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Hindi News ›   Entertainment ›   Amar Ujala Samvad: Smriti Zubin Irani talks about her career struggle and Political Journey From Amethi

Samvad: 200 रुपये की नौकरी से लेकर बर्तन घिसने तक, स्मृति ईरानी के संघर्ष की पूरी कहानी उन्हीं के शब्दों में

Tue, 27 Feb 2024 01:59 PM IST
ज्योति राघव एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: ज्योति राघव Updated Tue, 27 Feb 2024 01:59 PM IST
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Amar Ujala Samvad: Smriti Zubin Irani talks about her career struggle and Political Journey From Amethi
स्मृति जुबिन ईरानी - फोटो : अमर उजाला

लखनऊ में आयोजित अमर उजाला संवाद का आज दूसरा दिन महिलाओं के उत्थान, स्वास्थ्य और उनके संघर्ष पर केंद्रित रहा। इसमें केंद्रीय मंत्री स्मृति जुबिन ईरानी ने हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने देश के विकास, महिलाओं की स्थिति पर बात की। इसके साथ-साथ उन्होंने अपनी निजी जिंदगी पर भी खुलकर चर्चा की। स्मृति जुबिन ईरानी ने बताया कि वह बहुत संघर्ष और मेहनत के बाद यहां तक पहुंची हैं। आइए जानते हैं स्मृति के संघर्ष की कहानी उन्हीं की जुबानी...

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मां ने जड़ा था चांटा
केंद्रीय मंत्री स्मृति जुबिन ईरानी ने कहा, 'मैं सात साल की थी, तब घर छोड़ना पड़ा था। मां के साथ हम तीन बहनें थीं। जब हमें वहां से निकाला जा रहा था, तब मैं उस घर के सामने खड़ी रही। मां ने कहा कि क्या ताक रही हो घर को? मैंने मां से कहा कि एक दिन आएगा, जब मेरी इतनी औकात होगी कि जिस घर से तुम्हें निकाला है, वो घर मैं खरीद सकूं। मुझे याद है कि तब मुझे कसकर चांटा पड़ा था, क्योंकि मेरी मां ने मुझसे कहा था कि हम एक ऐसी आर्थिक पृष्ठभूमि से हैं, जहां न कोई ऐसे सपने देखता है, न बयां करता है। शायद उन्हें इस बात की तकलीफ थी कि मैं ऐसा सपना न देखूं, जिससे दिल टूटे। आज मेरे अपने बच्चे हैं तो मुझे यह समझ आता है कि माता-पिता क्यों बच्चों को उनकी महत्वाकांक्षाओं से ही बचाए रखना चाहते हैं'।

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परिवार के साथ पहुंचीं उसी घर के सामने
केंद्रीय मंत्री ने आगे कहा, 'जिंदगी में दूसरा मौका तब आया, जब मैं परिवार के साथ उसी घर के सामने पहुंची। यह 15 साल पहले की बात है। तब मुझे एहसास हुआ कि जो घर मुझे महल-सा लगता था, वह असल में ड्राईक्लीनर का लॉन्ड्री वॉशरूम था। गुड़गांव में न्यू कॉलोनी में आर्य समाज मंदिर के पास यह घर था। ड्राईक्लीनर भागा-भागा आया और उसने कहा कि आप यहां रहती थीं। मुझसे मेरे परिवार ने कहा कि खरीदना है घर? मैंने कहा कि नहीं... कोई अपनी बदकिस्मती को नहीं खरीदता। सात साल की उम्र में आपको जहां से निकाला गया, आप वहां क्षमतावान बनकर लौट पाओ, यही आपका सौभाग्य है। जब पीएम मोदी यह कहते हैं कि हमने 25 करोड़ लोगों को गरीबी से उबारा तो यह आंकड़ा नहीं हकीकत है। मैं खुद को इससे जोड़ना चाहती हूं, क्योंकि मैं भी एक वक्त गरीबी का वह आंकड़ा थी'। 

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Amar Ujala Samvad: Smriti Zubin Irani talks about her career struggle and Political Journey From Amethi
स्मृति जुबिन ईरानी - फोटो : अमर उजाला

बोलीं- 'सड़क से उठकर यहां तक आई हूं'
'सबसे सफल वह व्यक्ति है, जिसकी कोई अभिलाषा नहीं है। जनपथ में पूर्व क्रिकेटर मनोज प्रभाकर की एक कंपनी थी, वहां काम करते हुए 200 रुपये की दिहाड़ी पर सड़क पर मैंने क्रीम बेची। इसके बाद मुंबई में 1800 रुपये महीने की बर्तन घिसने की नौकरी करती थी, वहां बांद्रा में जाकर आप पीएफ की पर्ची देखकर यह पता लगा सकते हैं, जिसने यह सब देखा हो, उसके लिए आज यहां होना ही बड़ी सफलता है। मुझे अमेठी में कहा गया कि आप तो 'तुलसी' हैं और पहले भी यहां उम्मीदवार पर गोली चल चुकी है। मेरे लिए संघर्ष आसान था, क्योंकि मैं सड़क से उठी हूं। गांधी परिवार के यह लिए मुश्किल है, क्योंकि उन्होंने सड़क कभी देखी नहीं थी। मुझे कोई आपत्ति नहीं है कि सब कुछ चला जाए और दोबारा बर्तन मांजने पड़े, तब भी दो वक्त की रोटी तो कमा ही लूंगी'। 

'मीडिया में किया काम'
स्मृति ईरानी ने कहा, 'मैं एक चैनल में राजनीतिक शो का हिस्सा रही हूं। मैं मीडिया में स्ट्रिंगर हुआ करती थी। एडिटर भगा दिया करते थे। वे कहते थे कि किसी लायक नहीं हो। कुछ साल पहले उन्हीं एडिटर ने मुझे बुलाया और पुरस्कृत किया। मेरा यह सौभाग्य रहा कि मैं WHO की USAID की राजदूत रही। तब मेरी उम्र 23 साल थी। तब मैं विश्व स्वास्थ्य संगठन में महिला और स्वास्थ्य से जुड़े विषय पर काम कर रही थी। 25 साल की उम्र में कार्यकाल खत्म कर राजनीति में आई। मैंने 27 वर्ष की उम्र में पहला चुनाव लड़ा'।

ऐसे हुई अमेठी जाने की तैयारी
स्मृति ने अपनी अमेठी जाने की यात्रा के बारे में बताते हुए कहा, '2014 में पार्टी नेतृत्व ने मुझे बताया कि अमेठी से प्रत्याशी बनना है। 22 मार्च 2014 की शाम थी। बात सुनने में अटपटी लग सकती है, लेकिन मैंने कहा कि मुझे घर पर एक बार पूछना है। मुझे इस बात का अहसास था कि अमेठी की लड़ाई साधारण राजनीतिक लड़ाई नहीं होगी। उसका खामियाजा मुझे नहीं, बल्कि पूरे परिवार को भुगतना पड़ेगा। 2014 में तब केंद्र में सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली सरकार थी। प्रदेश में सपा की सरकार थी। दोनों तरफ दो खींची हुई तलवारों के बीच मुझे अमेठी में प्रवेश करना था। अमेठी वह क्षेत्र है, जहां चुनावों में उम्मीदवार की हत्या हो जाती है या गोलियां चल जाती हैं। परिवार को जब मैंने फोन पर यह बताया तो मुझसे पूछा गया कि अनहोनी हो जाए, तो क्या करोगी? 10 साल पहले एक बच्चा नौ साल और एक 11 साल का था। तब पति-पत्नी ने बैठकर निर्णय किया कि आप कभी अमेठी मत आइएगा, क्योंकि दोनों में से एक को बच्चों के लिए जीवित बचना चाहिए'।

संघ पृष्ठभूमि से है परिवार
केंद्रीय मेंत्री ने आगे कहा, 'जब आज हम कहते हैं कि हम 400 सीटों के पार जाने वाले हैं, तब यह समझना मुश्किल हो जाता है कि 2014 में क्या मंजर रहा होगा। नौ साल, 11 साल के बच्चों को देखकर यह निर्णय लेना पड़ा था कि परिवार सुरक्षित रहे, इसलिए वह अमेठी न आए। भद्दी बातें कही जाएंगी, सब चुपचाप सहना है। बड़ों-बच्चों को साथ बैठाना और उन्हें समझाना अपने आप में जीवन की अलग किताब है। वहीं से अमेठी का सफर शुरू हुआ। यह चर्चा हमारे घर में मात्र एक घंटे की रही। मां और पूरा मायका संघ की पृष्ठभूमि से है। निर्णय लेने में वैचारिक कठिनाई नहीं थी। बस परिवार की दृष्टि से भावनात्मक चुनौती थी। एक घंटे में पारिवारिक निर्णय हुआ और बाकी सब इतिहास है। रात 11:40 बजे मैंने पार्टी नेतृत्व को बताया कि हां मैं अमेठी से चुनाव लड़ूंगी'। 

अमेठी में किराए के कमरे में रहीं
'अमेठी तो 2014 में ही मेरा घर बन चुका था। फर्क यह था कि कमरा किराए पर था। कुछ लोग कहते थे कि मैं अस्थाई हूं। कुछ लोगों को कमरे का किराया देने में झिझक होती थी कि मैं रहूंगी तो कांग्रेस के किसी कार्यकर्ता के गुस्से की आग में वह झुलस न जाए। तब पूरी जनपद में रहने को जगह नहीं मिली तो गौरीगंज के मध्य में खेत में सीमेंट का गोदाम था। कार्यकर्ता वहां ले गए और कहा कि यहां कमरा मिल सकता है। सीमेंट की बोरियों के बीच से राजनीतिक सफर की शुरुआत हुई। हम चार-पांच महिला कार्यकर्ता थीं। उनमें से कई ऐसे परिवारों से थीं, जिन्होंने फर्श पर सोने की कल्पना नहीं की थी। उन्हें पता था कि सफर कठिन है। क्षमताओं के आधार पर इतिहास लिखा जाना था। उन्हें फर्श और टपकती छत मंजूर थी। कीड़े-मकोड़े भी टपकती छत के साथ मौजूद रहते थे'।

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