Jaadugar Movie Review: अमोल पालेकर बनने की कोशिश में चूके जितेंद्र कुमार, ‘जादूगर’ में नहीं चला सचिवजी का जादू
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जितेंद्र कुमार का डिजिटल मनोरंजन दुनिया में अपना एक अलग फैन बेस है। ‘कोटा फैक्ट्री’ से लेकर ‘पंचायत’ तक इसका विस्तार ही होता रहा है। ओटीटी वाले भी उनके प्रशंसक हैं और ये बात जितेंद्र कुमार को रास आ रही है। काल्पनिक कहानियों के वह नए अमोल पालेकर हैं और अमोल पालेकर की ही तरह इन कहानियों के हर किरदार में बस जितेंद्र कुमार ही नजर आते हैं। उनकी इसी शख्सियत को ध्यान में रखकर कहानियां लिखी जा रही हैं। उनके हर किरदार का डीएनए एक जैसा है। छोटे शहर का युवक। आंखों में तैरते सतरंगी सपने। इन सपनों को पूरा करने की जद्दोजहद और इस जद्दोजहद के बहाने छोटे शहरों की आम जिंदगी पर घूमता कैमरा। ‘पंचायत’ सीरीज के गांव फकौली को बदलकर अगर नीमच कर दिया जाए और सचिवजी को पंचायत कार्यालय से निकालकर गांव में जादू करने को कह दिया जाए तो बन जाती है फिल्म ‘जादूगर’। जितेंद्र कुमार की उपलब्धि इस फिल्म में यही है कि वह एक ऐसी फिल्म के हीरो हैं, जिस नाम की फिल्म के हीरो साल 1989 में अमिताभ बच्चन बने थे।
ये लड़का हीरो नहीं हो सकता...
नीमच गांव का मीनू आशिक मिजाज किस्म का है। वह इंतजार नहीं करता। उसके जीवन से एक लड़की जाती है कि दूसरी आ जाती है। आईआईटी से पढ़कर निकले बिस्वपति सरकार कहानी यूं लिखते हैं कि छोटे शहर में कोई भी युवक किसी लड़की का तब तक पीछा करने के लिए आजाद है जब तक कि वह मान न जाए। मीनू भी यही कर रहा है। हीरो से दर्शकों को सहानुभूति उसकी हरकतों से तो होने से रही तो उसके माता पिता को हादसे में मारना पड़ता है। अब हीरो अनाथ है। चाचा ने उसके पिता की फुटबॉल की विरासत संभाली हुई है। भतीजे को वह अपनी टीम में रखना चाहते हैं और दोनों के सपनों का संगम अगले टूर्नामेंट की जीत के सपने पर आकर होता है। कहानी खराब नहीं है लेकिन लंबी बहुत है। इतनी लंबी कि आप फिल्म देखते देखते घर के दूसरे काम भी निपटाते रह सकते हैं और लौटकर वापस आएंगे तो कहानी में कुछ खास छूटेगा नहीं।
टीवीएफ की तिकड़ी का जादू बेअसर
फिल्म ‘जादूगर’ के निर्देशक समीर सक्सेना टीवीएफ की सीरीज का प्रोडक्शन संभालते रहे हैं। टीवीएफ के ही साथियों बिस्वपति सरकार और जितेंद्र कुमार के साथ उन्होंने ये फिल्म टीवीएफ के बैनर से बाहर निकलकर बनाई है। तीनों के पास ये सर्टिफिकेट भी है कि उनकी सीरीज में मनोरंजन खूब होता है। और, इस सर्टिफिकेट का अति आत्मविश्वास ही इस फिल्म को ले डूबता है। मध्य प्रदेश के नीमच कस्बे के किसी खिलाड़ी ने कभी एशियाई खेलों में जबर्दस्त पेनाल्टी किक मारी थी। उस खिलाड़ी के नाम पर ये कस्बा फुटबॉल टूर्नामेंट कराता है। फुटबॉल हिंदी सिनेमा का ‘हिप हिप हुर्रे’ के जमाने से पसंदीदा विषय रहा है। बिस्वपति सरकार ने यहां एक स्पोर्ट्स ड्रामा में लव स्टोरी मिला दी है। इन दिनों हिंदी फिल्मों की कहानियां ऐसे ही लिखी जा रही हैं। कोई दो हिट फिल्में ले लो और उनका कॉकटेल बना दो।
जरूरत से ज्यादा लंबी फिल्म
खैर, फिल्म बन गई है तो रिलीज तो होगी ही और ‘पंचायत’ का दूसरा सीजन भी हिट हो चुका हो तो फिर ‘जादूगर’ को रिलीज करने का इससे बेहतरीन मौका दूसरा हो भी क्या सकता है। ये फिल्म अगर सिनेमाघरों में रिलीज हुई होती तो तय है कि आधे दर्शक बीच फिल्म में ही निकलने शुरू हो जाते। दो घंटे 46 मिनट की ओटीटी फिल्म सोचकर ही थकान होने लगती है। लेकिन, यूं लगता है कि इसके निर्देशक समीर सक्सेना ने जो कुछ शूट कर लिया, उनके एडीटर ने देव राव जाधव ने उसमें से जरा सा भी फुटेज छोड़ा नहीं है। फिल्म की कहानी बोरिंग है और संवाद इसके ऐसे कि मालूम पड़ता है पूरे फिल्मी हैं। हां, फिल्म के एक दो दृश्य असर करते हैं जैसे, रात में रास्ता भटकी लड़की को साइकिल की घंटी बजाकर घर तक पहुंचाने की कोशिश।
बोर करने लगे हैं जितेंद्र कुमार
अभिनय के मामले में जितेंद्र कुमार से ज्यादा आरुषि शर्मा प्रभावित करती हैं। जितेंद्र कुमार ओटीटी के राजकुमार राव हैं। उनका नाम बिक रहा है। वह इसकी उगाही भी अच्छे से कर रहे हैं लेकिन ओटीटी की कहानियों की उम्र बहुत छोटी होती है। ये बिल्कुल कुल्फी की तरह है। कुल्फी खत्म। मजा खत्म। और, जितेंद्र कुमार की कोशिश है कि किसी तरह वह वेब सीरीज के ताने बाने से निकलकर फिल्मों के हीरो बन जाएं। बड़े परदे पर भी वह कोशिश कर ही चुके हैं। लेकिन, जैसी कोशिशें वह कर रहे हैं, उससे उनका ओटीटी का दर्शक भी उनसे जल्दी ही ऊब सकता है। जावेद जाफरी जैसे काबिल अभिनेता को कैरीकैचर जैसे किरदार मिलना ही इस बदलते दौर की बानगी है। मनोज जोशी को परदे पर मुस्कुराते देखना जरूर अच्छा लगता है।
देखें कि न देखें
फिल्म ‘जादूगर’ दरअसल किसी लंबी वेब सीरीज की तरह है। इसे बनाने वालों को शायद लगा होगा कि अगर ये वेब सीरीज होगी तो इसका पहला एपीसोड देखने के बाद शायद ही लोग अगले एपीसोड तक जाएं तो दो घंटे 46 मिनट की पूरी फिल्म ही बनाकर एक साथ रिलीज कर देना ही बेहतर। फिल्म न भी देखें तो कुछ खास आपसे छूटेगा नहीं और हां जितेंद्र कुमार के चलते देखनी ही हो तो आधा आधा घंटा करके चार पांच दिन में भी फिल्म निपटाई जा सकती है।