जब रामगोपाल वर्मा के सामने बैठा था असल गैंगस्टर, निर्देशक देखकर क्यों हुए दंग? बोले- ‘छोटा राजन का…’
Ram Gopal Varma Exclusive Interview: निर्देशक राम गोपाल वर्मा ने क्राइम और अंडरवर्ल्ड की दुनिया को भी पर्दे पर अलग अंदाज में पेश किया। कई फिल्मों में गैंगस्टर की जिंदगी को काफी करीब से दिखाया। एक बार उनकी मुलाकात असल गैंगस्टर से हुई? कैसा था वो अनुभव? किस तरह से गैंगस्टर आम लोगों से अलग होते हैं, रामगोपाल वर्मा ने अमर उजाला से हुई खास बातचीत में बताया?
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विस्तार
साल 1998 में रिलीज हुई 'सत्या' से लेकर 2010 में आई ‘रक्तचरित’ जैसी फिल्मों तक रामगोपाल वर्मा ने गैंगस्टर और गुंड़ों की जिंदगी को बड़े पर्दे पर बखूबी उतारा। वह बॉलीवुड में गैंगस्टर फिल्मों के मास्टर कहे जाते हैं। हाल ही में अमर उजाला डिजिटल से हुई खास बातचीत में रामगोपाल वर्मा ने बताया कि कैसे उन्हें यह फिल्में बनाने की प्रेरणा मिली? और असल जिंदगी में जब एक गैंगस्टर से वह मिले तो क्या अनुभव रहा।
अंडरवर्ल्ड जब मुंबई पर हावी था
रामगोपाल वर्मा के करियर में अधिकतर फिल्में गैंगस्टर वाली कहानियों से भरी रही। निर्देशक ने गैंगस्टर बेस्ड अपनी फिल्मों के बारे में बताते हुए कहा, ‘मुंबई में वो दौर ऐसा था, जब कई अपराधिक घटनाएं हो रही थीं। मुझे लगा इस तरह की कहानियां बनाने का यही सबसे अच्छा मौका है। जब गैंगस्टर की जिंदगियों को पास से दिखाया जा सकता है।’
जब असल गैंगस्टर से मिले रामगोपाल वर्मा
रामगोपाल वर्मा ने बड़े पर्दे पर अलग-अलग अंदाज में गैंगस्टर को दिखाया। कभी खूंखार गैंगस्टर उनकी फिल्मों में दिखे तो कभी मवाली लुक में हीरो को दिखाया गया। ‘रंगीला’ में आमिर खान को रामगोपाल वर्मा एक मवाली लुक में पेश किया था। तो क्या उनकी असल जिंदगी में मुलाकात किसी गैंगस्टर से हुई। इस पर वह कहते हैं, ‘एक बार में एक प्रोड्यूसर से मिलने गया था। उनके ऑफिस में एक आम सा दिखने वाला इंसान बैठा था, उसके बारे में प्रोड्यूसर ने कहा कि ये अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन का शूटर है। मैं उसकी साधारण वेशभूषा देखकर हैरान था। लेकिन बड़े पर्दे पर हम अलग ढंग से गैंगस्टर को दिखाते हैं। यही वजह है कि आम लोगों को लगता है कि गैंगस्टर शायद ऐसे ही दिखते होंगे।’
राम गोपाल वर्मा ने इंटरव्यू में बताया कि जब वह अलग-अलग हॉरर जॉनर की फिल्में बनाते हैं तो सबकी टेक्नीक अलग होती हैं। वह कहते हैं, ‘हॉरर फिल्में ज्यादा साइकोलॉजिकल होती हैं। ज्यादातर शॉटस मैं शूटिंग के पहले ही सोच लेता हूं। अगर फिल्म हॉरर है, तो कहानी ज्यादा नहीं होनी चाहिए। अगर कहानी लंबी हुई तो डर नहीं लगेगा। फिल्म को शूट करने का अपना एक तरीका है। दर्शकों को यह पता रहना चाहिए कि अब डर लगने वाला है। इसी वजह से लोग ऐसी फिल्में देखते हैं।’