Goa: गोवा के छात्रों ने विकसित की ऑनलाइन कट्टरपंथी सामग्री की पहचान के लिए नई तकनीक, गृह मंत्रालय ने सराहा
Goa: गोवा के BITS पिलानी छात्रों ने कट्टरपंथी ऑनलाइन सामग्री की पहचान के लिए एक तकनीक विकसित की, जिसे गृह मंत्रालय ने सराहा। यह टूल वीडियो और वेबसाइट की जांच कर सुरक्षा एजेंसियों को मदद करता है। गोवा पुलिस ने इसे अपनाया है।
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Goa: गोवा में स्थित BITS पिलानी के छात्रों ने एक अनूठा समाधान विकसित किया है, जो इंटरनेट पर कट्टरपंथी सामग्री को पहचानने में मदद करेगा। इस परियोजना की सराहना केंद्रीय गृह मंत्रालय ने की है, जिससे देश की सुरक्षा एजेंसियों को मदद मिल सकती है।
हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को नए आपराधिक कानून (BNS और BNSS) के कार्यान्वयन पर एक प्रस्तुति दिखाई गई थी, जिसमें उन्होंने BITS पिलानी के इस प्रोजेक्ट की प्रशंसा की। गोवा पुलिस ने इस तकनीक को अपनाया है। इस अवसर पर गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत भी मौजूद थे।
छात्रों ने दो महत्वपूर्ण समाधान विकसित किए
BITS पिलानी के गोवा कैंपस में कंप्यूटर साइंस विभाग के प्रोफेसर डॉ. हेमंत राठौड़ ने बताया कि छात्रों ने दो महत्वपूर्ण समाधान विकसित किए हैं – कट्टरपंथी सामग्री की पहचान (Radical Content Detection) और फर्जी वेबसाइट की पहचान (Fake URL Detection)।
उन्होंने बताया, "सुरक्षा एजेंसियां इस तकनीक का उपयोग करके कट्टरपंथी वीडियो को पहचान सकती हैं, जबकि आम लोग इसका उपयोग नकली और असली वेबसाइटों के बीच अंतर करने के लिए कर सकते हैं।"
डॉ. राठौड़ ने बताया कि गृह मंत्री अमित शाह ने इस समाधान को एक बैठक के दौरान स्वीकार किया। उन्होंने इस परियोजना के लिए संस्थान के कुलपति और निदेशक सुमन कुंडू तथा कंप्यूटर साइंस विभाग के प्रमुख प्रोफेसर शांतनु सरकार का आभार व्यक्त किया, जिन्होंने इसे विकसित करने के लिए संसाधन और वित्तीय सहायता प्रदान की।
छात्रों ने दिया समाधान का रूप
इस प्रोजेक्ट पर काम करने वाले छात्रों का मुख्य उद्देश्य ऑनलाइन ऐसे कंटेंट को पहचानना था, जो नफरत और हिंसा को बढ़ावा दे सकते हैं।
तीसरे वर्ष के कंप्यूटर साइंस छात्र रोहित राज ने बताया कि इस विचार की शुरुआत गोवा पुलिस द्वारा आयोजित एक हैकाथॉन से हुई थी। इस प्रतियोगिता में दिए गए समस्या वक्तव्य (Problem Statement) में ऐसे ऑनलाइन वीडियो की पहचान करने की चुनौती थी, जो हिंसा, नफरत और भेदभाव को बढ़ावा दे सकते हैं।
उन्होंने कहा, "हमारे टूल 'Radical Content Analyser' की मदद से वीडियो की जांच की जा सकती है। यह उपकरण वीडियो की विस्तृत रिपोर्ट तैयार करता है, जिससे अधिकारी तय कर सकते हैं कि वीडियो को सेंसर किया जाए या नहीं।"
इस तकनीक के जरिए उपयोगकर्ता यूट्यूब या एक्स (पहले ट्विटर) से किसी वीडियो का URL पेस्ट कर सकते हैं या कोई वीडियो अपलोड कर सकते हैं। इसके बाद यह टूल सामग्री का विश्लेषण कर एक रिपोर्ट तैयार करता है, जिसमें "रैडिकल प्रॉबेबिलिटी स्कोर" और "रैडिकल कंटेंट परसेंटेज" जैसी जानकारी शामिल होती है।
रोहित ने बताया कि रिपोर्ट में पांच अलग-अलग मानकों के आधार पर विस्तृत विश्लेषण दिया जाता है, जिससे यह तय किया जा सकता है कि वीडियो को हटाना चाहिए या नहीं।
तीसरे वर्ष के ही छात्र उत्कर्ष द्विवेदी ने कहा कि यह नवाचार नागरिकों के बीच कट्टरपंथी विचारों के प्रसार को रोकने के लिए बनाया गया है।
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