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इतिहास के पन्नों से: किंग्सवे से लेकर राजपथ तक, पढ़िए नई दिल्ली के निर्माण का किस्सा

Sun, 16 May 2021 04:57 PM IST
Vartika Tolani वर्तिका तोलानी
Updated Sun, 16 May 2021 04:57 PM IST
सार

1911 में किंग जॉर्ज V ने नई दिल्ली बनाने का आदेश दिया था और कोलकाता की जगह नई दिल्ली को भारत की राजधानी बनाने की घोषणा की थी। इसी वजह से मौजूदा राजपथ का नाम किंग्सवे रखा गया था। 

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From Kingsway to Rajpath: Know the history behind democratisation of the British built capital
सी राजगोपालाचारी - फोटो : राष्ट्रपति भवन फोटो आर्काइव

दिल्ली के विभिन्न लोगों के लिए इंडिया गेट का अलग महत्व है। कुछ लोगों के लिए यह फैमली पिकनिक की यादें हैं, कुछ के लिए आंदोलन/प्रतिरोध करने की बस एक जगह। 1988 के किसानों आंदोलन से लेकर 2012 में हुए निर्भया कांड के खिलाफ कैंडल मार्च तक और फिर 2019 में एएनआई-सीएए के विरोध में उठी आवाज की जगह। कुछ के लिए यह गणतंत्र दिवस पर राजनीतिक और सैन्य शक्ति के प्रदर्शन का स्थल है, कुछ के लिए दिल्ली शहर का प्रतीक। लेकिन यहां इंडिया गेट से मेरा संदर्भ राजपथ है। राष्ट्रपति भवन से विजय चौक और इंडिया गेट होते हुए 16वीं शताब्दी के गढ़, पुराना किला तक जाने वाला एक सेरेमोनियल मार्ग।

From Kingsway to Rajpath: Know the history behind democratisation of the British built capital
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद - फोटो : राष्ट्रपति भवन फोटो आर्काइव

नई दिल्ली को भारत की राजधानी बनाने की घोषणा
20वीं शताब्दी की शुरुआती दशक में जब राजपथ की शुरुआत हुई थी तब इसका नाम किंग्सवे रखा गया था। दरअसल, 1911 के दिल्ली दरबार में हिस्सा लेने के लिए किंग जॉर्ज V दिल्ली पधारे थे। उन्होंने इस दौरान दिल्ली का दौरा किया और कोलकाता (तब कलकत्ता) की जगह दिल्ली को भारत (ब्रिटिश शासन) की राजधानी बनाने की घोषणा की। इसलिए अंग्रेजों ने किंग जॉर्ज V के सम्मान में राजपथ का नाम किंग्सवे रखा था।   

From Kingsway to Rajpath: Know the history behind democratisation of the British built capital
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद - फोटो : राष्ट्रपति भवन फोटो आर्काइव

पुरानी दिल्ली के रहते हुए क्यों किया गया नई दिल्ली का निर्माण?
एक साक्षात्कार में कनॉट प्लेस एंड द मेकिंग ऑफ नई दिल्ली पुस्तक की लेखक और इतिहासकार, स्वप्ना लिडल बताती हैं कि शाही मिशन को ध्यान में रखते हुए नई दिल्ली को डिजाइन करने की योजना तैयार की गई। लेकिन इसका निर्माण भारतीय अतीत को मिटाकर नहीं, बल्कि उसके साथ किया गया। इसके पीछे भारतीय इतिहास के साथ संबंध जोड़े रखने के लिए, एक ही शहर में पुरानी राजधानी के साथ नई राजधानी तैयार करने का विचार था। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि नई दिल्ली पर ब्रिटिश छाप के बावजूद, एक स्वतंत्र भारत ने इसे पूरे दिल से अपनाया और इसे सही मायने में अपना बना लिया। अंग्रेजों द्वारा निर्मित पूंजी में कहीं भी ऐसा लोकतंत्रीकरण नहीं दिखता है जैसा इंडिया गेट के पास राजपथ पर दिखाई देता है।

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गणतंत्र दिवस 1965 - फोटो : राष्ट्रपति भवन फोटो आर्काइव

इस जगह पर क्यों हुआ नई दिल्ली का निर्माण
नई दिल्ली के निर्माण की घोषणा करने के बाद, अब उसके लिए पर्याप्त जगह ढूंढना था। पहले यमुना नदी के पूर्वी तट पर संक्षेप में विचार किया गया, लेकिन शहर के बाकी हिस्सों से ज्यादा दूरी होने की वजह इसे खारिज कर दिया गया। तत्पश्चात शाहजहांनाबाद की उत्तर दिशा के क्षेत्र, जिसमें दरबार का स्थल भी शामिल था, पर भी विचार किया जा रहा था। किंतु बाढ़ के खतरे और अन्य कारणों से इसे भी खारिज कर दिया गया। अंत में शाहजहांनाबाद के दक्षिण में स्थित, एक क्षेत्र काे चुना गया। इसे चुनना को मुख्य कारण यहां मौजूद रायसीना हिल थी। इस हिल से 17वीं सदी का शाहजहानाबाद, 14वीं सदी का फिरोजाबाद, पुराना किला, हुमायूं का मकबरा और निजामुद्दीन की दरगाह को देखा जा सकता है।

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डाॅ. राधाकृष्णन - फोटो : राष्ट्रपति भवन फोटो आर्काइव

160 इमारतों तोड़ा और 300 परिवारों को किया गया बेदखल 
लिडल में अपनी एक किताब में लिखा है कि इस क्षेत्र में उन ग्रामीणों की झोपड़ियां और घर भी थी जिनकी भूमि हाल ही में 1894 के भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत अधिग्रहित की गई थी। 1911 और 1916 के बीच करीब 300 परिवारों को बेदखल कर दिया गया। नतीजतन, नगर नियोजन समिति कौन-सी संरचना को तोड़ा जा सकता है और किसे नहीं इसकी सूची तैयार की। मस्जिदों, मंदिरों और मकबरों की सूची तैयार की गई। 'संरक्षित किया जाना चाहिए' की सूची में 45 संरचनाओं को शामिल किया गया। इनमें सफदरजंग का मकबरा, हुमायूं का मकबरा और जंतर-मंतर जैसी संरचनाएं शामिल थी। 

'जब तक विनाश अनिवार्य न हो तब तक नष्ट नहीं किया जाना चाहिए' नामक सूची में 33 इमारतों को शामिल किया गया। सांस्कृतिक महत्व वाली संरचनाओं में बंगला साहिब गुरुद्वारा, बाबा खड़क सिंह मार्ग पर स्थित हनुमान मंदिर आदि को शामिल किया गया। वहीं संरक्षित न करने की सूची में 160 इमारतों का नाम लिखा गया। इस तरह नई दिल्ली का निर्माण कार्य सम्पन्न हुआ और 1931 में भारत की राजधानी के रूप में इसका उद्धाटन किया गया।  

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