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Hindi News ›   Education ›   RTE quota: HC junks Maharashtra govt notification giving conditional exemption to private schools

RTE Quota: एचसी ने महाराष्ट्र सरकार की स्कूलों को सशर्त छूट देने वाली आधिसूचना को किया रद्द, पढ़ें पूरी खबर

Fri, 19 Jul 2024 12:26 PM IST
शाहीन परवीन एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: शाहीन परवीन Updated Fri, 19 Jul 2024 12:26 PM IST
सार

RTE Quota: बंबई हाईकोर्ट शुक्रवार को निजी स्कूलों को सशर्त छूट देने वाली महाराष्ट्र सरकार की अधिसूचना खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा अधिसूचना संविधान के अनुच्छेद 21 और बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के प्रावधानों के विपरीत है।

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RTE quota: HC junks Maharashtra govt notification giving conditional exemption to private schools
बंबई उच्च न्यायालय - फोटो : ANI

विस्तार

RTE Quota: बंबई उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को महाराष्ट्र सरकार की नौ फरवरी की अधिसूचना को रद्द कर दिया, जिसमें सरकारी या सहायता प्राप्त स्कूलों के एक किलोमीटर के दायरे के निजी स्कूलों को शिक्षा का अधिकार (RTI) अधिनियम कोटा प्रवेश से छूट दी गई थी।

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मुख्य न्यायाधीश डी के उपाध्याय और न्यायमूर्ति अमित बोरकर की खंडपीठ ने कहा कि अधिसूचना संविधान के अनुच्छेद 21 और बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के प्रावधानों के विपरीत है।  
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एचसी ने कहा, "अधिसूचना को अमान्य माना जाता है।"

हालांकि, पीठ ने कहा कि मई में अधिसूचना के कार्यान्वयन पर रोक लगाने से पहले, कुछ निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों ने छात्रों को प्रवेश दिया था।

इसमें कहा गया है कि इन दाखिलों में खलल नहीं डाला जाएगा लेकिन स्कूल यह सुनिश्चित करेंगे कि आरटीई के तहत सीटों के लिए 25 प्रतिशत कोटा भरा जाए।

मई में हाईकोर्ट ने अधिसूचना के कार्यान्वयन पर रोक लगा दी थी।

याचिकाओं के एक समूह ने अधिसूचना को चुनौती देते हुए दावा किया था कि यह आरटीई अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन है।

अधिसूचना में सरकार द्वारा संचालित या सहायता प्राप्त स्कूल के एक किलोमीटर के दायरे में आने वाले निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों को आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने से छूट दी गई है।
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अधिसूचना से पहले, सभी गैर सहायता प्राप्त और निजी स्कूलों के लिए ऐसे बच्चों के लिए अपनी 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करना अनिवार्य था।

दलीलों में कहा गया कि अधिसूचना बच्चों के शिक्षा के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन करती है।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, अधिसूचना असंवैधानिक थी और आरटीई अधिनियम के विपरीत थी जो कमजोर और वंचित वर्गों के बच्चों को मुफ्त शिक्षा का अधिकार देता है।

अतिरिक्त सरकारी वकील ज्योति चव्हाण ने तर्क दिया था कि अधिसूचना केवल उन गैर-सहायता प्राप्त निजी स्कूलों पर लागू होती है जो उन क्षेत्रों में स्थित हैं जहां सरकारी या सहायता प्राप्त स्कूल हैं।

आरटीई अधिनियम के तहत, निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में प्रवेश स्तर - कक्षा 1 या पूर्व-प्राथमिक खंड - में 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्गों के बच्चों के लिए आरक्षित होनी चाहिए।

इन छात्रों को मुफ्त में शिक्षा मिलती है, जबकि सरकार स्कूलों को उनकी ट्यूशन फीस की प्रतिपूर्ति करती है।RTE Quota: बंबई उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को महाराष्ट्र सरकार की नौ फरवरी की अधिसूचना को रद्द कर दिया, जिसमें सरकारी या सहायता प्राप्त स्कूलों के एक किलोमीटर के दायरे के निजी स्कूलों को शिक्षा का अधिकार (RTI) अधिनियम कोटा प्रवेश से छूट दी गई थी।

मुख्य न्यायाधीश डी के उपाध्याय और न्यायमूर्ति अमित बोरकर की खंडपीठ ने कहा कि अधिसूचना संविधान के अनुच्छेद 21 और बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के प्रावधानों के विपरीत है।  

एचसी ने कहा, "अधिसूचना को अमान्य माना जाता है।"

हालांकि, पीठ ने कहा कि मई में अधिसूचना के कार्यान्वयन पर रोक लगाने से पहले, कुछ निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों ने छात्रों को प्रवेश दिया था।

इसमें कहा गया है कि इन दाखिलों में खलल नहीं डाला जाएगा लेकिन स्कूल यह सुनिश्चित करेंगे कि आरटीई के तहत सीटों के लिए 25 प्रतिशत कोटा भरा जाए।

मई में हाईकोर्ट ने अधिसूचना के कार्यान्वयन पर रोक लगा दी थी।

याचिकाओं के एक समूह ने अधिसूचना को चुनौती देते हुए दावा किया था कि यह आरटीई अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन है।

अधिसूचना में सरकार द्वारा संचालित या सहायता प्राप्त स्कूल के एक किलोमीटर के दायरे में आने वाले निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों को आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने से छूट दी गई है।

अधिसूचना से पहले, सभी गैर सहायता प्राप्त और निजी स्कूलों के लिए ऐसे बच्चों के लिए अपनी 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करना अनिवार्य था।

दलीलों में कहा गया कि अधिसूचना बच्चों के शिक्षा के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन करती है।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, अधिसूचना असंवैधानिक थी और आरटीई अधिनियम के विपरीत थी जो कमजोर और वंचित वर्गों के बच्चों को मुफ्त शिक्षा का अधिकार देता है।

अतिरिक्त सरकारी वकील ज्योति चव्हाण ने तर्क दिया था कि अधिसूचना केवल उन गैर-सहायता प्राप्त निजी स्कूलों पर लागू होती है जो उन क्षेत्रों में स्थित हैं जहां सरकारी या सहायता प्राप्त स्कूल हैं।


आरटीई अधिनियम के तहत, निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में प्रवेश स्तर - कक्षा 1 या पूर्व-प्राथमिक खंड - में 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्गों के बच्चों के लिए आरक्षित होनी चाहिए।

इन छात्रों को मुफ्त में शिक्षा मिलती है, जबकि सरकार स्कूलों को उनकी ट्यूशन फीस की प्रतिपूर्ति करती है।

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