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Hindi News ›   Entertainment ›   Bollywood ›   Rhythm Art Festival: Shri Mukund Srivastava, Prof. K. Ratnam and Sandeep Kulshrestha share their views on the country tourism And culture

रिदम कला महोत्सव: श्री मुकुंद श्रीवास्तव, प्रो. के रत्नम और संदीप कुलश्रेष्ठ ने देश के पर्यटन पर साझा किए अपने विचार, कहा-'संस्कृति पर्यटन की रीढ़ की हड्डी है'

Wed, 23 Feb 2022 10:57 PM IST
शशि सिंह एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: शशि सिंह Updated Wed, 23 Feb 2022 10:57 PM IST
सार

इस सप्ताह आयोजित हुई कार्यशाला में सम्मानित अतिथि श्री मुकुंद श्रीवास्तव (अतिरिक्त मुख्य सचिव सिक्किम सरकार), प्रो के रत्नम (सदस्य सचिव भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद नई दिल्ली), प्रो संदीप कुलश्रेष्ठ (पूर्व निदेशक आईआईटीटीएम ग्वालियर, प्रमुख शिक्षाविद एमपी भोज मुक्त विश्वविद्यालय भोपाल ) ने देश के पर्यटन, सांस्कृतिक विरासत और धरोहर पर अपने विचार साझा किए।

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Rhythm Art Festival: Shri Mukund Srivastava, Prof. K. Ratnam and Sandeep Kulshrestha share their views on the country tourism And culture
: श्री मुकुंद श्रीवास्तव, प्रो के रत्नम और संदीप कुलश्रेष्ठ - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

विस्तार

अंजना वेलफेयर सोसायटी के सहयोग से रिदम कला महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। 26 जनवरी से शुरू हुआ यह कला महोत्सव 45 दिन तक आयोजित किया जाएगा। यह कला महोत्सव बीते 8 सालों से आयोजित किया जा रहा है और आगे भी ऐसे ही आयोजित किया जाएगा। इस महोत्सव का मकसद युवाओं को भारतीय संस्कृति से जोड़ना है। इस महोत्सव के तहत हर सप्ताहांत में कला के क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति इस महोत्सव के तहत आयोजित होने वाली कार्यशाला का हिस्सा बनते हैं। इस सप्ताह आयोजित हुई कार्यशाला में सम्मानित अतिथि श्री मुकुंद श्रीवास्तव (अतिरिक्त मुख्य सचिव सिक्किम सरकार), प्रो के रत्नम (सदस्य सचिव भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद नई दिल्ली), प्रो संदीप कुलश्रेष्ठ (पूर्व निदेशक आईआईटीटीएम ग्वालियर, प्रमुख शिक्षाविद एमपी भोज मुक्त विश्वविद्यालय भोपाल ) ने देश के पर्यटन, सांस्कृतिक विरासत और धरोहर पर अपने विचार साझा किए। इस दौरान माया कुलश्रेष्ठ ने उनसे बातचीत की। ये हैं उनकी बातचीत के कुछ अंश।

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सवाल: सांस्कृतिक धरोहर की पर्यटन में क्या भूमिका है?
इस पर प्रो संदीप कुलश्रेष्ठ ने अपने विचार रखते हुए कहा-वास्तविकता यह है कि देश की सरकारों ने भी समझा कि देश की संस्कृति और पर्यटन दोनों को एकत्रित किया जाए। मैं तो ये मानता हूं कि संस्कृति पर्यटन की रीढ़ की हड्डी है। वास्तविकता ये है कि जब हम देश में पर्यटन की बात करें, सनातन परंपरा की बात करें, तो सनातन परंपरा में भी देखने को यही आता है कि जब लोग देशाटन को जाते थे तो वह अपनी संस्कृति से और रूबरू होना चाहते थे। और जब हम संस्कृति की बात करें तो उसमें विरासत तो समाहित ही है। इसी तरह से जब हम आधुनिक पर्यटन की बात करते हैं तो विशेष रूप से तीन सालों में जो मानस में परिवर्तन आया है। जिसको हम कंज्यूमर बिहेवियर या टूरिस्ट बिहेवियर की बात करते हैं। इस कोरोना के समय में देखा जाए तो लोग चाहते हैं कि कल्चर और हेरिटेज को देखना चाहते हैं।  पर्यटन मंत्रालय भी यह कहता है कि आने वाला समय विशेष रूप से विरासत को देखने के लिए और संस्कृति को देखने के लिए पर्यटक जाना चाहेंगे। देश के अलावा अगर विदेश की भी बात करें तो पर्यटक गगनचुंबी इमारत नहीं बल्कि बनारस की गलियां देखना चाहता है। कहीं न कहीं अगर संस्कृति को साथ लेकर चलते हैं तो पर्यटन की सफलता ज्यादा रहती है।
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सवाल: सांस्कृतिक धरोहर की पर्यटन में भूमिका के बारे में रत्नम सर आप क्या कहते हैं?-
मैं समझता हूं कि संस्कृति, पर्यटन और धरोहर तीनों एक दूसरे के बगैर नहीं रह सकते। मेरा मानना ये है कि निश्चित रूप से पर्यटन हो या हमारी धरोहर हो या संस्कृति, खासतौर पर जब हम पर्यटन की चर्चा कर रहे हैं तो हमें सबसे पहले अपने देश की उस नब्ज को पकड़ना होगा, कि हमारी स्पिरिट क्या है? हमारा साइको माइंडसेट क्या है, पार्टिकुलर कंट्री का। तो जब हम इस पर चर्चा करेंगे, सांस्कृतिक संदर्भों में, जब हम सौंदर्य की अवधारणाओं को भारतीय और पाश्चात्य संदर्भों में करेंगे तो हम देखेंगे कि हमारा भारत एक आध्यात्मिक देश रहा है, दर्शन आधारित रहा है, भारत बोध में मूल्यों की सर्वाधिक प्राथमिकता है। और इसी कारण से हमारा जो भी विदेशी पर्यटक हैं, तो हमारे भारत में जब विशेष रूप के कोई पर्यटक आता है तो हमारी संस्कृति उसको हमारी धरोहर उसका..वह धरोहर मैन मेड हो या गॉडमेड हो या नचुरल हो किसी भी प्रकार की हो लेकिन उसकी जो मुख्य रूप से संस्कृति है। हमारे प्रधानमंत्री जी ने जब अमृत महोत्सव की घोषणा की थी, दांडी यात्रा के दिन अमृत महोत्सव की घोषणा करना और जो परिकल्प लिया की जो 1498 से हमारा जो प्रतिरोध का इतिहास है, उसके पीछे बड़ा स्पष्ट है कि हमारी सांस्कृतिक प्रतिरोध के जो गैप्स हैं हिस्ट्री में, इस तरह के जो हिस्टोरिकल गैप्स हैं उन्हें भरना भी जरुरी है। हमारी जो धरोहर है उन सबके समाज के समक्ष रखना, उसको एक पर्यटन उत्पाद के रूप में रखना और उसका विपणन करना ये तीन चीजों का जब समावेश होगा तो निश्चित रूप से भारत का पर्यटन विश्व को प्रभावित करेगा।
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सवाल: सर जो हमारी आर्ट, कल्चर, और टूरिज्म है, हम उसको एक प्रोडक्ट की तरह नहीं दे पा रहे हैं या अगर दे पा रहे हैं तो बहुत सीमित हो गए हैं। इस पर आपके क्या विचार हैं?

श्री मुकुंद श्रीवास्तव जी ने इस पर अपने विचार रखते हुए कहा-कल्चर का डोमेन हो या आपका आईसीटी कल्चर का डोमेन हो, कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी का डोमेन हो, या कोई भी साइंटिफिक डोमेन हो, तो उसकी शुरुआत हम करते हैं कि पहले ये जानना कि हमारी कल्चर लेगेसी क्या है। कल्चरल डोमेन में मुझे खयाल है कि ये 2017 की बात होगी जब आदरणीय प्रधानमंत्री जी ने संस्कृति मंत्रालय को डायरेक्शन दिए थे और एक उनकी अवधारणा थी 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' हमारे पास जो कल्चरल लेगेसी है अलग-अलग स्थानों में। मूलतः पॉलिसी लेवल पर जो भारत सरकार की तरफ से जो प्रयास हुए हैं और जो हो रहे हैं उनकी बात करता हूं। उसी तरह से एक और स्कीम थी कल्चर मैपिंग ऑफ इंडिया, तो हमारे कोने-कोने में कोई भी कल्चरल जॉनर है या आर्ट फॉर्म है, तो उसको पहले हम पता करें कि कहां, क्या है? तो कल्चर मैपिंग ऑफ इंडिया के साथ ही एक भारत श्रेष्ठ भारत, एक जगह को दूसरी जगह के कल्चर का पता लगे। आपके कल्चरल हेरिटेज लेगेसी जो है और टूरिज्म ये अंतर्संबंधित हैं।


सवाल-सर यह बताइए कि आपको क्या लगता है कि जो गैप्स हैं, जिसे हम नहीं कर पा रहे हैं प्रैक्टिकली?

संदीप जी ने कहा-जो भारत का पर्यटन है, जो कला है जो संस्कृति है हमको उसको थोड़ा सो मॉडिफाई करके अपने सनातन मूल्यों को ध्यान में रखते हुए हमको एक नए तरीके से आज को पर्यटक को परोसने होंगे। हमारे प्रधानमंत्री जी जब विदेश जाते हैं तो पांच टी की बात करते हैं उसमें एक टी पर्यटन का आता है। हमारा जो पर्यटन है हमारा जो पारंपरिक मूल्य है। हमारा भविष्य बहुत उज्ज्वल है। हमें समग्र रूप में सोचना होगा।

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