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Bhimsen Joshi: गुरु की तलाश में बचपन में घर से निकल गए थे भीमसेन जोशी, 19 की उम्र में दी मंच पर पहली प्रस्तुति

Sat, 04 Feb 2023 08:41 AM IST
ज्योति राघव एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: ज्योति राघव Updated Sat, 04 Feb 2023 08:41 AM IST
सार

पंडित भीमसेन जोशी को संगीत में उनके योगदान के लिए भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा उन्हें पद्म विभूषण, पद्म भूषण समेत कई अन्य प्रतिष्ठित अवॉर्ड्स दिए गए।

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Bhimsen Joshi Birth Anniversary: Know About Mile Sur Mera Tumhara fame vocalists classical singing and Life
भीमसेन जोशी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारतीय संगीत पर जब भी बात होती है तो तमाम बड़े नाम याद हो आते हैं। इनमें से एक हैं पंडित भीमसेन जोशी। पंडित भीमसेन जोशी किसी परिचय के मोहताज नहीं है। इन्होंने संगीत के क्षेत्र में दुनियाभर में भारत का कद बढ़ाने में अहम योगदान दिया। भीमसेन जोशी किराना घराने के शास्त्रीय गायक थे। 'पिया मिलन की आस', 'जो भजे हरि को सदा' और 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' जैसे गानों के लिए उन्हें विशेषरूप से याद किया जाता है। आज दिवंगत भीमसेन जोशी की बर्थ एनिवर्सरी है। आइए जानते हैं उनके बारे में...

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19 वर्ष की आयु में मंच पर पहली प्रस्तुति
भीमसेन जोशी का जन्म कर्नाटक के गडग में 4 फरवरी 1922 को हुआ था। उनके पिता गुरुराज जोशी स्थानीय हाई स्कूल हेडमास्टर और कन्नड़, अंग्रेजी और संस्कृत के विद्वान थे। भीमसेन 16 भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। बचपन में ही उनके सिर से मां का साया उठ गया था और सौतेली मां ने भीमसेन का पालन-पोषण किया। बचपन से ही भीमसेन जोशी को संगीत का बहुत शौक था। वर्ष 1941 में भीमसेन जोशी ने 19 वर्ष की उम्र में मंच पर अपनी पहली प्रस्तुति दी थी। वहीं, उनका पहला एल्बम 20 वर्ष की आयु में निकला, जिसमें कन्नड़ और हिन्दी में कुछ धार्मिक गीत थे। 
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11 वर्ष की उम्र में छोड़ दिया था घर
भीमसेन जोशी बचपन से ही किराना घराने के संस्थापक अब्दुल करीम खान से बेहद प्रभावित थे। भीमसेन जोशी के स्कूल जाने के रास्ते पर ही एक ग्रामोफोन शॉप थी। ग्राहकों को सुनाए जा रहे गानों को सुनने के लिए भीमसेन वहीं खड़े हो जाते थे। एक दिन उन्होंने अब्दुल करीम खान का गाया 'राग वसंत' में 'फगवा' 'बृज देखन को' और 'पिया बिना नहि आवत चैन' ठुमरी सुनी। यहीं से उनके मन में संगीत के प्रति रुचि बढ़ गई। एक दिन गुरु की तलाश में भीमसेन अपने घर से निकल गए थे, जिसके बाद अगले दो वर्षों तक वो बीजापुर, पुणे और ग्वालियर में रहे। तब उनकी उम्र महज 11 वर्ष थी। ग्वालियर में उन्होंने उस्ताद हाफिज अली खान से भी संगीत की शिक्षा ली। और अब्दुल करीम खान के शिष्य पंडित रामभाऊ कुंडालकर से उन्होंने शास्त्रीय संगीत की शुरुआती शिक्षा ली। साल 1936 में पंडित भीमसेन जोशी एक जाने-माने खयाल गायक थे। उन्हें खयाल के साथ-साथ ठुमरी और भजन में भी महारत हासिल था। 
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भारत रत्न से किए गए सम्मानित
भीमसेन जोशी जब घर छोड़कर गए तो उनके पास किराए तक के पैसे नहीं थे। उन्होंने अपनी गायिकी के दम पर फ्री में यात्रा की। इसका भी बेहद दिलचस्प किस्सा है। भीमसेन गुरु की तलाश में घर से तो निकल गए, लेकिन उन्हें मंजिल का पता नहीं था। बिना टिकट लिए वह ट्रेन में बैठ गए और बीजापुर तक का सफर किया। टी.टी. को राग भैरव में 'जागो मोहन प्यारे' और 'कौन-कौन गुन गावे' सुनाकर मुग्ध कर दिया। साथ के यात्रियों पर भी उनके गायन का जादू चल गया और उन्होंने भीमसेन के लिए सफर के दौरान खाने-पीने का प्रबंध किया। पंडित भीमसेन जोशी को संगीत में उनके योगदान के लिए भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा उन्हें पद्म विभूषण, पद्म भूषण समेत कई अन्य प्रतिष्ठित अवॉर्ड्स दिए गए। लंबी बीमारी के बाद 24 जनवरी 2011 को भीमसेन जोशी का निधन हो गया।

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