किस्सा अफगानिस्तान में अमेरिका का: तालिबान से 20 साल लंबी जंग, जहां शुरू हुई थी, वहीं आकर खत्म हुई
The story of America in Afghanistan : अमेरिका की तालिबान के खिलाफ अफगानिस्तान नीति पूरी तरह सत्ता के इर्द-गिर्द केंद्रित रही है। जब-जब अमेरिका में सत्ता बदली है, तब-तब उसका असर अफगानिस्तान पर पड़ा है। धीरे-धीरे तालिबान अफगानिस्तान में वापस पैर पसारने लगा है।
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विस्तार
अमेरिका में 2020 के चुनाव के बाद भले ही राष्ट्रपति और सत्ता बदल गई, मगर कुछ नहीं बदला तो वह है अफगानिस्तान से तालिबान के खिलाफ संघर्ष खत्म करने और अमेरिका समेत नाटो देशों की सेनाओं की वापसी का निर्णय। 2001 से जारी तालिबान विरोधी जंग को खत्म करने और सेनाओं की वापसी का फैसला पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन का था।
नए राष्ट्रपति जो बाइडन ने भी इसे बरकरार रखा और सेनाओं की वापसी हो गई। लगभग पूरी विदेशी सेना की वापसी हो गई है। हालांकि, सेनाओं की वापसी के साथ अमेरिका का तालिबान के खात्मे का मुद्दा अब कमजोर पड़ चुका है। धीरे-धीरे तालिबान अफगानिस्तान में वापस पैर पसारने लगा है। लगभग दो तिहाई हिस्से पर वापस कब्जा जमा लिया है।
इससे साफ होता है कि अमेरिका और नाटो की सेनाओं ने बीते 20 साल में जो संघर्ष किया अब लगभग वह व्यर्थ हो गया है। अमेरिका समेत यूरोप के नाटो देश खुश है कि उनके जवान लंबे अंतराल के बाद घर लौट रहे हैं लेकिन अफगानी लोग अब एक बार फिर खौफ के साये में जीने को मजबूर होने जा रही है।
2001 में शुरू हुई तालिबान के खात्मे की जंग
अफगानिस्तान में अमेरिका एवं नाटो सेनाओं की जंग 2001 में शुरू हुई थी। इस जंग में तालिबान विरोधी सभी देश और संगठन साथ आए। अमेरिकी स्पेशल फोर्स के साथ मिलिशिया लड़ाके भी जंग में उतरे। इन्होंने नवंबर 2001 के दूसरे सप्ताह में अफगानिस्तान की राजधानी काबुल, प्रमुख शहर कंधार को भी तालिबान को खदेड़कर अपने कब्जे में ले लिया। दिसंबर 2001 में टोराबोरा पर्वतों से तालिबान का तत्कालीन सरगना ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान भाग गया। उधर, अमेरिका की सैन्य मदद से, अफगानिस्तान में हामिद करजई के नेतृत्व में नई सरकार का गठन कर दिया गया।
2003 में खत्म हुए सैन्य अभियान
अमेरिका ने नई सरकार के गठन के करीब डेढ़ साल बाद मई 2003 में अफगानिस्तान में प्रमुख सैन्य अभियान के खत्म होने का दावा किया। इस बीच, अमेरिका ने अपना ध्यान इराक में तानाशाह सद्दाम हुसैन को सत्ता से बेदखल करने पर लग चुका था। इधर, अफगानिस्तान में 2004 में नया संविधान तैयार हो गया था, लेकिन इस दौरान तालिबान ने धीरे-धीरे घात लगाकर हमले और आत्मघाती हमले शुरू कर दिए। अमेरिकी सेनाएं 2007 तक मुख्य रूप से इराक में उलझी रहीं।
2008 में अमेरिका की सत्ता बदली और जंग तेज हुई
इधर, अमेरिका में 2008 चुनावी साल था। फरवरी 2009 में बराक ओबामा अमेरिका के नए राष्ट्रपति के तौर पर काम संभाल चुके थे। उन्होंने अफगानिस्तान में तालिबान के खात्मे के लिए और 17 हजार सैनिकों को भेजने की घोषणा की जबकि 36 हजार विदेशी सैनिक पहले से मौजूद थे। 2010 तक ओबामा ने कुल एक लाख सैनिक भेज दिए और जंग को तेज कर दिया।
2011 में लादेन का खात्मा किया
ओबामा प्रशासन के दौरान इस लड़ाई ने एक नया मोड़ लिया। अमेरिका ने मई 2011 में पाकिस्तान में एयर स्ट्राइक की। अमेरिकी नेवी सील कमांडो की टीम ने रात के अंधेरे में पाकिस्तान के एबटाबाद में एक घर में घुसकर अल कायदा के सरगना ओसामा बिन लादेन को मार गिराया। इसने पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोरी थीं।
अगले एक साल में 33 हजार जवानों की वापसी
जून 2011 में ही राष्ट्रपति ओबामा ने अगले साल यानी 2012 तक 33 हजार सैनिकों की वापसी की घोषणा कर दी। इस बीच, अफगानिस्तान सरकार और अमेरिका के रिश्ते बिगड़ने लगे। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई ने नागरिकों की मौत के लिए विदेशी सैनिकों पर आरोप लगाना शुरू कर दिया। इसके बाद अमेरिका ने 2013 में आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था अफगानिस्तान के सुरक्षा बलों को सौंप दी, लेकिन तालिबान का आतंक जारी रहा।
2017 में ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति बने, समझौता किया
2016 के चुनाव में जीत दर्ज करने के बाद 2017 में डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के नए राष्ट्रपति बने। उन्होंने 2018 से 2020 के बीच तालिबान से शांति-वार्ताएं और समझौते के प्रयास शुरू किए। लेकिन, इसमें अफगानिस्तान सरकार को शामिल नहीं किया गया था। इसके बाद, कतर की राजधानी दोहा में 29 फरवरी, 2020 को अमेरिका ने सेना वापसी के लिए तालिबान के साथ समझौता कर लिया। ट्रंप प्रशासन के अनुसार, समझौते में दो खास शर्तें थीं - तालिबान को हिंसा कम करनी होगी और अफगान सरकार से संवाद करना होगा।
2021 में बाइडन ने अमेरिका की सत्ता संभाली
2020 के चुनाव में जीत दर्ज करने वाले डेमोक्रेट नेता जो बाइडन ने 2021 में अमेरिका के राष्ट्रपति का पद संभाला। बाइडन ने अफगानिस्तान से सेना की पूरी वापसी का घोषणा की। लेकिन उसमें शर्तों का उल्लेख नहीं किया। इसके कुछ दिनों बाद ही तालिबान वापस पूरी तरह सक्रिय हो गया और अपने पैर पसारने लग गया।
अमेरिका ने खर्चे दो ट्रिलियन डॉलर
तालिबान के खात्मे के उद्देश्य के साथ शुरू हुए इस जंग में अमेरिका ने 20 वर्षों के दौरान दो ट्रिलियन डॉलर यानी लगभग दो लाख करोड़ डॉलर खर्च किए। इतना ही नहीं इस जंग में अमेरिका के 2400 और नाटो देशों के लगभग 700 सैनिकों की जान गई है। वहीं, अफगानिस्तान की सेना के 60 हजार जवान और 40 हजार नागरिकों को भी जान से हाथ धोना पड़ा है। लेकिन फिर भी नतीजा ढाक के तीन पात ही है। तालिबान ने अफगानिस्तान में वापस पैर जमाना शुरू कर दिया है।
अफगानिस्तान 20 साल पहले जैसी स्थिति में जा रहा
अतंरराष्ट्रीय एवं अमेरिकी मीडिया की रिपोर्टों को देखने पर जानकारी मिलती है कि अफगानिस्तान में तालिबान एक बार फिर से अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। इसका अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि वहां प्रोविंशियल सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट समेत कुल 421 जिलों में से 320 पर तालिबान हावी हो चुका है। 75 जिलों में और 160 से ज्यादा जिलों के ग्रामीण इलाकों में कब्जा कर लिया है। हालांकि, कोई बड़ी हिंसात्मक घटना न होने से अभी अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इसे लेकर सन्नाटा बना हुआ है।
ऐसे समझें पूरी कहानी : बुश ने जंग छेड़ी थी, ओबामा ने तेज की, ट्रंप ने समझौता किया और बाइडन ने सेना वापस बुलाई
अमेरिका की तालिबान के खिलाफ अफगानिस्तान नीति पूरी तरह सत्ता के इर्द-गिर्द केंद्रित रही है। जब-जब अमेरिका में सत्ता बदली है, तब-तब उसका असर अफगानिस्तान पर पड़ा है। 20 वर्ष पहले तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने तालिबान के खात्मे के लिए जंग छेड़ी। उनके बाद बराक ओबामा ने पूरी ताकत झोंक दी। फिर ट्रंप के दौर में तालिबान से दोहा डील नामक समझौता हुआ। इसके बाद, बाइडन के कार्यकाल में सेना लगभग पूरी तरह वापस आ चुकी है। जबकि अफगानिस्तान में तालिबान वापस सक्रिय तौर पर पैर जमा चुका है।
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