Chandigarh Kare Aashiqui Review: दकियानूसी पर चोट करके सिनेमा हुआ ‘आयुष्मान’, एंटरटेनमेंट की नई ‘वाणी’
हिंदी सिनेमा में जब भी कुछ ऐसा बनता है जिसका अंदाजा भी फिल्म बनाने वालों या फिल्म देखने वालों की मौजूदा पीढ़ी को नहीं होता तो उसे प्रगतिशील सिनेमा का नाम दे दिया जाता है। ऐसे प्रगतिशील सिनेमा की तारीफ तो होती है लेकिन इसे देखने वाले कम रह जाते हैं। अपने देश में बहुत कुछ प्रगतिशील होता रहा है। प्रगतिशील लेखक संघ बने हैं। प्रगतिशील निर्देशकों के खेमे भी बने हैं। लेकिन, प्रगतिशील सिनेमा देखने वालों का कोई खेमा नहीं होता। ये वे दर्शक होते हैं जो ठेठ मसाला फिल्मों के दौर में भी कुछ ‘हटकर’ बना सिनेमा देखने की उम्मीद लिए रहते हैं। आयुष्मान खुराना और राजकुमार राव जैसे कलाकार उनकी इस उम्मीद के बैरोमीटर होते हैं। इन दर्शकों का मानना होता है कि इनके जैसे कलाकार जब कोई फिल्म करेंगे तो उन्हें फिल्म देखना ही चाहिए। कभी कभार ‘गुलाबो सिताबो’ और ‘जजमेंटल हैं क्या’ जैसे झटके भी दोनों देते रहते हैं लेकिन दोनों की पसंद और दोनों की हिम्मत अक्सर तारीफ के काबिल ही रहती है। इस बार तालियां आयुष्मान खुराना के लिए बजती दिख रही हैं।
आयुष्मान खुराना जब हिट पर हिट दिए जा रहे थे तो मैंने सबसे पहले लिखा कि वह राजेश खन्ना की बनाई उस लीक पर चल निकले हैं जिसमें कोई कलाकार आधा दर्जन या उससे ज्यादा लगातार हिट फिल्में दे चुका है। आयुष्मान अक्सर ऐसी फिल्में दिल से चुनते हैं। इस बार उन्होंने फिल्म ‘चंडीगढ़ करे आशिकी’ दिमाग से चुनी है। और, बिल्कुल सही चुनी है। ये फिल्म देखा जाए तो आज की नई पीढ़ी से ज्यादा उन लोगों को देखनी चाहिए जो उम्र की फिफ्टी लगा चुके हैं या लगाने वाले हैं। इसके बाद ये फिल्म उन शोहदों और माताओं बहनों के लिए है जो हर दम सामने पड़ने वालों की पसंद-नापसंद को लेकर ‘जज’ बने फिरते हैं। फिल्म की नायिका एक जगह कहती भी है, ‘अरे, आजाद देश है। कोई भी अपने मन की कर सकता है।’ बस यही एक बात एक बड़ी जमात को इस देश में समझनी बाकी है।
फिल्म ‘चंडीगढ़ करे आशिकी’ सबसे बड़ी बात जो समझाती है वह ये कि बच्चे मां बाप की जागीर नहीं होते। बेटा हो या बेटी उसे अपनी मर्जी से अपनी पसंद की जिंदगी जीने का पूरा हक है। मां बाप अगर उसे वाकई प्यार करते रहेंगे तो जरूरत पड़ने पर वह उन्हीं की छांव में आएगा। बस थोड़ा सा प्यार और थोड़ा सा भरोसा, हर बेटे और बेटी को चाहिए होता है। मनु-मानवी-मनु की इस कहानी का असली मर्म भी यही है। बिन मां का बेटा अपनी सीआईडी जैसी बहनों और दूसरी शादी के फेर में लगे पिता की भावनाओँ में पिस रहा है। दादाजी उसे समझते तो हैं लेकिन उनकी वैल्यू घर में रबर स्टाम्प से ज्यादा नहीं है।
मनु का जिम है। मानवी वहां जुंबा सिखाने आती है। जुंबा में कब चुम्मा आ जाता है और कब दोनों दो जिस्म एक जान हो जाते हैं, दोनों को पता चलने से पहले ही सब हो जाता है। तन और मन दोनों भिगाने वाले और देह वर्जनाओं को तोडते एक लंबे दृश्य के बाद कहानी असली प्वाइंट पर आती है और एक ऐसे विषय में दर्शकों को साथ लपेट ले जाती है, जिसके बारे में घरवालों के साथ बात करना भी हिम्मत का काम है।
फिल्म में अगर आपको दीवार पर लगी अर्धानारीश्वर की तस्वीर याद रह जाती है तो याद उस बॉबी डार्लिंग की भी फिल्म देखते खूब आती है, जिसने छोटे परदे पर पूरी दुनिया के सामने ‘सच का सामना’ किया था। डेढ़ दो दशक पहले पंकज शर्मा उर्फ बॉबी डार्लिंग ने जिस हिम्मत के साथ दुनिया का सामना किया। फिल्म ‘चंडीगढ़ करे आशिकी’ का बीज शायद सिमरन साहनी ने वहीं से खोजा हो।
वैसे तो अमूमन फिल्म की कहानी का असल राज फिल्म समीक्षा में खोलना नहीं चाहिए। लेकिन, मुझे लगता है इस फिल्म को देखने का असली आनंद तभी है जब आपको पहले फ्रेम से पता हो कि ये जो हीरोइन है वह दरअसल एक ट्रांस गर्ल है और फिल्म के हीरो को जब इसका पता चलेगा तो भूचाल आने वाला है। फिल्म की कहानी से अनजान दर्शक इस मोड़ पर आकर गच्चा खा सकता है लेकिन पहले से इसके दर्शक अगर मानसिक रूप से तैयार है तो उस परिस्थिति में आने के बाद आयुष्मान खुराना और वाणी कपूर ने जो इस फिल्म में काम किया है, उसकी तारीफ दिल से निकलती है।
फिल्म ‘चंडीगढ़ करे आशिकी’ पूरी तरह से इसके रचयिता अभिषेक कपूर की फिल्म है। फिल्म की शुरुआत वह अपने पुराने साथी सुशांत सिंह राजपूत को याद करते हुए करते हैं। बड़ी बात है। फिल्म अभिनेता जीतेंद्र के भांजे अभिषेक हीरो नहीं बन पाए, सिनेमा के लिए अच्छा ही हुआ। नहीं तो ‘काय पो चे’ ‘रॉक ऑन’ और अब ‘चंडीगढ़ करे आशिकी’ से हिंदी सिनेमा हमेशा के लिए महरूम ही रह जाता। सिनेमा कैसे समाज को नई दिशा दिखा सकता है, एक साथ पीढ़ियों की सोच बदलने में मदद कर सकता है, इस निर्देशक से सीखा जा सकता है।
और, अभिषेक की इस सोच का समर्थन करने वाले आयुष्मान और वाणी दोनों ने अपने निर्देशक की ही तरह इस फिल्म में नेशनल अवार्ड पाने लायक काम किया है। खास तौर से मानवी का अतीत सामने आने के बाद उससे गुस्सा होते मनु के किरदार में आयुष्मान और फिर रेस्तरां में मनु को उसके ही अंदाज में मानवी के किरदार में जवाब देती वाणी के दृश्य कमाल बन पड़े हैं।
पता नहीं कि ‘सूर्यवंशी’ जैसी औसत फिल्मों को थिएटर भर भरकर देखने वाले कितने दर्शक फिल्म ‘चंडीगढ़ करे आशिकी’ देखने जाएंगे लेकिन ये फिल्म साल 2021 की बेहतरीन हिंदी फिल्म है। इसमें ‘बॉब बिस्वास’ जैसी सहजता भले न हो लेकिन फुलटू पंजाबी फ्लेवर वाली ये फिल्म हिंदी पट्टी के दर्शकों को भी आसपास की ही लगेगी। पूरी फिल्म में एक ही संगीतकार रखने से फिल्म कैसे खिलती है, उसके लिए भी ये फिल्म एक सबक है। फिल्म रिलीज करने वाली कंपनी टी सीरीज भी इससे कुछ सीखेगी, उम्मीद तो की ही जा सकती है। सचिन-जिगर अरसे बाद लय में लौटे हैं।
फिल्म के लेखन के लिए तुषार परांजपे और सुप्रपतिक सेन तारीफ के हकदार हैं। बॉस्को सीजर की कोरियोग्राफी फिल्म की धड़कन है तो मनोज लोबो की सिनेमैटोग्राफी इसकी रूह को रंगीन करती संगिनी। चंदन अरोड़ा को खास तौर से बधाई दी जानी चाहिए कि उन्होंने फिल्म को कहीं भी बोझिल नहीं बनने दिया। दो घंटे से भी चार मिनट कम की ये फिल्म इस वीकएंड के लिए बिल्कुल सही फिल्म है। फिल्म को यूए सर्टीफिकेट मिला है। परिवार के साथ जाने का प्लान हो तो इसका ध्यान रखना जरूरी है।