।
वह बताते हैं कि सामने उस मैदान में रामगढ़ गांव बसाया गया था। ऊपर ढ़लान के पास ठाकुर की हवेली थी, जहां अब राख पड़ी हुई है। 'ये दोस्ती' की शूटिंग महागढ़ी रोड पर हुई थी। जय-वीरू का स्टेशन वाला सीन बिरधी रेलवे स्टेशन का है। आम तोड़ने वाला सीन कैपे गोड़ानागोड्डी के बगीचे का है।
सूरमा भोपाली के लड़की के फैक्ट्री वाले दृश्य को वहां से 12 किलोमीटर दूर आइजोसर्कल में फिल्माया गया। कल्लगोपल्ली में वो ब्रिज बना था, जहां अमिताभ की मौत वाला सीन लिया गया। गब्बर का अड्डा रामदेवरबेटा की तीसरी पहाड़ी के दाहीने कोने पर था।
गब्बर के डाकुओं ने मुझे कर दिया था घायलः बोरम्मा
शोले फिल्म में होली वाले गाने के दौरान पूरे रामनगरम गांव को बुला लिया गया था। इसमें बोरम्मा की मां भी उन्हें लेकर आई थीं। यहां होली गाने के बाद गब्बर सिंह गांव पर हमला कर देता है। इससे गांव में भगदड़ मच जाती है। तभी बारम्मा अचानक गब्बबर के डाकुओं पैरों तले आते-आते बचती हैं। अगर उस दौरान उन्हें एक औरत ने बचाया होता तो शोले के सेट पर बड़ा हादसा हो जाता।
बोरम्मा बताती हैं कि सबको जरूरी दिशा निर्देश दिया गया था, लेकिन वह बहुत छोटी थीं। घोड़ों को इस तरह से खुले में दौड़ता देख वह भौचक्क रह गईं और समझ नहीं पाई कि क्या करें। इसी दौरान वो घटना घटी। संयोग से यह घटना एक कैमरे में कैद हो गई थी।
बाद में इस सीन को फिल्म प्रयोग भी किया गया। आप आज फिल्म को देखते हैं तो होली के गाने के बाद वाले भागदौड़ का सीन ध्यान से देखिएगा।
तांगा से पहिया निकालने की मेरी तरकीब उन्हें पसंद आईः ईरैय्या
ईरैय्या ने दोस्तों से शोले की शूटिंग के बारे में सुना और वहां मिल रहे काम के बारे में भी। ईरैय्या बताते हैं कि शूटिंग के दौरान मुंबई से भांति-भांति रंग और डिल-डौल के घोड़े आए थे। उन्हें उन्हीं घोड़ों की देखभाल में लगाया गया था। इस दौरान उन्होंने देखा कि धर्मेंद्र काले रंग के एक खास घोड़े पर ही बैठते हैं। वह घोड़ा उन्हें काफी मानता भी है। वरना एक बार कालिया (बिजू खोटे) उस पर बैठे तो ऐसा उछला कि वो काफी दूर जाकर गिरे।
ईरैय्या शूटिंग के दिनों के बारे में बाताते हैं कि एक दफे फिल्म यूनिट के लोग एक घोड़े के पास आकर खूब विचार-विमर्श कर रहे थे और बड़े परेशान थे। ईरैय्या को किसी ने बताया कि फिल्म के एक दृश्य में तांगे का पहिया निकलते हुए दिखाया जाना है, लेकिन यूनिट के लोग नहीं समझ पा रहे हैं चलते तांगे से एक खास मौके पर पहिया कैसे निकाला जाए। इस पर फट से ईरैय्या ने यूनिट को एक तरकीब सुझाई, जो उन लोगों को खूब पसंद आई।
संजीव और अमजद ने कराई मेरी शादीः शांता
शांता की मां शोले के सेट पर खाना बनाने का काम करती थी। इसी बहाने शांता को रोज शूटिंग देखने का मौका मिल जाता था। तब उनकी उम्र 16 वर्ष थी। एक दिन फिल्म यूनिट के साथ आए लड़के ने उनसे शादी के लिए पूछा, तो वह चौक गईं। उन्होंने ये बात अपनी मां को बताई तो उनकी मां शोले के सेट पर जाना बंद कर दिया। अगले दिन सुपरवाइजर उनके घर आ पहुंचे तब मामले का खुलासा हुआ।
शांता बताती हैं कि शंकर फिल्म में लाइटमैन के असिस्टेंट थे। उनके पास अच्छी नौकरी थी, लेकिन शांता की मां को डर था कि शूटिंग के बाद शंकर उनकी बेटी को यही छोड़कर मुंबई चले जाएंगे। जब इसकी खबर संजीव कुमार और अमजद खान को लगी तो उन्होंने शंकर को बुलाकर पूरे मामले की जानकारी ली। शंकर के दिल की बात जानने के बाद दोनों ने शांता की मां को समझाया और दोनों की शादी करा दी।