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Jaya Kishori in Samvad: परीक्षाओं के इस दौर में बच्चे और माता-पिता क्या करें? जया किशोरी का यह संदेश पढ़िए
Tue, 27 Feb 2024 04:53 PM IST
अभिषेक दीक्षित
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: अभिषेक दीक्षित
Updated Tue, 27 Feb 2024 04:53 PM IST
सार
Jaya Kishori in Samvad: जया किशोरी ने कहा कि यह बहुत ज्यादा जरूरी है। आध्यात्म युवाओं के लिए ही है। शास्त्र जीवन जीना सिखाते हैं, लेकिन हम उन्हें तब पढ़ते हैं, जब जीवन बचा ही नहीं होता।
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Jaya Kishori
- फोटो : Amar Ujala
विस्तार
Jaya Kishori in Samvad: अमर उजाला संवाद के दूसरे दिन मशहूर कथावाचक और मोटिवेशनल स्पीकर जया किशोरी बतौर अतिथि शामिल हुईं। 'सार्थक जीवन की बात' सत्र में जया किशोरी ने छात्रों को खास सलाह दी। परीक्षा से पहले उन्होंने छात्रों के अलावा उनके माता-पिता को भी खास संदेश दिया। आइए विस्तार से जानते हैं...
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परीक्षाओं का वक्त है, माता-पिता चिंतित हैं। बच्चे निराशा में कदम उठा लेते हैं। ऐसे में वो क्या करें?
जया किशोरी: आध्यात्म आपको सिखाता है कि जो कुछ चल रहा है, वह स्थायी नहीं है। कुछ भी स्थायी नहीं है। आप जिस बात पर आज रो रहे हैं, 10 साल बाद आप उसी बात पर हंसेंगे। मैथ्स में जब मेरे नंबर कम आए, तब मैं परेशान थी, लेकिन आप अपनी जिंदगी में कुछ न कुछ कर लेते हैं। जब ये मान लेते हैं कि यही सब कुछ है, तब दिक्कत होती है। आध्यात्म सिखाता है कि ईश्वर के सिवाए कुछ भी सच नहीं है। ये ऊपर वाले की पिक्चर चल रही है। आप एक्टर हैं, आप अपना रोल अच्छे से निभाइए। काम ऐसे करें कि आंख मिलाने लायक रहें। हर व्यक्ति अपनी जिंदगी में कुछ न कुछ कर लेता है।
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क्या तुलना करना सही है?
जया किशोरी: आप किसी से तुलना करके अपने बच्चे को उसके जैसा मत बनाइए। अगर आपका बच्चा मैथ्स में अच्छा है और इकोनॉमिक्स में खराब है तो इकोनॉमिक्स के बजाय मैथ्स की ही ट्यूशन लगाइए। जहां वह बेहतर है, वहां मेहनत कीजिए। जहां वह कमजोर है, वहां उससे बेवजह मेहनत मत करवाइए। मेरे माता-पिता ने मैथ्स की बजाय आध्यात्म की शिक्षा दी। उन्होंने कहा कि बस पास हो जाना। हमें यह नहीं चाहिए कि आप 100 में से 95 नंबर लेकर आइए। जहां बच्चे की दिलचस्पी है, वह काम उसे करने दीजिए। जहां दिलचस्पी नहीं है, वहां वह डिग्री तो ले लेगा कि काम नहीं कर पाएगा। जो काम देगा, वह कहेगा कि डिग्री अलग रखो, काम करके बताओ। कॉम्पीटिशन के चक्कर में बच्चे गलत रास्ते अपना लेते हैं। स्कूल में वह शायद चीटिंग करके आगे रह लेगा। जिंदगी में चीटिंग करेगा यानी गलत रास्ते पर जाएगा। उसे यह सिखाइए कि काम इतना कीजिए कि भले ही एक रोटी कम खाएं, लेकिन सुकून से नींद आए। याद रखें कि चोर अपनी परछाई से डरता है।
माता-पिता क्या करें?
जया किशोरी: ऐसा नहीं है कि किसी के पास वक्त नहीं है। सिंड्रेला हटाइए और आप बेड टाइम पर बच्चों को कृष्ण और राम की कहानी सुनाइए। आप बच्चों को क्लासेस में भेज रहे हैं। एक क्लास शास्त्रों की भी कीजिए। एक्स्ट्रा करिकुलर में आप आध्यात्म को क्यों शामिल नहीं करते? व्यस्त तो हमारे माता-पिता भी थे। मैंने वो समय देखा है कि जब सुबह खाना खाया तो शाम का पता नहीं होता। इसके बावजूद मेरे माता-पिता ने मुझे सत्संग और आध्यात्म से जोड़ा।
वह कौन-सा क्षण था, जब आपको लगा कि कथा वाचक बनना है?
जया किशोरी: मैंने इस रास्ते को नहीं चुना। इस रास्ते ने मुझे चुना। बचपन में यह मेरे लिए खेल था। मुझे गाना अच्छा लगता था तो भजन गाती थी। मुझे भगवान की बातें करना अच्छा लगता तो बात की। सुनने लगी, पढ़ने लगी। बहुत बाद में हुआ, जब समझ आया कि यह करियर हो सकता है। मैं 16-17 साल की थी, तब मैंने यह सोचकर तय किया कि मुझे यही करना है। भगवान ने मुझे इस काम के लिए चुना है। पहली बार कथा का अनुभव बहुत अच्छा था। जहां हमने पहली कथा, वह मंदिर के नीचे का एक हॉल था। मुझे याद है कि जब श्रोता आने लगे और बैठने लगे, तब थोड़ी देर पहले मैं उन्हीं के बच्चों के साथ खेल रही थी। थोड़ी देर बाद कथा करने बैठ गई। मैं बचपन से ही ऐसी हूं।
पूजा-पाठ और आध्यात्म को बुढ़ापे की बात कहा जाता है, लेकिन आप तो युवा हैं। युवाओं के लिए यह कितना जरूरी है?
जया किशोरी: यह बहुत ज्यादा जरूरी है। आध्यात्म युवाओं के लिए ही है। शास्त्र जीवन जीना सिखाते हैं, लेकिन हम उन्हें तब पढ़ते हैं, जब जीवन बचा ही नहीं होता। जब व्यक्ति बहुत बूढ़ा हो जाता है तो वह कांपती आवाज में कहता है कि अब भगवान को बुलाएंगे। तब भगवान कह रहे होते हैं कि अब तो हम तुम्हें बुलाएंगे क्योंकि तुम्हारा वक्त खत्म हो गया है। जब आपके समय था, तब आप भगवान से नहीं जुड़े, फिर बुढ़ापे में गंगा में जाकर पाप धोते हैं। आध्यात्म, भगवान, ये युवाओं के लिए ही है। युवाओं के पास भटकाव है, वे प्रतिद्वंद्वी माहौल में हैं। युवा सबसे ज्यादा बदलाव देख रहा है। माता-पिता अलग पीढ़ी से हैं, युवा अलग पीढ़ी से हैं। युवा दो जिंदगी जी रहा है, उससे ज्यादा कन्फ्यूज कोई नहीं है। कई लोग मेरे माता-पिता को कहते हैं कि इतनी भक्ति में है, वैराग्य न ले ले।
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