Fire Of Love Red Review: साल के पहले शुक्रवार को कीजिए सिनेमाघरों से तौबा, सस्पेंस के नाम पर मजाक निकली फिल्म
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
साल 2024 की शुरुआत और पहले ही हफ्ते में सिनेमाघरों में ‘फायर ऑफ लव: रेड’। फिल्म में पोस्टर और पायल घोष का लहंगा छोड़ के और कुछ भी लाल नजर नहीं आया। फिल्म को निर्देशक अशोक त्यागी ने बनाया है जो इससे पहले ‘रियासत’ फिल्म बना चुके हैं। ‘रेड’ में भी अशोक त्यागी ने वही किया जो इन्होंने ‘रियासत’ में किया था यानी एक ही सीन को बार बार दोहराना। इरादे उनके ‘बरसात’ और ‘महल’ जैसी थ्रिलर बनाने के रहे होंगे, लेकिन दर्शकों के सामने जो आया है वह ‘क्राइम पेट्रोल’ और ‘सीआईडी’ के एक लंबे एपिसोड से ज्यादा कुछ नहीं हैं। भर भर के गालियां हैं, ड्रग्स है और पायल घोष हैं। बस फिल्म नहीं है।
फिल्म की कहानी शुरु होती है मशहूर लेखक राजवीर सिन्हा की किताब विमोचन से और फिर क्राइम शो के एपिसोड जैसे एक सुनसान सड़क पर उन्हें रानी और जग्गू मिलते हैं जो पुलिस से भाग रहे होते हैं क्योंकि जग्गू ने रानी को बचाने के लिए गांव के किसी दुकानदार की हत्या कर दी है। राजवीर उन्हें अपने फॉर्महाउस ले जाता है और अपने डाक्टर से जग्गू का इलाज करवाता है। रानी को राजवीर अपनी पत्नी के बारे में बताता है और बातों में उलझाता है। और, रानी का पलक झपकते ही गांव की गोरी से शहर की मैम में काया पलट कर दिया जाता है। फिर पता चलता है कि राजवीर बाइपोलर है। और उसकी पत्नी पूनम? उसकी कहानी उससे भी विचित्र है।
फिल्म के हीरो कृष्णा अभिषेक ने इससे बेहतर अभिनय ‘कामेडी सर्कस’ और ‘द कपिल शर्मा शो’ में की है। इस फिल्म में ऐसा प्रतीत होता है कि कृष्णा अभिषेक ने कोशिश भी नहीं की अभिनय करने की। वह घर से आए, अपने डायलॉग पढ़े और घर चले गए। पायल घोष की एनिमेटेड आवाज और अभिनय के नाम पर अजीब चेहरा बनाना, जबरदस्ती के लव सीन और बोल्डनेस दिखाना। फिल्म के बाकी कलाकारों में भी कोई कुछ खास नहीं कर पाता है। हां, कमलेश सावंत अपने किरदार में एकदम फिट बैठते हैं। उनके स्क्रीन पर आते ही दर्शकों के चेहरे पर मुस्कुराहट तैरती है। भले ही वह कुछ दे के लिए ही हो।
निर्देशन के नाम पर कुछ नहीं
फिल्म के निर्देशक अशोक त्यागी ने फिल्म के सीन यूं लगता है कि क्राइम पेट्रोल और सीआईडी से उठाए हैं। डायलॉग उन्होंने हिंदी सिनेमा के शुरुआत से लेकर ओटीटी के समय तक सारी फिल्मों से ले लिए हैं। गालियां भी वह ओटीटी से उधार ले आए हैं। फिल्म को जबरदस्ती हॉरर फिल्म का संगीत दे कर सस्पेंस बनाने की कोशिश भरपूर की गई है, लेकिन मामला जमा नहीं। नए साल की शुरुआत इस तरह की फिल्म देखकर कोई क्यों ही करना चाहेगा, ये फिल्म के निर्माता ही अच्छी तरह से बता सकते हैं।