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Manoj Kumar Death: अमिताभ के लिए बने मसीहा, सरकार के खिलाफ जीता केस, जानें मनोज कुमार से जुड़े पांच किस्से

Fri, 04 Apr 2025 08:28 AM IST
साक्षी एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: साक्षी Updated Fri, 04 Apr 2025 08:28 AM IST
सार

Manoj Kumar Passed Away: भारत कुमार' के नाम से मशहूर मनोज कुमार ने अपनी फिल्मों के जरिए देशभक्ति की ऐसी भावना जगाई जो आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। उनके निधन से बॉलीवुड और उनके प्रशंसकों में शोक की लहर छा गई है। आइए, उनके जीवन से जुड़े पांच यादगार किस्सों के बारे में बताते हैं...

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Manoj Kumar passed away at age of 87 5 unknown story with Lal Bahadur Shastri amitabh bachchan emergency case
मनोज कुमार - फोटो : ANI

विस्तार

'पूरब और पश्चिम', 'रोटी, कपड़ा और मकान' और 'क्रांति' जैसी बेहतरीन फिल्में देने वाले दिग्गज अभिनेता मनोज कुमार का आज, 4 अप्रैल 2025 को 87 साल की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में अंतिम सांस ली। 'भारत कुमार' के नाम से मशहूर मनोज कुमार ने अपनी फिल्मों के जरिए देशभक्ति की ऐसी भावना जगाई जो आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। उनके निधन से बॉलीवुड और उनके प्रशंसकों में शोक की लहर छा गई है। आइए, उनके जीवन से जुड़े पांच यादगार किस्सों को याद करते हैं, जो उनकी देशभक्ति, साहस और सिनेमा के प्रति समर्पण को दर्शाते हैं।

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Manoj Kumar Passes Away: दिग्गज अभिनेता मनोज कुमार का 87 साल की उम्र में निधन; 'भारत कुमार' नाम से थे मशहूर

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लाल बहादुर शास्त्री के कहने पर बनाई थी 'उपकार'
मनोज कुमार की सबसे चर्चित फिल्मों में से एक 'उपकार' (1967) का जन्म एक खास मुलाकात से हुआ था। 1965 में भारत-पाक युद्ध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने उनकी फिल्म 'शहीद' देखी। भगत सिंह के जीवन पर बनी इस फिल्म से प्रभावित होकर शास्त्री जी ने मनोज से अपने लोकप्रिय नारे 'जय जवान जय किसान' पर एक फिल्म बनाने को कहा। मनोज ने इस सुझाव को दिल से लिया और ट्रेन में दिल्ली से मुंबई लौटते वक्त ही 'उपकार' की कहानी लिख डाली। यह फिल्म न सिर्फ सुपरहिट रही, बल्कि इसके गाने 'मेरे देश की धरती' ने देशभक्ति की भावना को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

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देशभक्ति फिल्में बनाने की वजह
मनोज कुमार को 'भारत कुमार' क्यों कहा जाता था? इसके पीछे उनकी जिंदगी का एक गहरा सच छिपा है। उनका जन्म 24 जुलाई 1937 को पाकिस्तान के एबटाबाद में हुआ था। 1947 में भारत-पाकिस्तान बंटवारे के दौरान उनका परिवार दिल्ली आया, जहां उन्होंने शरणार्थी शिविरों में कठिन दिन देखे। इस दौरान देश के लिए कुछ करने की भावना उनके मन में घर कर गई। भगत सिंह से गहरे प्रभावित मनोज ने सिनेमा को माध्यम बनाया और 'शहीद', 'पूरब और पश्चिम', 'क्रांति' जैसी फिल्मों के जरिए देशप्रेम को पर्दे पर उतारा। उनका मानना था कि फिल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करने का जरिया भी हैं। ऐसे में उन्होंने कई देशभक्ति पर आधारित फिल्में बनाईं और इसी वजह से उनका नाम भी 'भारत कुमार' पड़ गया।

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अमिताभ बच्चन को मुंबई छोड़ने से रोका
एक दौर ऐसा था जब अमिताभ बच्चन की फिल्में लगातार फ्लॉप हो रही थीं और उनका करियर डूब रहा था। 1970 के दशक में जब अमिताभ बच्चन लगातार असफलताओं से हताश होकर मुंबई छोड़कर दिल्ली लौटने का मन बना चुके थे, तब मनोज कुमार ने उन्हें रोका। मनोज ने बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में बताया था कि लोग अमिताभ को ताने मार रहे थे, लेकिन उन्हें यकीन था कि यह लंबा-चौड़ा नौजवान एक दिन बड़ा सितारा बनेगा। उन्होंने अपनी फिल्म 'रोटी, कपड़ा और मकान' (1974) में अमिताभ को मौका दिया। यह फिल्म हिट रही और अमिताभ के करियर को नई दिशा मिली। मनोज की यह दूरदर्शिता बाद में सच साबित हुई जब अमिताभ 'एंग्री यंग मैन' के रूप में बॉलीवुड के शिखर पर पहुंचे।

इमरजेंसी के खिलाफ खड़े हुए, सरकार से जीता केस
मनोज कुमार न सिर्फ देशभक्ति के लिए जाने गए, बल्कि अपने साहस के लिए भी मशहूर थे। 1975 में जब इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल (इमरजेंसी) लगाया तो मनोज कुमार ने इसका खुलकर विरोध किया। कहा जाता है कि सरकार ने उनसे प्रो-इमरजेंसी डॉक्यूमेंट्री बनाने को कहा, लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया, जिसके कारण उनकी फिल्म 'दस नंबरी' पर रोक लगा दी गई। मनोज डरे नहीं और सरकार के खिलाफ कोर्ट में केस लड़ा। वे बॉलीवुड के इकलौते ऐसे फिल्म निर्माता और अभिनेता रहे, जिन्होंने सरकार से कानूनी जंग जीती और अपनी फिल्म को रिलीज करवाया। ऐसे में कहा जा सकता है कि वह हिंदी सिनेमा के निडर अभिनेता और निर्माता भी थे।

भगत सिंह की मां से मुलाकात और फिर बनी फिल्म 'शहीद'
मनोज कुमार का भगत सिंह के प्रति लगाव बेहद खास था। फिल्म 'शहीद' (1965) बनाने से पहले वे भगत सिंह की मां विद्यावती से मिलने गए थे, जो उस वक्त अस्पताल में भर्ती थीं। इस मुलाकात के दौरान मनोज भावुक हो गए और फूट-फूटकर रो पड़े। विद्यावती ने कहा था, 'तू तो बिल्कुल भगत जैसा लगता है।' इस मुलाकात ने मनोज को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने भगत सिंह के किरदार को पर्दे पर उतर दिया। 'शहीद' ने उन्हें देशभक्ति फिल्मों का प्रतीक बना दिया और इसके गाने जैसे 'मेरा रंग दे बसंती चोला' आज भी गूंजते हैं।
मनोज कुमार न होते तो आज अमिताभ महानायक न होते, शाहरुख से इस वजह पर हो गए थे नाराज 

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