Mumbai Diaries 2 Review: बारिश में बही निखिल आडवाणी की ब्रांड वैल्यू, प्राइम वीडियो में किसी को नहीं आती हिंदी
प्राइम वीडियो की वेब सीरीज ‘मुंबई डायरीज’ का दूसरा सीजन इसके पहले सीजन में खत्म हुई कहानी का सिरा पकड़कर आगे बढ़ता है।
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बड़े परदे पर इन दिनों जिस तरह से औसत मनोरंजक फिल्में भी करोड़ों का कारोबार कर रही हैं, उससे एक बात तो साबित होती है कि दर्शक अब घरों में बैठकर टीवी या मोबाइल पर मनोरंजन सामग्री देखने से उकता गए हैं। वह सबके साथ बैठकर मजे लेना चाहते हैं, ठहाके लगाना चाहते हैं और रोना भी चाहते हैं। मानवीय संवेदनाओं से भागती ओटीटी की मनोरंजन सामग्री और अधकचरे भाषा ज्ञान ने भी दर्शकों को ओटीटी से दूर धकेलना शुरू कर दिया। डिजिटल थकान तो खैर है ही।
कभी देखा आपने इन दिनों लोग सफर पर निकलने से पहले अब मोबाइल पर फिल्में या वेब सीरीज डाउनलोड करना कितना कम कर चुके हैं। हवाई यात्रा में गिनती के यात्री ही फ्लाइट टेकऑफ करते ही मोबाइल ऑन करके सीरीज या फिल्में देखते हैं। किताबों की बिक्री बढ़ रही है और ओटीटी मनोरंजन सामग्री की गुणवत्ता लगातार घट रही है। प्राइम वीडियो की वेब सीरीज ‘मुंबई डायरीज’ का दूसरा सीजन ये सारे नकारात्मक कारक अपने में समेटे है और इसीलिए इस सीरीज के औसतन 45 मिनट के आठ एपिसोड देखना समय की बर्बादी के सिवा कुछ नहीं है।
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प्राइम वीडियो की वेब सीरीज ‘मुंबई डायरीज’ का दूसरा सीजन इसके पहले सीजन में खत्म हुई कहानी का सिरा पकड़कर आगे बढ़ता है। अस्पताल का सबसे चर्चित चिकित्सक मीडिया ट्रायल में फंसा है। मामला अदालत तक जा पहुंचा है और मुंबई में मूसलाधार बारिश शुरू हो जाती है। चिकित्सा क्षेत्र की मानवीय कहानियां मनोरंजन जगत का पसंदीदा विषय रही हैं। लेकिन, वेब सीरीज ‘मुंबई डायरीज’ ने अपने पहले सीजन में जो कमाया था, वह सब इसके दूसरे सीजन में गंवा दिया है। नाम भी और दाम भी। कॉन्टेंट फैक्ट्रियों में तब्दील होते जा रहे मुंबई के बड़े प्रोडक्शन हाउस इस बात से पूरी तरह मुंह फिरा चुके हैं कि हिंदी में मनोरंजन सामग्री बनाने की पहली शर्त हिंदी का सम्मान होना चाहिए। वह बस छापे जा रहे हैं। अब जिन निर्माता, निर्देशकों को ये तक न पता हो कि परदे पर दिख रही हिंदी कितनी गलत और कितनी असावधानी से लिखी जा रही है, उनसे इस बात की तो उम्मीद क्या ही की जाए कि वह देश की हिंदी भाषी जनता की मनोदशा या उनकी पसंद, नापसंद को समझने की मेहनत भी करते होंगे।
इस बार चिकित्सा का पेशा मुंबई में 2005 में हुई भयंकर बारिश के बीच पनपती त्रासदी के बीच कसौटी पर है। पिछले सीजन के कलाकार वापस लौटे हैं। परमब्रत चट्टोपाध्याय जैसे कुछ नए चेहरे भी इस नाव पर आ सवार हुए हैं। कहानी का मर्म यही है कि किरदारों को लगातार हिचकोलों के बीच रखा जाए। कभी अस्पताल में तो कभी परिवार में। लेकिन, ये सब करने के लिए जो मजमा प्राइम वीडियो की वेब सीरीज ‘मुंबई डायरीज’ का दूसरा सीजन बनाने वालों ने इस कहानी में जमा लिया है, वही इस सीरीज की सबसे कमजोर कड़ी बन चुका है। किसी भी किरदार का ग्राफ ठीक से न पनपने पाता है और न ही जमने पाता है। सबके चेहरों पर एक तयशुदा भाव है जो वह पिछले सीजन से ओढ़ आए हैं। एक अजीब तरह की अफरातफरी है। बनाने वालों को ये तक नहीं पता कि न्यूज स्टूडियो में पैनल में शामिल लोगों के लिए किस तरह की मेज इस्तेमाल की जाती है, टिकर और बैंड पर लिखे जाने वाक्यों की हिंदी दुरुस्त रखने के लिए बाकायदा एक विभाग होता है। यहां सब कुछ बारिश भरोसे है।
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ये सही बात है कि बारिश का मौसम व्यक्ति, काल और परिस्थिति के अनुसार हर इंसान पर अलग अलग असर करता है। इन बारिशों में अदालत के बाहर के दृश्य हिंदी सिनेमा के दर्शकों ने खूब देखे हैं। मोर्चे पर डटे नायक की गर्भवती पत्नी के बहाने वैचारिक द्वंद्व का किस्सा भी नया नहीं है। टीवी चैनल की सबसे युवा एंकर का तमगा पाने वाली एक अकुशल न्यूज एंकर के हवाले किया गया मीडिया ट्रायल मेरे जैसे तमाम लोगों के लिए किसी शॉक की तरह है जिन्होंने टीवी न्यूज इंडस्ट्री को करीब से देखा है, या उसमें लंबा समय बिताया है। एक हिंदी न्यूज चैनल के ग्राफिक्स विभाग का हिंदी वर्तनी और व्याकरण ज्ञान इतना कचरा हो, ये कम से कम भारत में तो नहीं ही हो सकता। इससे ये भी पता चलता है कि प्राइम वीडियो की क्वालिटी कंट्रोल टीम कैसे काम करती है और एम्मे एंटरटेनमेंट की पूरी टीम में कोई सही हिंदी परखने वाला नहीं है, ये बात भी इस सीरीज से साबित हो जाती है।
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प्राइम वीडियो की वेब सीरीज ‘मुंबई डायरीज’ का दूसरा सीजन निर्देशन में बुरी तरह चूका है और इसकी रचना भी बहुत हबड़ तबड़ में की गई लगती है। मोहित रैना का एक तयशुदा भाव उन्हें बतौर अभिनेता विकसित होने में मदद नहीं करता। श्रेया धन्वंतरि ने भी बहुत खराब एक्टिंग एक न्यूज एंकर के तौर पर की है। कोंकणा सेन शर्मा कमाल की अदाकारा हैं लेकिन अतीत और वर्तमान की चक्की में अटकी उनकी कहानी दर्शकों से जुड़ नहीं पाती है। मृणमयी देशपांडे, नताशा भारद्वाज और सत्यजीत दुबे की देह भाषा से लगता नहीं कि वे अपने जीवन के पांच साल मेडिकल की पढ़ाई में लगाने के बाद किसी अस्पताल में प्रायोगिक ज्ञान सीखने आए हैं। प्रकाश बेलवाडी के अभिनय और संवाद अदायगी की अपनी सीमाएं हैं। और, परमब्रत चट्टोपाध्याय यूं लगता है कि सिर्फ इस सीरीज की पूर्वोत्तर राज्यों के दर्शकों के बीच चर्चा हो सके, इसीलिए सीरीज में आए हैं।
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