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गुरुदत्त के काम करने का ऐसा था अंदाज
जनार्दन पांडेय/अमर उजाला, दिल्ली
Updated Wed, 23 Mar 2016 07:22 PM IST
सार
- जब आठवें दिन गुरुदत्त ने अब्रार को अपना फैसला सुनाया, "मैं चाहता हूं कि 'गुरुदत्त फिल्म्स' की अगली फिल्म का लेखक अब्रार आल्वी हो।"
- वह बिल्कुल सीधे-सादे कपड़ों में थीं। चेहरे की एकरसता को भंग करने के लिए लिपिस्टिक भी नहीं। एक दो सवालों का हां-ना में जवाब देकर बोली, 'अब मैं चलूंगी'।
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गुरु दत्त (1925-1964)
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विस्तार
गुरुदत्त हिन्दी सिनेमा के पारखी थे। उन्हें यूं किसी का लेखन, किसी का अभिनय या किसी का निर्देशन पसंद नहीं आता था। लेकिन जिस पर उनका दिल आ जाता था, उसको वह पूरी तरह अपना बनाना चाहते थे। उनके घनिष्ट मित्र अब्रार आल्वी इसके बारे में विस्तार से बताते हैं।
बात उन दिनों की है, जक गुरुदत्त फिल्म इंडस्ट्री में अपना पैर जमाने की कोशिश कर रहे थे। फिल्म बाज (1953) की शूटिंग चल रही थी। फिल्म के मुख्य सहायक राज खोसला एक सीन को लेकर उलझे हुए थे। दत्त को उनकी लेखनी पसंद नहीं आ रही थी। तभी एक नौजवान युवक ने राज खोसला को सीन को लेकर कुछ समझाया। गुरुदत्त उस नवयुवक को ध्यान से सुन रहे थे। उस युवका फिल्म की दुनिया से अभी कोई खासा जुड़ाव नहीं था। लेकिन दत्त को उसके सीन समझाने का अंदाज पसंद आ गया था। फिर क्या, वही हुआ जो गुरुदत्त को किसी के पसंद आने के बाद होता है।
गुरदत्त ने युवक को अपने घर पर बुलवाया। उसे एक सीन समझाया और उस सीन को लिखने के लिए कहा। फिर बोले, 'मैं ऑफिस जा रहा हूं'। युवक ने सोचा उसे भी घर चले जाना चाहिए और अगले दिन आकर अच्छे से सीन सुनाएगा। यह देख गुरुदत्त बोले, 'कहां, चले जनाब! मैं साढ़े बारह बजे वापस आऊंगा और देखूंगा कि क्या प्रगति की है आपने।'
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फिर गुरुदत्त ने अपने रसोइए को बुलाकर समझाया, 'इन्हें भूख लगे तो खाना और आवश्यकानुसार चाय पानी देते रहना।' युवक को तभी अंदाजा लग गया कि वह लेखक कम बंधक ज्यादा हो गया था। लेकिन युवक को कहा मालूम था कि गुरुदत्त के काम करने का अंदाज ही यही था। उसे कब प्रतीत हुआ था कि वह गुरुदत्त फिल्म्स के लिए आगे चलकर कई फिल्मों का लेखन करेगा और इस बैनर का सबसे अहम हिस्सा बन जाएगा।
वह नवयुवक थे, अब्रार आल्वी। उस दिन साढ़ बारह बजे का आने को कहकर गुरुदत्त करीब साढ़ पांच बजे लौटे। लेकिन लौटते ही अब्रार के काम का जायजा लिया। पूरा सीन सुना लेकिन कुछ बोले नहीं। बस इतना पूछा कि घर जाकर सोना चाहोगे या यही सोना पसंद करोगे। क्योंकि कल सुबह साढ़ नौ बजे से फिर से तुम्हें यही काम करना है। अब्रार बताते हैं कि यह दिनचर्या उनकी करीब सात दिनों तक चलती रही। वह दिनभर सीन लिखते फिर शाम को गुरुदत्त को सुनाते। गुरुदत्त सुनते और अगला सीन बता देते।
आठवें दिन गुरुदत्त ने अब्रार को अपना फैसला सुनाया, "मैं चाहता हूं कि 'गुरुदत्त फिल्म्स' की अगली फिल्म का लेखक अब्रार आल्वी हो।" एक लड़का जिन्होंने सेट पर महज एक सीन की व्याख्या करते सुना था उसे अपने घर बुलाया और सात दिन तक लिखवाते रहे और फैसला कर लिया कि यही उनकी अगली फिल्म लिखेगा। ऐसे थे गुरुदत्त। वहीदा रहमान के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था।
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बात उन दिनों की है, जक गुरुदत्त फिल्म इंडस्ट्री में अपना पैर जमाने की कोशिश कर रहे थे। फिल्म बाज (1953) की शूटिंग चल रही थी। फिल्म के मुख्य सहायक राज खोसला एक सीन को लेकर उलझे हुए थे। दत्त को उनकी लेखनी पसंद नहीं आ रही थी। तभी एक नौजवान युवक ने राज खोसला को सीन को लेकर कुछ समझाया। गुरुदत्त उस नवयुवक को ध्यान से सुन रहे थे। उस युवका फिल्म की दुनिया से अभी कोई खासा जुड़ाव नहीं था। लेकिन दत्त को उसके सीन समझाने का अंदाज पसंद आ गया था। फिर क्या, वही हुआ जो गुरुदत्त को किसी के पसंद आने के बाद होता है।
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गुरदत्त ने युवक को अपने घर पर बुलवाया। उसे एक सीन समझाया और उस सीन को लिखने के लिए कहा। फिर बोले, 'मैं ऑफिस जा रहा हूं'। युवक ने सोचा उसे भी घर चले जाना चाहिए और अगले दिन आकर अच्छे से सीन सुनाएगा। यह देख गुरुदत्त बोले, 'कहां, चले जनाब! मैं साढ़े बारह बजे वापस आऊंगा और देखूंगा कि क्या प्रगति की है आपने।'
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फिर गुरुदत्त ने अपने रसोइए को बुलाकर समझाया, 'इन्हें भूख लगे तो खाना और आवश्यकानुसार चाय पानी देते रहना।' युवक को तभी अंदाजा लग गया कि वह लेखक कम बंधक ज्यादा हो गया था। लेकिन युवक को कहा मालूम था कि गुरुदत्त के काम करने का अंदाज ही यही था। उसे कब प्रतीत हुआ था कि वह गुरुदत्त फिल्म्स के लिए आगे चलकर कई फिल्मों का लेखन करेगा और इस बैनर का सबसे अहम हिस्सा बन जाएगा।
वह नवयुवक थे, अब्रार आल्वी। उस दिन साढ़ बारह बजे का आने को कहकर गुरुदत्त करीब साढ़ पांच बजे लौटे। लेकिन लौटते ही अब्रार के काम का जायजा लिया। पूरा सीन सुना लेकिन कुछ बोले नहीं। बस इतना पूछा कि घर जाकर सोना चाहोगे या यही सोना पसंद करोगे। क्योंकि कल सुबह साढ़ नौ बजे से फिर से तुम्हें यही काम करना है। अब्रार बताते हैं कि यह दिनचर्या उनकी करीब सात दिनों तक चलती रही। वह दिनभर सीन लिखते फिर शाम को गुरुदत्त को सुनाते। गुरुदत्त सुनते और अगला सीन बता देते।
आठवें दिन गुरुदत्त ने अब्रार को अपना फैसला सुनाया, "मैं चाहता हूं कि 'गुरुदत्त फिल्म्स' की अगली फिल्म का लेखक अब्रार आल्वी हो।" एक लड़का जिन्होंने सेट पर महज एक सीन की व्याख्या करते सुना था उसे अपने घर बुलाया और सात दिन तक लिखवाते रहे और फैसला कर लिया कि यही उनकी अगली फिल्म लिखेगा। ऐसे थे गुरुदत्त। वहीदा रहमान के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था।
गुरुदत्त को भा गई थीं वहीदा, फिर क्या हुआ
गुरु दत्त (1925-1964)
एक बार गुरुदत्त अपने मित्र अब्रार आल्वी के साथ हैदाराबाद के निकट सिंकदाबाद में एक डिस्ट्रीब्यूटर मुरुदेश्वर राव से मिलने पहुंचे थे। तभी एक कार के पीछे कुछ लड़के दौड़ते हुए दिखे। कार रुकी और उसमें से एक लड़की उतरी और लड़कों से जान छुड़ाने के लिए दौड़ती हुई इमारत में घुस गई। अब्रार कहते हैं, गुरुदत्त बहुत ही जिज्ञासु थे, उनकी लड़की के बारे में जिज्ञासा बढ़ी, लेकिन कुछ बोले नहीं। हालांकि पता चला कि वह एक डांसर है। हाल ही में आई दक्षिण भारतीय फिल्म 'रोजुलु मरायी' इसी लड़की के डांस के कारण सुपरहिट हो गई है।
यह जानने के बाद गुरुदत्त की दिलचस्पी लड़की बारे में जानने से ज्यादा उस फिल्म को देखने में हो गई। चूंकि गुरुदत्त पूर्णतः सिनेमा को सिनेमा के लिए समर्पित थे, इसलिए वो सबकुछ फिल्म से जोड़कर देखते थे। हालांकि मुरदेश्वर ने मौका देखकर पूछ लिया कि क्या दत्त उस लड़की से मिलना चाहेंगे? भले ही गुरुदत्त के हाथ तब तक कोई बहुत बड़ी सफलता हाथ नहीं लगी थी, लेकिन वह खुद को एक निर्माता के तौर पर स्थापित कर चुके थे। ऐसे में किसी नए कलाकार के लिए वह किस्मत बदलने वाला साबित हो सकते थे।
हांलांकि जब वह लड़की गुरुदत्त से मिलने आई तो उसके बारे में जो अबतक सुना था उससे एकदम विपरीत निकली। वह बिल्कुल सीधे-सादे कपड़ों में थीं। चेहरे की एकरसता को भंग करने के लिए लिपिस्टिक भी नहीं। एक दो सवालों का हां-ना में जवाब देकर बोली, 'अब मैं चलूंगी'। यहां तो वह बिल्कुल प्रभाव नहीं छोड़ पाईं। लेकिन जब गुरुदत्त ने वह फिल्म देखी तो अब्रार से पहला सवाल यही पूछा, 'कैसी है वह?' अब्रार ने कहा, 'बहुत ही फोटोजेनिक'। 'मेरा भी यही खयाल है' यह कहकर गुरुदत्त मुंबई लौट आए।
फिर जब वह सीआईडी बना रहे थे, तो एक ऐसे चरित्र की आवश्यकता पड़ी जो नाच-गाकर अपनी सेक्स अपील से नायक को लुभाना था। तब गुरुदत्त को फिर से वो तेलगू डांसर याद आई। लेकिन चौंकाने वाली बात ये कि गुरुदत्त ने हैदराबाद के एक डिस्ट्रिब्यूटर मनु भाई को फोन मिलाकर कहा कि वह तेलगू डांसर को तीन साल के लिए अनुबंधित कर लें। वह वह हमारे लिए काम करेगी। यह डांसर कोई और नहीं वहीदा रहमान थीं। असल में गुरुदत्त अपने फैसले सोच समझकर लेते थे, लेकिन जिस पर उंगली रखते थे, उसे फिर किसी और के साथ नहीं देख पाते थे। जॉनी वॉकर के लिए तो वो पूरी फिल्म का स्क्रिप्ट बदलवा देते थे।
यह जानने के बाद गुरुदत्त की दिलचस्पी लड़की बारे में जानने से ज्यादा उस फिल्म को देखने में हो गई। चूंकि गुरुदत्त पूर्णतः सिनेमा को सिनेमा के लिए समर्पित थे, इसलिए वो सबकुछ फिल्म से जोड़कर देखते थे। हालांकि मुरदेश्वर ने मौका देखकर पूछ लिया कि क्या दत्त उस लड़की से मिलना चाहेंगे? भले ही गुरुदत्त के हाथ तब तक कोई बहुत बड़ी सफलता हाथ नहीं लगी थी, लेकिन वह खुद को एक निर्माता के तौर पर स्थापित कर चुके थे। ऐसे में किसी नए कलाकार के लिए वह किस्मत बदलने वाला साबित हो सकते थे।
हांलांकि जब वह लड़की गुरुदत्त से मिलने आई तो उसके बारे में जो अबतक सुना था उससे एकदम विपरीत निकली। वह बिल्कुल सीधे-सादे कपड़ों में थीं। चेहरे की एकरसता को भंग करने के लिए लिपिस्टिक भी नहीं। एक दो सवालों का हां-ना में जवाब देकर बोली, 'अब मैं चलूंगी'। यहां तो वह बिल्कुल प्रभाव नहीं छोड़ पाईं। लेकिन जब गुरुदत्त ने वह फिल्म देखी तो अब्रार से पहला सवाल यही पूछा, 'कैसी है वह?' अब्रार ने कहा, 'बहुत ही फोटोजेनिक'। 'मेरा भी यही खयाल है' यह कहकर गुरुदत्त मुंबई लौट आए।
फिर जब वह सीआईडी बना रहे थे, तो एक ऐसे चरित्र की आवश्यकता पड़ी जो नाच-गाकर अपनी सेक्स अपील से नायक को लुभाना था। तब गुरुदत्त को फिर से वो तेलगू डांसर याद आई। लेकिन चौंकाने वाली बात ये कि गुरुदत्त ने हैदराबाद के एक डिस्ट्रिब्यूटर मनु भाई को फोन मिलाकर कहा कि वह तेलगू डांसर को तीन साल के लिए अनुबंधित कर लें। वह वह हमारे लिए काम करेगी। यह डांसर कोई और नहीं वहीदा रहमान थीं। असल में गुरुदत्त अपने फैसले सोच समझकर लेते थे, लेकिन जिस पर उंगली रखते थे, उसे फिर किसी और के साथ नहीं देख पाते थे। जॉनी वॉकर के लिए तो वो पूरी फिल्म का स्क्रिप्ट बदलवा देते थे।
'जॉनी को कैसे भी कर के इस फिल्म में घुसाओ'
गुरु दत्त
कहते हैं गुरुदत्त का दिल जिस पर आ जाता था, उसे वह हर पल अपने आसपास देखना चाहते थे। वहीदा के साथ ऐसा ही हुआ था, फिल्म का निर्देशक कोई हो, सीन कुछ भी हो अगर वहीदा उसमें अभिनय कर रही हैं, तो किसी और को अनुमति थी कि वह वहीदा को निर्देशित करे। अब्रार बताते हैं कि जॉनी वॉकर को लेकर भी गुरुदत्त उतने ही संवेदनशील थे। वह किसी भी हाल में अपनी फिल्म में जॉनी को लेना चाहते थे, चाहे उनके लिए स्क्रिप्ट में जगह न हो।
अब्रार बताते हैं, 'गुरुदत्त अपनी हर फिल्म में जॉनी वॉकर को लेना चाहते थे, और बस लेना नहीं चाहते थे, बल्कि उनके हिस्से अच्छी खासी भूमिका भी मांग करते थे।' अब्रार के मुताबिक, प्यार में जॉनी वॉकर के लिए कोई भूमिका नहीं थी। लेकिन फिल्म के आखिर में गुरुदत्त ने अपनी ओर से फिर से जॉनी के लिए सीन लिखने के लिए आदेश दिया। उसे फिल्म में कैसे प्रयोग करना है, इसकी जिम्मेदारी खुद ले ली।
यही नहीं, अब्रार बताते हैं कि दत्त ने 'कागज के फूल' जैसी फिल्म में जिसमें कॉमेडी बिल्कुल गुंजाइश नहीं थी, उसमें भी जॉनी वॉकर और महमूद के लिए गुरुदत्त ने जबरन भूमिकाएं बनावाईं। 'साहिब बीबी और गुलाम' में जब अब्रार ने जॉनी के लिए कोई किरदार नहीं लिखा तो उनकी दत्त से अनबन तक हो गई। असल में दत्त को विश्वास हो चला था कि उनकी फिल्मों में जॉनी का होना जरूरी है, वरना फिल्म नहीं चलेगी।
(किताबः टेन ईयर्स विद गुरुदत्त, लेखिकाः सत्या सरन)
अब्रार बताते हैं, 'गुरुदत्त अपनी हर फिल्म में जॉनी वॉकर को लेना चाहते थे, और बस लेना नहीं चाहते थे, बल्कि उनके हिस्से अच्छी खासी भूमिका भी मांग करते थे।' अब्रार के मुताबिक, प्यार में जॉनी वॉकर के लिए कोई भूमिका नहीं थी। लेकिन फिल्म के आखिर में गुरुदत्त ने अपनी ओर से फिर से जॉनी के लिए सीन लिखने के लिए आदेश दिया। उसे फिल्म में कैसे प्रयोग करना है, इसकी जिम्मेदारी खुद ले ली।
यही नहीं, अब्रार बताते हैं कि दत्त ने 'कागज के फूल' जैसी फिल्म में जिसमें कॉमेडी बिल्कुल गुंजाइश नहीं थी, उसमें भी जॉनी वॉकर और महमूद के लिए गुरुदत्त ने जबरन भूमिकाएं बनावाईं। 'साहिब बीबी और गुलाम' में जब अब्रार ने जॉनी के लिए कोई किरदार नहीं लिखा तो उनकी दत्त से अनबन तक हो गई। असल में दत्त को विश्वास हो चला था कि उनकी फिल्मों में जॉनी का होना जरूरी है, वरना फिल्म नहीं चलेगी।
(किताबः टेन ईयर्स विद गुरुदत्त, लेखिकाः सत्या सरन)