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साक्षात्कार: सुनील गलगोटिया बोले- बेहतर भारत के लिए किफायती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा जरूरी, पढ़ें बातचीत के अंश

Mon, 03 Apr 2023 06:20 AM IST
Jeet Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Jeet Kumar Updated Mon, 03 Apr 2023 06:20 AM IST
सार

देश की शीर्ष रैंकिंग वाली शिक्षण संस्थाओं में शुमार गलगोटिया यूनिवर्सिटी आज किसी परिचय की मोहताज नहीं है। नैक से ए प्लस ग्रेडिंग हासिल करने वाली यूनिवर्सिटी के चांसलर सुनील गलगोटिया का कहना है कि अगर हमें बेहतर भारत का निर्माण करना है तो किफायती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर जोर देना होगा। इन्हीं दो कारकों के दम पर आज का शिक्षा उद्योग तरक्की की राह पर आगे बढ़ेगा। साथ ही, हमें अच्छी फैकल्टी के साथ पढ़ाने के बेहतर तरीकों पर ध्यान देना होगा। कालीचरण की सुनील गलगोटिया से खास बातचीत के अंश...

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Sunil Galgotia said Affordable and quality education is necessary for a better India
सुनील गलगोटिया - फोटो : Twitter

विस्तार

आप पब्लिशिंग बिजनेस से ताल्लुक रखते हैं। शिक्षा क्षेत्र में आए और इंजीनियरिंग कॉलेज से लेकर यूनिवर्सिटी तक बना डाली। सफर कैसा रहा?

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आप जब भी कुछ बड़ा करना चाहते हैं, तो चुनौतियां आती हैं। इनसे निकलकर खास मुकाम तक पहुंचना होता है। कनॉट प्लेस में मेरी किताबों की दुकान थी। इसे लेकर ताऊ जी से विवाद हुआ। कोर्ट केस के दौरान 1980 में पिता जी की मृत्यु हो गई। उस समय मैं 22 साल का था। फिर मैंने आपने नाम से पब्लिशिंग का काम शुरू किया। राजीव गांधी के दौर में कंप्यूटर का बूम आया। कंप्यूटर की किताबें बेचने लगे, जो काफी मशहूर हुईं। लेकिन, सोच हमेशा बड़ा करने की थी।
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इस सफर के दरम्यान मेरे जानने वाले एक प्रोफेसर ने कहा कि अगर आप कॉलेज खोलने चाहते हैं तो कुछ नियमों को पूरा करना होगा। वह अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) में डेपुटेशन पर थे। उस समय सोचा भी नहीं था कि इस क्षेत्र में जाना है। बहरहाल, 1999 में नोएडा में किराये में कमरे में 25 कंप्यूटर के साथ एमसीए की शुरुआत की। अगले साल प्रोफेसर साहब ने कहा कि सुनील अब कॉलेज तो खोलना पड़ेगा। इसके लिए 10 एकड़ जमीन चाहिए। हमारे पास संसाधन नहीं थे, फिर भी आवेदन कर दिया। 
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लखनऊ इंटरव्यू देने गए। दुकान की वजह से इंटरव्यू बोर्ड के लोग मुझे जानते थे। बोर्ड से मैंने 10 एकड़ जमीन खरीदने के लिए 10 दिन का समय मांगा। नोएडा में जमीन के लिए मुख्य सचिव से बात हुई। बात नहीं बनी। फिर पैसे का जुगाड़ कर ग्रेटर नोएडा में जमीन ले ली। कॉलेज खोलने से लेकर यूनिवर्सिटी बनाने तक कई मुश्किलें आईं। जान पर भी संकट आया। तमाम मुश्किलों के बाद पहले साल में ही सीटें पूरी भर गईं। फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

सीएम का निवेश के साथ शिक्षा पर जोर
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का निवेश के साथ शिक्षा पर खास जोर है। वह सदन में कह चुके हैं कि राज्य में सिर्फ चार यूनिवर्सिटी हैं, जो 'नैक ए प्लस' हैं। गलगोटिया भी इनमें एक है। यह प्रमाण है कि हम कितना अच्छा कर रहे हैं। हमारे सारे कोर्स एनबीए एक्रीडेटेड हैं। प्लेसमेंट प्रोफाइल अच्छा है। देखिए, जब मुख्यमंत्री किसी बात पर जोर देते हैं तो उसका असर जरूर दिखेगा। उनके निवेश बढ़ाने के प्रयासों से कंपनियां यहां आएंगी। नौकरियां भी यहीं मिलेंगी। बाहर नहीं जाना पड़ेगा।

पहले अच्छे कॉलेज में पढ़ाई और फिर नौकरी की जद्दोजहद में बच्चों पर अनावश्यक तनाव काफी बढ़ रहा है। आपको क्या लगता है?
देखिए, यह एक हद तक जरूरी है। तभी वह दबाव में आकर काम करना सीखेगा। बड़ा सपना देखेगो, तभी आगे बढ़ोगे। पैरेंटल दबाव क्या है, उसके बारे में मैं ज्यादा नहीं कह सकता। लेकिन, आजकल के बच्चों के पास सारी जानकारियां होती हैं। अगर वे महत्वाकांक्षी हैं तो अच्छी चीजों की डिमांग तो करेंगे।

देशभर में तमाम शिक्षण संस्थाएं हैं। गलगोटिया यूनिवर्सिटी इनमें अलग कैसे है?
हर व्यापार में बने रहने के लिए गुणवत्ता जरूरी है। जब मैंने इंजीनियरिंग कॉलेज की शुरुआत की तो मांग के मुकाबले आपूर्ति कम थी। उस समय गुणवत्ता की बात कोई सोचता ही नहीं था। अधिक मांग की वजह से मशरूम की तरह तमाम कॉलेज पैदा हो गए। हालांकि, लोग इसे नकारात्मक तरीके से लेते हैं। यही बाद में गुणवत्ता की वजह बनी। हमने शुरू से ही उच्च स्तरीय फैकल्टी, बेहतर कोर्स और पढ़ाने के तरीकों पर ध्यान पर दिया। जॉर्जेट यूनिवर्सिटी से वाइस चांसलर लाए। वह यूनिवर्सिटी का बेस बना गए।

अब हमने पैडोलॉजी अप्रोच से पढ़ाने के लिए नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर से करार किया है। बाहर की यूनिवर्सिटी में 'टीचिंग-लर्निंग प्रॉसेस' विभाग होता है। पैडोलॉजी में विषय पर नहीं बल्कि पढ़ाने के लिए विभिन्न प्रकार के टूल के इस्तेमाल जोर होता है। इसके लिए 15 फैकल्टी को सिंगापुर भेजेंगे।

अमेरिका, जापान और सिंगापुर जैसे देशों में रिसर्च, स्किल डेवलपमेंट और पेटेंट पर काफी जोर है। भारत में अब भी थ्योरी पर ज्यादा ध्यान है। इसे आप कैसे देखते हैं?
अमेरिका में रिसर्च के लिए अरबों डॉलर का बजट है। सरकार भी मदद करती है। हिंदुस्तान में सबसे उच्चतम आईआईटी है। लेकिन, वर्ल्ड रैंकिंग में वह शीर्ष-200 में भी नहीं है क्योंकि हमारे यहां उच्च स्तर का रिसर्च नहीं होता है। देखिए, आगे चलकर रिसर्च में प्राइवेट यूनिवर्सिटी ही अच्छा करेंगी। सरकारी यूनिवर्सिटी एक स्तर के बाद पेपर और क्लैरिकल वर्क में लगी रहती हैं। एअर इंडिया का ही उदाहरण देखिए। सरकार के पास थी तो घाटा हो रहा था। टाटा के पास आने के बाद उसकी हालत सुधरी है।

पढ़ाई के बाद जो बच्चा छह महीने बाहर जाकर स्किल सीखता है, अब हम उसे कैंपस में ही यह सुविधा देंगे। इन्फोसिस हमारे यहां कैंपस प्लेसमेंट के लिए आती है। उसके साथ हमने करार किया है। इन्फोसिस या अन्य बड़ी कंपनियों को अपने कैंपस का एक हिस्सा दे देंगे। वहां इंडस्ट्री की जरूरत के हिसाब से बच्चों को तैयार करने के लिए इनटेंसिव ट्रेनिंग दी जाएगी। इसका पूरा खर्च हम उठाएंगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद कहते हैं सरकार का काम बिजनेस चलाना नहीं बल्कि उसे सक्षम करना है। उनकी यही बात मुझे अच्छी लगती है। उन्हीं की सोच को आगे बढ़ाते हुए हम अपने यहां भी रिसर्च पर जोर दे रहे हैं। हम नई बिल्डिंग में एक फ्लोर सिर्फ रिसर्च के लिए बना रहे हैं।

निजी शिक्षण संस्थानों में फीस काफी ज्यादा है। ऐसे में सभी युवाओं को शिक्षा देने का लक्ष्य कैसे पूरा होगा?
2011 में जब मैंने यूनिवर्सिटी खोली तो इंजीनयिंरग में फीस 1.50 लाख रुपये थी। 11 साल में फीस एक रुपये भी नहीं बढ़ाई। हमने शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखी और किफायती भी रखा। इसका हमें फायदा रखा। आज बच्चों को अच्छी और किफायती दर पर शिक्षा चाहिए। अन्य बड़े कॉलेजों को देखिए, जो एक समय हमसे अच्छे थे। लेकिन, फीस पर ध्यान देने के अलावा उन्होंने खुद को बेहतर करने के लिए कुछ नहीं किया। इसलिए, उनके बच्चे घट रहे हैं और हमारे यहां बढ़ रहे हैं। इस साल हमारे यहां 11,000 एडमिशन हुए हैं, जो पूरे देश में सबसे ज्यादा है।


माना जा रहा है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और चैट जीपीटी की वजह से नौकरियां जाएंगी। ऐसे में यूनिवर्सिटी के बच्चों के भविष्य को लेकर चुनौतियां बढ़ नहीं जाएंगी?
हम बच्चों को सिर्फ नौकरी के लिए तैयार नहीं कर रहे हैं। यह सिर्फ एक पड़ाव है। हम उन्हें इंटरप्रेन्योर बनाने समेत अन्य विधाओं के लिए तैयार कर रहे हैं। इसलिए हम उन्हें स्किल्ड बनाने पर जोर दे रहे हैं। हम चाहते हैं कि हमारे छात्र नौकरी पाने की जगह नौकरी देने वाले बनें। सेमेस्टर की पढ़ाई के दौरान भी हम इस दिशा में ध्यान देते हैं।

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