‘स्टाइल मेरे लिए पहली मोहब्बत जैसी रही है’, शरमन जोशी के करियर को पूरे हुए 25 साल; शेयर किए अनसुने किस्से
Sharman Joshi Exclusive Interview: 28 दिसंबर 2001 में रिलीज हुई फिल्म ‘स्टाइल’ से शरमन जोशी ने बतौर लीड एक्टर डेब्यू किया था। इंडस्ट्री में 25 साल पूरे होने पर एक्टर ने अमर उजाला से खास बातचीत की। इस बातचीत में अपने करियर से जुड़ी कुछ अनसुनी बातें भी साझा की हैं।
विस्तार
शरमन जोशी के करियर को 25 साल पूरे हो चुके हैं। करियर की सिल्वर जुबली पर उन्होंने अमर उजाला डिजिटल से लंबी बातचीत की। इस बातचीत में शरमन जोशी ने पहली फिल्म ‘स्टाइल’, थिएटर और फिल्मी सफर के अलावा जिंदगी से जुड़े कई मुद्दों पर बात की। पेश हैं, उनसे हुई बातचीत के अंश…
25 साल बाद 'स्टाइल' के बारे में सोचने पर कौन सा इमोशन आता है ?
मेरे मन में सबसे पहले कृतज्ञता आती है और दिल प्यार से भर जाता है। मैंने तो सोचा था कि जिंदगी में बस एक फिल्म कर लूं, वही बहुत होगा। लेकिन ‘स्टाइल’ की वजह से मुझे कई फिल्में मिलीं और ‘थ्री इडियट्स’ भी उसी कारण मिली। राजकुमार हिरानी सर ने कहा था कि उन्होंने ‘स्टाइल’ देखी थी और तभी उन्होंने सोचा था कि किसी अच्छे किरदार में मुझे लेना है इसलिए ‘स्टाइल’ मेरे लिए हमेशा पहली मोहब्बत जैसी रही है। यह मेरा पहला प्यार है।
'थ्री इडियट्स' सिर्फ एक फिल्म नहीं, इमोशंस हैं। कभी सोचा था कि राजू रस्तोगी का किरदार टाइमलेस बनेगा?
हमें शुरुआत में ही समझ आ गया था कि हम एक बढ़िया कहानी पर काम कर रहे हैं, लेकिन ऑडियंस कितना प्यार देगी, यह कोई नहीं जानता। यह तो फिल्म रिलीज होने के बाद पता चला। 15–16 साल बीत गए, लेकिन आज भी लोग इसे उसी गर्मजोशी से याद करते हैं जैसे फिल्म अभी आई हो। लोग प्यार से बातें करते हैं, अपने अनुभव बताते हैं और यह देखकर बहुत खुशी होती है कि राजू रस्तोगी आज भी लोगों के दिलों में उतना ही ताजा है। आज भी लोग मुझसे मिलकर बताते हैं कि इस फिल्म ने उनकी जिंदगी बदल दी। पहले मुझे लगता था कि फिल्में बस पहनावे या स्टाइल पर असर डालती हैं, उससे ज्यादा नहीं, लेकिन ‘रंग दे बसंती’ और ‘थ्री इडियट्स’ ने मेरी सोच बदल दी।
थिएटर ने कभी आपको किसी खराब फिल्म वाले दौर से बाहर निकाला?
हां, थिएटर ने मुझे एक मुश्किल समय से बाहर निकाला था। ‘फरारी की सवारी’ के बाद मैंने सोलो हीरों के तौर पर तीन फिल्में कीं और वो फ्लॉप रहीं। इस तकलीफ के बीच भी मैं थिएटर शो करता रहा। शो खत्म हुआ तो एक सह कलाकार मेरे पास आईं और उन्होंने कहा कि उन्हें मुझ पर गर्व है। वे जानती थीं कि मेरे लिए यह समय कितना मुश्किल था, लेकिन फिर भी मैंने वही ऊर्जा बनाए रखी। यह अनुभव मुझे बहुत संभालने वाला था और सच में, थिएटर ने ही मुझे उस कठिन दौर से बाहर निकाला।
नए कलाकारों को मैं बस एक बात कहना चहूंगा कि इस इंडस्ट्री में ग्लैमर जितना दिखता है, मेहनत उससे कहीं ज्यादा होती है। सिर्फ चमक-दमक देखकर बिना तैयारी आओगे, तो आगे चलकर मुश्किलें ही बढ़ेंगी।