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माफ करना, आज अच्छी फिल्में नहीं बन रहीं: ओम पुरी

Wed, 10 Aug 2016 09:25 AM IST
रवि बुले/ मुंबई ब्यूरो, अमर उजाला
रवि बुले/ मुंबई ब्यूरो, अमर उजाला Updated Wed, 10 Aug 2016 09:25 AM IST
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Om Puri exclusive interview for amar ujala

ओम पुरी फिल्म ट्यूबलाइट की शूटिंग के लिए लद्दाख पहुंच चुके हैं। इसमें वह एक महत्वपूर्ण किरदार निभा रहे हैं। वहां के लिए रवाना होने से पहले उन्होंने अपनी आने वाली फिल्म वारियर सावित्री के सिलसिले में मीडिया से मुलाकात की। हिंदी में दर्जनों कालजयी किरदार निभा चुके ओम पुरी की बातों से साफ है कि वह आज के सिनेमा से नाखुश हैं।

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वारियर सावित्री में आप मॉडर्न लुक वाले यमराज बने हैं। किस तरह फिल्म को याद रखना चाहेंगे?
इस फिल्म पहले किसी हीरोइन ने मुझे किक नहीं लगाई। इसकी हीरोइन (निहारिका रायजादा) यंग है, कमाल की है। उसकी फाइटिंग जबर्दस्त है। मुझे लगता है कि इससे सिर्फ अक्षय कुमार ही भिड़ सकता है। मेरा छोटा-सा रोल है। भले ही मैं यहां यमराज बना हुआ हूं परंतु यह बड़ा ही डिग्निफाइड यमराज है। सूट-बूट पहनता है। इसकी मूंछें भी नहीं हैं।
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अपने लंबे अनुभव से क्या आप बता सकते हैं कि स्टार और ऐक्टर से क्या अलग-अलग अपेक्षाएं होनी चाहिए?
स्टार से उम्मीद करनी चाहिए कि उसके बड़े-बड़े मसल हों। उसके छह-आठ पैक होने चाहिए। ऐक्टर से अपेक्षा होनी चाहिए कि वह लोगों को हंसा या रुला सके।

लोग अब स्टार से भी ऐक्टिंग की उम्मीद करते हैं। ऐक्टिंग के बदले हुए माहौल को कैसे देखते हैं?
एक्टिंग अब बहुत बदल चुकी है। यहां जादूगरी वाली ऐक्टिंग हो रही है। जादूगरी वाली फिल्में बन रही हैं। वह बताते हैं कि देखो हम कितनी ऊंची गाड़ी उड़ाते हैं। हमारा हीरो कितने लोगों को मार सकता है। पेट-कमर पर दर्जनों तार बांध कर हीरो को उड़ता दिखाया जाता है। पहले जैसे होते थे जादूगर, वैसे ही हमारी फिल्में आज जादू दिखाती हैं। सामाजिक समस्याओं पर बहुत कम फिल्में बोलती हैं।

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आजकल पहले जैसी फिल्में नहीं बनतीं

Om Puri exclusive interview for amar ujala

क्या आप संतुष्ट हैं आज की फिल्मों से?
मुझे क्या लेना-देना इन फिल्मों से। कुछ सालों में जाने वाला हूं। हमने कर दिया जो कर सकते थे। हमने बड़ी अच्छी-अच्छी फिल्में की। एक ऐक्टर के रूप में मैंने अपनी जिम्मेदारी निभा दी। मेरी कम से कम पचास ऐसी फिल्में होंगी जो आर्काइव में संभाल कर रखी हुई हैं।

आपने कहा सिनेमा में जादूगरी बढ़ गई है। मगर इधर रीयलिस्टिक सिनेमा की बातें हैं। गैंग्स ऑफ वासेपुर से लेकर मसान और रमन राघव जैसी फिल्में बनी और चर्चित हुई हैं!
हमारी सामाजिक समस्या है कि महंगाई कम नहीं हो रही। आबादी कम नहीं हो रही। लोगों के पास रहने के लिए मकान नहीं हैं। पानी नहीं है, मगर शौचालय बनाने पर जोर है। प्रेक्टिल बातें नहीं हो रहीं। इधर, सौ-सवा सौ रुपये किलो सब्जियां मिल रही हैं। दालें दो सौ रुपये किलो हैं। इस पर कौन फिल्में बनाएगा। हमें क्या लेना-देना रमन राघव से? मर गया वो...! उससे हमारी जिंदगी में क्या अच्छा आ रहा है? रमन राघव पर बना दी, वीरप्पन पर बना दी। यह भी जादू ही है।

आप यह सोचते हैं, लेकिन ये फिल्मकार तो ऐसा नहीं सोचते!
क्या पहले सामाजिक फिल्में नहीं बन रही थीं? विमल राय की फिल्में देखो, वी.शांताराम की फिल्में देखो। इन्होंने कितना जागरूक बनाया लोगों को अपनी फिल्मों से। माफ करना, ऐसी कोई फिल्म आज नहीं बन रही है।

'ये देखो पेट निकल रहा है'

Om Puri exclusive interview for amar ujala

नए फिल्मकार कहते हैं कि ऐसी फिल्मों के लिए दर्शक नहीं हैं!
पहले कैसे थे? पहले इंसान नहीं थे क्या? उसमें गाने भी होते थे और गानों के मतलब भी होते थे, कविता होती थी। गानों में संगीत होता था, रस होता था। आज वह सब कहां है? जिनके मैंने नाम लिए उनके अलावा और भी हैं। उन सबकी फिल्में चली हैं। अच्छी कहानी होती थी, अच्छे डांस होते थे, म्यूजिक होता था।

क्या आप किसी तरह फिटनेस का खयाल रखते हैं?
कहां फिटनेस की बात है... ये देखो पेट निकल रहा है।

मगर आप लद्दाख जा रहे हैं, वहां अच्छी सेहत जरूरी है?
कुछ नहीं होता... वहां काम से दो दिन पहले जाते हैं। वहां ऑक्सीजन कम है ना! डॉक्टर एक गोली देता है खाने के लिए। कहता है थोड़ा आराम करो। एक-डेढ़ दिन। चलो-फिरो नहीं। इसके बाद फिर चढ़ जाओ पहाड़ पर। इससे पहले भी चार बार गया हूं और जिंदा लौट आया हूं। इस बार भी आ जाऊंगा।

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