फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Entertainment ›   Bollywood ›   Making story of Guru Dutt's Pyaasa

रुलाने वाली है 'प्यासा' बनने के पीछे की कहानी

Mon, 28 Mar 2016 07:35 PM IST
जनार्दन पांडेय/अमर उजाला, दिल्ली
जनार्दन पांडेय/अमर उजाला, दिल्ली Updated Mon, 28 Mar 2016 07:35 PM IST
सार

  • वहां हल्की और फीकी रोशनी थी और कमरे में बस एक ही बिस्तर था। दोनों बैठकर बातें करने लगे। तभी कोई दरवाजा खटखटाने लगा। अब्रार की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। लेकिन गुलाबो ने दौड़कर दरवाजा खोला। सामने वाले शख्स ने उसे अखबार में लिपटी हिन्दुस्तानी व्हिस्की का एक पौवा दिया।
  • 'मैं एक गिरी हुई लड़की हूं, एक वेश्या, पर तुम तो ऐसे नहीं। तुम्हारे मुंह से ये अपशब्द शोभा नहीं देते।'

विज्ञापन
Making story of Guru Dutt's Pyaasa
गुरु दत्त (1925-1964)

विस्तार

गुरुदत्त की फिल्म 'प्यासा' को हिन्दी सिनेमा इतिहास की दुर्लभ फिल्मों में से एक है। फिल्म की पढ़ाई होने वाले संस्‍थानों में इसे भगवान की तरह पूजते हैं। इसके बनने में एक वेश्या का बहुत बड़ा योगदान है। इसके बारे में फिल्म के लेखक अब्रार आल्वी की किताब 'टेन ईयर्स विद गुरुदत्त' में बड़े ही विस्तार से और भावनात्मक तरीके से बताते हैं।
विज्ञापन


एक दिन अब्रार से उनके कॉलेज के दिनों के कुछ दोस्त मिलने आए। उन्हें लेकर समुद्र किनारे निकल गए। वहां कुछ बातचीत के बाद तीन लड़कियां पेश की गईं। उनमें दो पंद्रह-सोलह साल की थी और तीसरी अट्ठाइस-उनतीस साल की। अब्रार से उनमें एक चुनने के लिए कहा गया। अब्रार बताते हैं कि तब वह इन मामलों में 'अनाड़ी' थे। उनकी समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। दोस्तों की जिद थी कि कोई एक चुननी पड़ेगी मजबूरी में अब्रार ने बड़ी उम्र की औरत की ओर इशारा किया।
विज्ञापन


अब्रार बताते हैं कि इस पर वह औरत भौंचक्की रह गई। उसने परेशान होकर कहा, 'इन कमसिन कलियों के होते हुए, मुझे'। हालांकि फिर शाम ढली, रात आई, जैसे रात जवान होती गई, उनके सारे दोस्त समुद्र किनारे लड़कियां लेकर निकलते गए। लेकिन अब्रार वहीं उस औरत के साथ एक कुटीर में बैठे रहे, उससे बात करने पर पता चला उसका नाम, 'गुलाबो' है।
विज्ञापन
विज्ञापन


फिल्म 'प्यासा' में गुलाबो की पहली झलक भ्रामक है। वह अपनी पीठ कैमरे की ओर किए खड़ी होती है, एक महीन, पारदर्शी साड़ी में लिपटी। जैसे फिल्‍म आगे बढ़ती है, गुलाबो का चरित्र खुलकर सामने आता है। वह एक पारंपरिक सड़कछाप वेश्या है। लेकिन उसमें एक गरिमा छिपी है साथ ही उस शायर के लिए प्रेम और सम्मान भी। यह कोई कोरी कल्पना नहीं। उस रात के बाद अब्रार और गुलाबो के बीच पनपे रिश्ते की असल कहानी है।

'मेरी गोद में बैठ जा ना बुद्धू'

Making story of Guru Dutt's Pyaasa
गुरु दत्त (1925-1964)
अब्रार एक लेखक थे। स्वभावतन लेखक किस्म के आदमियों को जिंदगियों की अनुभव खींचते हैं। उस रात जब अब्रार को उनके दोस्त गुलाबों सौंप कर रंगरेलिया मनाने में व्यस्त हो गए, तब अब्रार उस औरत से लगातार बातें करते रहे। सुबह करीब छह बजे जब अब्रार के दोस्त आए तो वह वहां से तत्काल चले जाना चाहते थे। लेकिन अब्रार का मन था कि उन्हें उसी कार में बिठाया जाए, जिसमें गुलाबो को बैठाया जा रहा है, ताकि वह उससे थोड़ी और बात कर सकें।

अब्रार बताते हैं कि इन सब के बीच अचानक गुलाबो ने अचानक मेरी कलाई पकड़कर कहा, 'मेरे साथ चलो ना, कुछ देर और साथ रहेगा'‌। मैंने कहा, 'कार में इतनी जगह नहीं है कि सब अट पाएं', तो उसने कहा, 'मेरी गोद में बैठ जा ना बुद्धू' और हंसने लगी। किताब लिखे जाने तक अब्रार की अच्छी खासी उम्र हो चली थी, लेकिन उनकी यादयाश्त की दाद देनी पड़ेगी। उन्हें पूरी तरह से याद था। गुलाबो का घर बस स्टेशन के बाद पहली गली यानि तेली गली के पास गुलाबो का निवास था। उसका कोठा मुर्गी गली में था।

उस एक रात में अब्रार ने गुलाबो के साथ शारीरिक संबंध तो नहीं बनाए थे, लेकिन उन्होंने गुलाबो को इतना आकर्षित कर लिया था कि गुलाबो ने खुद ही उनसे आगे मिलने के तरीके ढूंढ़ने लगी थी। एक दिन अब्रार उसके निवास स्‍थान पर उससे मिलने गए तो एक लड़की ने बहाना बनाकर उन्हें गुलाबो से  मिलने से रोकने की कोशिश की। लेकिन गुलाबो ने उसे सुन लिया और शेरनी की तरह उस पर झपट्टा मार पड़ी। एक-दूसरे नोचते-खरोचते गुलाबो ने अब्रार का हा‌‌थ पकड़ा और एक टैक्सी में बैठ गई।

कुछ देर बाद एलिफिंस्टिन रोड स्थित एक इमारत के सामने टैक्सी रोकवाई। अब्रार के पास टैक्सी वाले को देने को पैसे भी नहीं थे। अब्रार बताते हैं कि उन्होंने खुद को बेहद असहाय महसूस किया। वहां हल्की और फीकी रोशनी थी और कमरे में बस एक ही बिस्तर था। दोनों बैठकर बातें करने लगे। तभी कोई दरवाजा खटखटाने लगा। अब्रार की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। लेकिन गुलाबो ने दौड़कर दरवाजा खोला। सामने वाले शख्स ने उसे अखबार में लिपटी हिन्दुस्तानी व्हिस्की का एक पौवा दिया।

पहले कभी नहीं देखी थी ऐसी गुलाबो

Making story of Guru Dutt's Pyaasa
गुरु दत्त (1925-1964)
अब्रार कहते हैं कि उस रात पीते-पिलाते और बातें करते उन्होंने ऐसी गुलाबो देखी जो पहले कभी नहीं देखी थी। वह कहते हैं, 'मुझे याद है कि बातों के बीच में मैंने एक बार गालियों की झड़ी लगा डाली। जिसे सुनते ही गुलाबो ने आगे झुककर मेरे मुंह पर हाथ रख दिया। अरे ये क्या, क्यों मुझे रोक रही हो! उसने मुझे एक पल के लिए देखा और अपना सिर दीवार की तरफ घुमाते हुए अपने हाथों से अपनी आंखें बंद करते हुए दिल पर लगने वाली बात बोली।'

गुलाबो ने अब्रार से कहा, 'मैं एक गिरी हुई लड़की हूं, एक वेश्या, पर तुम तो ऐसे नहीं। तुम्हारे मुंह से ये अपशब्द शोभा नहीं देते।' बाद पता चला गुलाबो जन्म से वेश्यावृति के धंधे में नहीं थी। वह मजबूरन इस धंधे में आई थी। उसका जन्म एक हिन्दु ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उसका नाम, 'देवी' था। किशोरावस्था में एक मनमोहक हृष्टपुष्ट सिपाही पर उसका दिल आ गया। उसी के चक्कर में वह घर छोड़कर भाग गई। लेकिन भागने के बाद पता चला वह पहले से शादीशुदा है।

बेघर और विवशता की हालत में वह इधर-उधर भटक रही थी। तभी एक कोठे वाली मौसी की नजर उस पर पड़ी। और वही से वो 'देवी', 'गुलाबो' हो गई। एक तरफ गुलाबो खुलती गई। दूसरी तरफ अब्रार 'मिस्टर एंड मिसिज 55' में व्यस्त होते गए। उन दिनों को याद करते हुए अब्रार बताते हैं, 'मुझे कभी-कभी ऐसा लगता था कि मैं गुलाबो पर कठोर हो रहा था, उसकी मित्रता को गंभीरता से नहीं ले रहा था।' कुछ सोचकर अब्रार धीरे कहते हैं, 'कुछ भी हो उस समय की सच्चाई यही थी। आज अगर जब मैं उन दिनों को याद करता हू तो मेरा मन ग्लानि से भर जाता है'। क्या हुआ इसके बाद गुलाबो का।

क्या हुआ गुलाबो का, कहां है वो

Making story of Guru Dutt's Pyaasa
गुरु दत्त (1925-1964)
कई दिनों अपनी शूटिंग में व्यस्त रहने के बाद एक दिन अचानक जब अब्रार गुलाबो से मिलने पहुंचे तो एक लड़के ने  उन्हें रोका, 'मेरी मां बहुत बीमार है। पिताजी उसे डॉक्टर के पास ले गए हैं। वह जल्दी ही आती होगी। उसने मुझसे कहा था कि आप आ सकते हैं। वह चाहती थी उसके आने तक आप रुको।'

कुछ देर बाद वो आ गई। कुछ बातों के बाद अब्रार जाने लगे। इस पर अचानक उनको देखा और बोली, 'तुम अब नहीं आओगे न। अब तुम व्यस्त हो चले हो। तुम अपनी गुलाबो को भूल जाओगे। जब कभी भूले भटके मुझसे मिलने आओगे तब बहुत देर हो चुकी होगी।' असल में उसे टीबी हो गई थी।

एक दिन अब्रार उससे मिलने को व्याकुल हुए। वह उसी इलाके से बस से गुजर रहे थे। उन्होंने बाहर झांक कर देखा गुलाबो की शव यात्रा गुजर रही थी। पता नहीं क्या उसके चेहरे को नहीं ढका गया था।

एक दिन घर में बैठकर अब्रार ने अपने दिल की ये टीस बस यूं ही गुरुदत्त को सुनाई। गुरुदत्त कहानी पर संम्मोहित हो गए। उन्होंने इस पर फिल्म बनाने की ठान ली। फिल्म बनाते वक्त इसमें आवश्यकतानुसर जोड़-घटाव किए गए। लेकिन मूल कहानी यहीं से उपजी। फिल्म कुछ पंक्तियां तो हूबहू वैसी की वैसी रखी गई जैसी गुलाबो के मुंह से निकली थीं।
विज्ञापन
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय Hindi News वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें मनोरंजन समाचार से जुड़ी ब्रेकिंग अपडेट। मनोरंजन जगत की अन्य खबरें जैसे बॉलीवुड न्यूज़, लाइव टीवी न्यूज़, लेटेस्ट हॉलीवुड न्यूज़ और मूवी रिव्यु आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़।
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed