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विश्व डाक दिवस: कभी डाकिए का इंतजार, अब सेकंडों में संदेश… चिट्ठी से ईमेल तक कैसे बदली दुनिया?
Fri, 09 Oct 2026 07:40 AM IST
शिवम तिवारी
जॉब्स डेस्क अमर उजाला
जॉब्स डेस्क अमर उजाला
Published by: शिवम तिवारी
Updated Fri, 09 Oct 2026 07:40 AM IST
सार
विश्व डाक दिवस पर जानिए दूतों और घोड़ा डाक से शुरू हुई संदेश पहुंचाने की कहानी कैसे डाकिया, डाक टिकट, पोस्टकार्ड, हवाई डाक और स्पीड पोस्ट से होते हुए ईमेल, मोबाइल और इंस्टेंट मैसेजिंग तक पहुंची। डिजिटल दौर में भी भारतीय डाक की भूमिका बनी हुई है। जानें चिट्ठियों का इतिहास और बदलते संचार की पूरी कहानी।
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World Post Day
- फोटो : AI Generated
विस्तार
एक समय था जब किसी दूर बैठे अपने का हाल जानने के लिए चिट्ठी का इंतजार करना पड़ता था। डाकिया गांव की गली में दिखाई देता तो लोगों की नजरें उसके हाथ में मौजूद थैले पर टिक जाती थीं। किसी के लिए वह नौकरी का पत्र लाता था तो किसी के लिए परीक्षा का नतीजा, मनी ऑर्डर या घर से आई चिट्ठी। फिर टेलीफोन आया, फैक्स आया, ईमेल ने दस्तक दी और देखते ही देखते मोबाइल व इंटरनेट ने संदेश भेजने का पूरा तरीका बदल दिया। आज फोटो, वीडियो और दस्तावेज कुछ सेकंड में दुनिया के दूसरे कोने तक पहुंच जाते हैं। लेकिन इस तेज रफ्तार दुनिया तक पहुंचने की कहानी हजारों साल पुरानी है। आइए जानते हैं दूतों से शुरू हुआ यह सफर ईमेल और डिजिटल मैसेजिंग तक कैसे पहुंचा?
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दूतों से शुरू हुई कहानी, कैसे बनी डाक व्यवस्था?
प्राचीन समय में आज की तरह पोस्ट ऑफिस, डाक टिकट या डाकिया नहीं हुआ करते थे। राजा-महाराजा और शासक अपने संदेश एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने के लिए दूतों का इस्तेमाल करते थे। संदेश की अहमियत के हिसाब से पैदल संदेशवाहक, घुड़सवार या दूसरे साधनों का सहारा लिया जाता था। भारत में भी अलग-अलग दौर में संदेश पहुंचाने की व्यवस्थाएं विकसित हुईं। शासन व्यवस्था के विस्तार के साथ यह जरूरत बढ़ती गई कि राजधानी, प्रशासनिक केंद्रों और दूरदराज के इलाकों के बीच सूचनाएं तेजी से पहुंचाई जाएं। इस तरह संदेश पहुंचाने की व्यवस्था धीरे-धीरे संगठित रूप लेने लगी। दिल्ली सल्तनत के दौर में भी डाक व्यवस्था का इस्तेमाल प्रशासनिक सूचनाएं पहुंचाने के लिए किया जाता था। अलाउद्दीन खिलजी के समय घोड़े और पैदल संदेशवाहकों के जरिए डाक पहुंचाने का उल्लेख मिलता है। बाद में शेरशाह सूरी ने सड़कों और सरायों के नेटवर्क के साथ घोड़ा डाक व्यवस्था को मजबूत किया। यह व्यवस्था आगे चलकर भारत की संगठित डाक सेवा के विकास की नींव बनी।
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आधुनिक डाक की नींव कैसे पड़ी?
18वीं सदी में भारत में संगठित डाक व्यवस्था का स्वरूप और मजबूत हुआ। ब्रिटिश शासन के दौरान प्रशासनिक जरूरतों के लिए डाक व्यवस्था को व्यवस्थित किया गया। 1774 में कलकत्ता जीपीओ की स्थापना को इस विकास का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। इसके बाद मद्रास और बॉम्बे में भी जीपीओ स्थापित किए गए। धीरे-धीरे डाक सेवाओं का नेटवर्क बढ़ने लगा और आम लोगों के लिए भी डाक भेजने की व्यवस्था अधिक व्यवस्थित होती गई। वर्ष 1854 भारतीय डाक इतिहास में बेहद महत्वपूर्ण है। इसी साल डाक व्यवस्था में बड़ा बदलाव आया और 1 अक्टूबर 1854 से भारत में आधुनिक डाक व्यवस्था के विकास का नया दौर शुरू हुआ। इसी समय डाक शुल्क, डाक टिकट और डाक वितरण को अधिक व्यवस्थित रूप दिया गया। इससे अलग-अलग इलाकों के बीच पत्र भेजने की प्रक्रिया पहले के मुकाबले आसान और नियमित हुई।
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