75 years of Navketan: हिंदी सिनेमा को अलग मुकाम पर ले जाने वाले देव आनंद और उनके भाइयों की कहानी
चेतन और देव आनंद ने 1949 में नवकेतन फिल्म्स का निर्माण कर ‘बाजी’, ‘गाइड’ और ‘ज्वेल थीफ’ जैसी फिल्मों के साथ भारतीय सिनेमा में क्रांति ला दी थी। स्टूडियो के 75 साल पूरे होने पर आनंद भाइयों- चेतन, देव और विजय आनंद की रचनात्मक यात्रा पर नजर डालते हैं।
विस्तार
नवकेतन फिल्म्स के 75 साल पूरे होने का जश्न: सिनेमाई प्रतिभा, भाइयों के बीच का बंधन और रचनात्मक प्रतिद्वंद्विता की विरासत जिसने 1950 से 1970 के दशक तक भारतीय सिनेमा के स्वर्ण युग को आकार दिया। पढ़िए देव आनंद साहब की भांजी और फिल्ममेकर शेखर कपूर की बहन सोहैला कपूर का यह आलेख…
'अफसर' और 'आंधियां' नवकेतन की शुरुआती फिल्मों में से एक थीं। क्रेडिट: Instagram @diaries.of.navketan
चेतन और देव आनंद ने 1949 में नवकेतन फिल्म्स का निर्माण कर ‘बाजी’, ‘गाइड’ और ‘ज्वेल थीफ’ जैसी फिल्मों के साथ भारतीय सिनेमा में क्रांति ला दी थी। अब जब इस स्टूडियो के 75 साल पूरे हो गए हैं तो हमने आनंद भाइयों- चेतन, देव और विजय (गोल्डी) आनंद की रचनात्मक यात्रा पर फिर से नजर डालते हैं।
इन भाइयों की अनूठी कहानियों, शानदार अभिनय और अभिनव फिल्म निर्माण शैली ने बॉलीवुड के स्वर्णिम युग पर एक अमिट छाप छोड़ी। जानें कैसे पारिवारिक बंधन, रचनात्मक प्रतिद्वंद्विता और साझा जुनून ने इनकी सिनेमाई प्रतिभा को बढ़ावा दिया, जिससे नवकेतन टाइमलेस क्लासिक्स और कलात्मक उत्कृष्टता का पर्याय बन गया।
मैं एक ऐसे परिवार में पैदा हुई जो रचनात्मक लोगों से भरी हुई थी पर साल 1950 और 1970 के दशक के बीच (जिसे बॉलीवुड का स्वर्णिम युग कहा गया) जिन लोगों ने सचमुच देश की कल्पना को परदे पर पेश किया वो मेरे मामा चेतन, देव और विजय आनंद थे।
अपने दोनों भाइयों चेतन और विजय आनंद के साथ देव आनंद। क्रेडिट: Facebook @AKMalhotra
चेतन के बारे में उल्लेख कम है
देव और गोल्डी की रचनात्मक जोड़ी पर कई किताबें और आलेख छपे हैं। हालांकि, इनमें से सबसे बड़े भाई चेतन के बारे में केवल कुछ बिखरे हुए उल्लेख ही मौजूद हैं, जो यकीनन तीनों में सबसे मौलिक और दोनें छोटे भाइयों के गुरु भी हैं।
भाइयों के तौर पर उनका रिश्ता कैसा था? क्या पेशेवर प्रतिद्वंद्विता कभी व्यक्तिगत हो गई? मुझे लगता है कि इस साल मनाई गई उनकी कंपनी नवकेतन की 75वीं वर्षगांठ पर उनकी कहानी को याद करना उचित है।
उनकी पंजाबियत और भाईचारा याद है
मेरे मामा संकोची, आत्मनिरीक्षण करने वाले और कभी-कभी बहस करने वाले इंसानों में से एक थे। तीनों हमेशा किसी भी तरह का तनाव दूर करने के लिए एक खास मुस्कान के साथ तैयार रहते थे। एक भतीजी के तौर पर मुझे जो याद है, वह एक-दूसरे के प्रति उनका चुपचाप समर्थन और भाइयों के रूप में उनकी पंजाबियत है।
वो जब भी मिलते थे तो ऐसा लगता था कि पंजाब के गुरदासपुर में बिताए अपने दिनों को फिर से जी रहे हैं, सरसों का साग और मक्की की रोटी खा रहे हैं, पंजाबी में मजाक कर रहे हैं और पारिवारिक जानकारी बांट रहे हैं। आम पंजाबी या फिल्मी व्यक्तित्वों के विपरीत, वे न तो धूम्रपान करते थे और न ही शराब पीते थे।
कामिनी कौशल, उमा आनंद, जोहरा सहगल और रफीक अनवर स्टारर फिल्म 'नीचा नगर' का पोस्टर।
1946 में कान फिल्म महोत्सव के लिए चुनी गई ‘नीचा नगर’
बहरहाल, यह सब चेतन से शुरू हुआ, जिन्होंने फिल्म निर्माण के अपने जुनून को आगे बढ़ाने के लिए अपने पिता के सिविल सेवक बनने के सपने को त्याग दिया। मैक्सिम गोर्की के नाटक लोअर डेप्थ्स पर आधारित उनकी पहली फिल्म ‘नीचा नगर’, शायद भारत की पहली आर्ट-हाउस फिल्म थी। इसे 1946 में शुरू हुए कान फिल्म महोत्सव के लिए भारत की आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में चुना गया था। वहां इस फिल्म ने डेविड लीन, रॉबर्टो रोसेलिनी और बिली वाइल्डर की कृतियों के साथ शीर्ष सम्मान साझा किया था।
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सार्थक सिनेमा बनाने के लिए नवकेतन का जन्म हुआ
कामिनी कौशल के साथ फिल्म ‘जिद्दी’ (1948) से स्टार बनने के बाद देव ने सार्थक सिनेमा बनाने के लिए एक फिल्म कंपनी शुरू करने का सुझाव दिया। चेतन सहमत हो गए और 1949 में नवकेतन का जन्म हुआ।
देव अपने बड़े भाई को आदर्श मानते थे, लेकिन रचनात्मक मतभेद उभर कर सामने आए। चेतन के लिए हमेशा कहानी ही राजा हाेती थी, जबकि देव चाहते थे कि नायक वो केंद्रीय पात्र हो जिसके इर्द-गिर्द कहानी घूमती रहे। आखिरकार, दोनों ने यह मान लिया कि वो एक-दूसरे से असहमत रहते हैं।
इसके बाद देव ने गुरु दत्त, विजय (गोल्डी) आनंद और राज खोसला जैसे युवा निर्देशकों के साथ काम किया और बाजी (1951), नौ दो ग्यारह (1957) और काला पानी (1960) जैसी प्रतिष्ठित फिल्में बनाईं।
और फिर अलग हो गए चेतन और देव आनंद
1957 में चेतन और देव ने सौहार्दपूर्ण तरीके से अपने रास्ते अलग कर लिए। 1962 में ‘हकीकत’ के निर्माण के दौरान चेतन ने महाशक्ति फिल्म्स की स्थापना की, जिसका बाद में नाम बदलकर हिमालय फिल्म्स कर दिया गया। इस बीच, कॉलेज से निकले गोल्डी ने देव की युवावस्था और अनुभवहीनता के बारे में शुरुआती संदेह के बावजूद नवकेतन में प्रवेश लिया। गोल्डी की कहानी कहने की कला, एडिटिंग के तरीके और सॉन्ग विज़ुअलाइजेशन टेलेंट ने जल्द ही उन्हें व्यावसायिक सिनेमा में एक ताकत बना दिया।
देव-गोल्डी ने एक दूसरे के साथ 1960 के दशक को काला बाजार (1960), हम दोनों (1961), तेरे घर के सामने (1963), गाइड (1965) और ज्वेल थीफ (1967) जैसी हिट फिल्मों के साथ परिभाषित किया। उनकी फिल्माें के चार्ट-टॉपिंग गाने, शैली-विरोधी कहानियां, क्राइम कैपर्स, कॉमेडी और यहां तक कि ‘द गाइड’ का एक साहसिक रूपांतरण…इन सभी चीजों ने सिनेमाई इतिहास बनाया।
1965 में रिलीज हुई फिल्म 'गाइड' के एक सीन में वहीदा रहमान के साथ देव आनंद। क्रेडिट: Instagram @romancingdev
‘गाइड’ ने अर्जित किया कल्ट का दर्जा
गाइड, एक साहसी परियोजना थी, जिसे अंग्रेजी और हिंदी दोनों में रिलीज किया गया था। शुरुआत में इसे प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन अंततः इसने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रशंसा अर्जित करते हुए कल्ट का दर्जा हासिल किया।
हालांकि, सामाजिक रूप से पहली जागरूक फिल्म ‘तेरे मेरे सपने’ (1971) के बाद गोल्डी का जादू फीका पड़ गया। फिल्म फ्लॉप हो गई, जिससे उनकी रचनात्मक और वित्तीय भावनाएं टूट गईं। वे पेशेवर रूप से अलग हो गए। नवकेतन देव के साथ जुड़ा रहा जबकि गोल्डी ने नवकेतन एंटरप्राइजेज लॉन्च कर लिया।
क्या वहां प्रतिद्वंद्विताएं थीं? हां, लेकिन वे स्वस्थ थीं। शायद चेतन और गोल्डी, देव की स्टार पावर से ईर्ष्या करते थे, जबकि देव उनकी फिल्म निर्माण प्रतिभा की प्रशंसा करते थे। कोई भी तनाव अल्पकालिक था, जो उनके गहरे पारिवारिक रिश्तों से ढका हुआ था।
फिर साथ आए तीनों भाई पर वो बात नहीं रही
1976 में नवकेतन की सिल्वर जुबली मनाने के लिए तीनों भाई फिर से साथ आए। चेतन ने देव और हेमा मालिनी अभिनीत ‘जानेमन’ का निर्देशन किया, जो टैक्सी ड्राइवर (1954) की रीमेक थी। उन्होंने नवकेतन की पहली फिल्म अफसर (1950) की रीमेक ‘साहेब बहादुर’ का भी निर्देशन किया। उसी साल, गोल्डी ने नवकेतन एंटरप्राइजेज के तहत देव के साथ ‘बुलेट’ बनाई। हालांकि, समय बदल गया था और पहले वाली फिल्मों का जादू फिर से हासिल नहीं किया जा सका।
1988 में फिल्म 'मैंने तेरे लिए' के दौरान मीनाक्षी शेषाद्री के साथ देव आनंद, विजय आनंद और चेतन आनंद व सुनील आनंद। क्रेडिट: Twitter @BombayBasanti
भाइयों के निधन से देव को लगा सदमा
जब चेतन और गोल्डी का निधन हुआ तो देव को बहुत गहरा सदमा लगा, क्योंकि उन्होंने अपने भाइयों और रचनात्मक साझेदारों को खो दिया था - अपने गुरु चेतन और अपने प्यारे छोटे भाई गोल्डी को, जिन्हें उन्होंने अपने कंधों पर उठाया था।
हमेशा दृढ़ निश्चयी रहे देव ने फिल्में बनाना जारी रखा, लेकिन एक आहत भावना के साथ। उनका निधन उनकी इच्छा के अनुसार हुआ- अपनी अगली फिल्म के बारे में सोचते हुए, कुर्सी पर बैठे हुए, अपने बेटे के लंच से लौटने का इंतजार करते हुए। लंदन में उनकी मृत्यु और वहीं शांति से हुए उनके अंतिम संस्कार ने सुनिश्चित किया कि प्रशंसक उन्हें अपने जीवित आदर्श के रूप में याद रखें।
आनंद बंधुओं की विरासत का जश्न मेरे द्वारा एक नाट्य वर्णन के माध्यम से मनाया गया, ‘आनंद ही आनंद’, जिसे 12 दिसंबर को त्रिवेणी थिएटर और 13 दिसंबर को द थिएटर, इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली में प्रदर्शित किया गया।
(लेख साभार: डेली आई)