‘सेंसर बोर्ड की अब जरूरत नहीं’, ‘जन नायकन’ की कंट्रोवर्सी के बीच रामगोपाल वर्मा ने सीबीएफसी पर साधा निशाना
Ram Gopal Varma On Censor Board: खुदरंग फिल्ममेकर रामगोपाल वर्मा ने ‘जन नायकन’ की कंट्रोवर्सी के बीच अब सेंसर बोर्ड पर निशाना साधा है। उन्होंने सेंसर के रिलेवेंसी पर सवाल उठाया है।
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थलापति विजय की ‘जन नायकन’ सेंसर सर्टिफिकेट न मिलने के कारण तय तिथि 9 जनवरी को रिलीज नहीं हो पाई। हालांकि, शुक्रवार को मद्रास हाईकोर्ट ने ‘जन नायकन’ को सेंसर सर्टिफिकेट जारी करने का आदेश दे दिया था। लेकिन बाद में इस पर चीफ जस्टिस की बेंच ने अस्थायी रोक लगा दी। जिसके बाद फिलहाल ‘जन नायकन’ एक बार फिर अटक गई। इस बीच एक बार फिर सेंसर बोर्ड और सेंसर सर्टिफिकेट को लेकर बहस तेज हो गई है। अब इस बहस पर दिग्गज फिल्ममेकर और हर मुद्दे पर अपनी खुलकर राय रखने वाले रामगोपाल वर्मा ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सेंसर बोर्ड को ही आउट डेटेड बता दिया है।
सेंसर बोर्ड आज प्रासंगिक नहीं
रामगोपाल वर्मा ने अपने एक्स पर एक लंबा-चौड़ा पोस्ट साझा किया। इसकी शुरुआत में उन्होंने लिखा, सेंसर बोर्ड अब पुराना हो चुका है। इसके बाद अपनी पोस्ट में रामू ने लिखा, ‘सिर्फ अभिनेता विजय की फिल्म ‘जन नायकन’ के सेंसरशिप संबंधी मुद्दों के संदर्भ में ही नहीं, बल्कि समग्र रूप से भी यह सोचना सचमुच मूर्खतापूर्ण है कि सेंसर बोर्ड आज भी प्रासंगिक है। इसका उद्देश्य तो कब का बीत चुका है, लेकिन इसकी प्रासंगिकता पर बहस करने की सुस्ती के चलते इसे जिंदा रखा जा रहा है। इसके लिए मुख्य रूप से फिल्म इंडस्ट्री ही जिम्मेदार है।’
सोशल मीडिया और इंटरनेट की ओर खींचा लोगों का ध्यान
निर्देशक ने अपनी पोस्ट में आगे लिखा, ‘हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां एक 12 साल का बच्चा अपने फोन से GoPro पर फिल्माए गए आतंकवादी हमले का वीडियो देख सकता है। एक 9 साल का बच्चा अश्लील सामग्री देख सकता है और एक ऊबा हुआ रिटायर व्यक्ति दुनिया में कहीं से भी, बिना किसी काट-छांट, बिना सेंसरशिप और एल्गोरिदम के जरिए, चरमपंथी प्रचार देख सकता है। यह सब तुरंत, गुमनाम रूप से और बिना किसी रोक-टोक के उपलब्ध है। दूसरी ओर समाज के हर वर्ग के लोग नए चैनलों से लेकर यूट्यूबर्स और अन्य ऐप्स तक अपशब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। यदि आप इस पुरानी मान्यता का हवाला देते हैं कि सिनेमा एक शक्तिशाली माध्यम है, तो इस तथ्य को नजरअंदाज न करें कि सोशल मीडिया की पहुंच सिनेमा से कहीं अधिक है। यह राजनीतिक जहर, सांप्रदायिक जहर, चरित्र हनन और बहस के नाम पर होने वाली लाइव, अनियंत्रित चीख-पुकार से भरा पड़ा है।’
सेंसरशिप दर्शकों का अपमान करती है
रामू ने आगे कहा, ‘इस वास्तविकता में माननीय सेंसर बोर्ड का यह मानना कि किसी फिल्म से एक शब्द काटना, एक शॉट छोटा करना या सिगरेट को धुंधला करना समाज की रक्षा करेगा, एक मजाक है। सेंसर बोर्ड का जन्म एक ऐसे युग में हुआ था जब तस्वीरें दुर्लभ थीं, पहुंच सीमित थी और राज्य मीडिया को कंट्रोल करता था। सिनेमाघर भीड़ के केंद्र थे। अखबारों के संपादक होते थे। टेलीविजन के अपने कार्यक्रम होते थे। तब नियंत्रण का मतलब बनता था। लेकिन आज किसी भी प्रकार का नियंत्रण असंभव है क्योंकि अब कोई भी यह तय नहीं कर सकता कि लोगों को क्या देखना चाहिए और क्या नहीं। आज के समय में, सेंसरशिप दर्शकों को देखने से नहीं रोकती, यह केवल उनका अपमान करती है। हमसे यह अपेक्षा की जाती है कि हम यह तय करने में सक्षम हों कि हम पर कौन शासन करेगा, लेकिन यह तय करने में नहीं कि हम क्या देखना या सुनना चाहते हैं?’
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सिनेमा का काम मनोरंजन करना है
आगे उन्होंने कहा, ‘सेंसर बोर्ड वास्तव में अब जो करता है वह सुरक्षा नहीं, बल्कि केवल दिखावा है। सिनेमा का उद्देश्य जनता को शिक्षित करना नहीं बल्कि एक आईने के रूप में काम करना और मनोरंजन करना है। अधिकारियों का काम उन्हें एडिट करना या काटना नहीं है, बल्कि नागरिकों पर इतना भरोसा करना है कि वे खुद फैसला कर सकें। सेंसरशिप के दौरान फिल्म उन लोगों के व्यक्तिगत विचारों, पूर्वाग्रहों और उद्देश्यों से प्रभावित होती है, जो इस प्रक्रिया में शामिल होते हैं। अलग-अलग उम्रों का वर्गीकरण समझ में आता है। कंटेंट से जुड़ी चेतावनी देना समझ में आता है। लेकिन सेंसरशिप समझ में नहीं आती।’
सेंसर बोर्ड की मानसिकता पर उठाया सवाल
राम गोपाल वर्मा ने अपने निष्कर्ष में कहा, ‘दुनिया पहले ही कई ऐसे प्लेटफार्मों की ओर बढ़ चुकी है जो अनियंत्रित और बिना निगरानी वाले हैं। इसलिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अधिकारियों में यह स्वीकार करने का साहस है कि वे अब आउटडेटेड हो चुके हैं। उससे भी बढ़कर ये कि क्या हम फिल्म इंडस्ट्री के रूप में सामूहिक रूप से इस पर सवाल उठाने की इच्छाशक्ति रखते हैं। इसलिए किसी विशेष फिल्म को लेकर कभी-कभार इस मुद्दे को उठाने के बजाय, लड़ाई उस विशेष मानसिकता के खिलाफ होनी चाहिए जिसने सेंसर बोर्ड को जन्म दिया।’
अब 21 जनवरी को होगी 'जन नायकन' पर सुनवाई
हालांकि, एच. विनोद द्वारा निर्देशित थलपति विजय की ‘जन नायकन’ को शुक्रवार 9 जनवरी को मद्रास उच्च न्यायालय की एकल-न्यायाधीश पीठ ने हरी झंडी दे दी। साथ ही सीबीएफसी को फिल्म को तुरंत यूए सर्टिफिकेट देने का निर्देश दे दिया था। लेकिन मुख्य न्यायाधीश मनिंद्र मोहन श्रीवास्तव की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने बाद में इस पर अस्थायी रोक लगा दी। अदालत ने अब मामले की अगली सुनवाई 21 जनवरी को तय की है।