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यूनाइटेड स्टेट्स के बी-स्कूल्स में घरेलू आवेदन ज्यादा आने से, भारतीय छात्रों के लिए बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा

Wed, 17 Feb 2021 07:50 PM IST
वर्तिका तोलानी एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: वर्तिका तोलानी Updated Wed, 17 Feb 2021 07:50 PM IST
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Now taking Admission in US business schools will become more difficult for Indian students
यूएस के बी-स्कूल्स में भारतीय छात्रों का प्रवेश आसान नहीं। - फोटो : अमर उजाला

यूनाइटेड स्टेट्स में ग्रेजूएट बिजनेस की पढ़ाई करने के लिए वर्ष 2020 चक्र में घरेलू आवेदन, कोविड-19 महामारी के बावजूद तकरीबन 29 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं। इससे यूएस बिजनेस स्कूलों में पढ़ाई के लिए वर्ष 2021 और 2022 में भारतीयों को अधिक प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। अमेरिकन जॉब छोड़कर बिजनेस स्कूल्स में पढ़ने के विकल्प को प्राथमिकता दे रहे हैं, इसलिए भी अधिक छात्र आवेदन कर रहे हैं। इसके साथ ही पूरे विश्व में बिजनेस एजुकेशन में आवेदन और नामांकन बढ़ रहे हैं। यूएस में घरेलू आवेदनों में आए इस उछाल पर बात करते हुए ग्रेजूएट मैनेजमेंट ऐडमिशन काउंसिल के अध्यक्ष और सीईओ संगीत चोवफ्ला ने यह जानकारी दी। 

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भारत में बिजनेस प्रोग्राम्स में आवेदनों की संख्या में कमी के बावजूद भी प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। चोवफ्ला ने कहा जीमैट और एनमैट जैसे टेस्ट्स के लिए भारत में गत मई 2020 से वी- शेप रिकवरी देखी गई है। यूएस के बिजनेस स्कूलों में दाखिला लेना और प्रतिस्पर्धी हो गया है, जो भारत के छात्रों के लिए चिंता की बात है। यहां के स्टूडेंट्स में यूएस में पढ़ना एक छिपी हुई मांग है। जो छात्र पूर्व राष्ट्रपति ट्रम्प के प्रशासन की इमिग्रेशन पॉलिसी और कोविड-19 महामारी के चलते चूक गए, वे भी अब आवेदन कर रहे हैं। चोवफ्ला ने और अधिक स्पष्ट करते हुए कहा कि छात्र एमबीए प्रोग्राम्स के लिए दिसंबर-जनवरी में आवेदन करते रहे हैं, लेकिन अब सितंबर 2021 या 2022 में आवेदन करेंगे क्योंकि वे ऑनलाइन क्लासेस की बजाय इन-पर्सन अनुभव को प्राथमिकता देंगे।

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उन्होंने बताया कि, यूनाइटेड स्टेट्स सहित दुनिया भर में चल रहे बिजनेस स्कूलों का लागत मूल्य कोविड- 19 प्रतिबंधों के कारण बढ़ गया है। अब आपको सोशल डिस्टेंसिंग के चलते अधिक क्लासरूम की जरूरत होगी सिवाय इसके अन्य सेफ्टी प्रीकॉशंस लेने होंगे। अब महामारी के चलते अन्य देशों से आए छात्रों के रहने और खाने के तौर-तरीके बदल जाएंगे। नतीजतन किसी भी इंस्टीट्यूशन के आर्थिक दृष्टि से नॉन एकेडेमिक्स पार्ट्स और इनके जरिए होने वाली आय, अब नहीं होगी।

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