शोध: एआई के साथ बढ़ेगी रफ्तार, जर्मनी की यूनिवर्सिटी ने खोज निकाला बिजली खपत बचाकर कार्यक्षमता बढ़ाने का तरीका
AI: एआई सिस्टम जरूरी कंप्यूटिंग, स्टोरेज और ट्रांसमिशन के लिए डाटा सेंटर पर निर्भर होते हैं, जो बड़ी मात्रा में ऊर्जा खपत करते हैं। म्यूनिख तकनीकी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एक तकनीक विकसित की है, जो वर्तमान बिजली खपत पर ही एआई की क्षमता को 100 गुना तेज कर देगी।
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Research: एआई के साथ ज्यादा बिजली खपत एक बड़ी चुनौती बनी हुई थी। मगर अब वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक खोजी है, जो बिजली खपत भी कम करेगी और एआई की कार्यक्षमता भी बढ़ाएगी। लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) आधारित आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) सिस्टम हमारे रोजमर्रा के काम का अभिन्न हिस्सा बन गए हैं।
ये एआई सिस्टम जरूरी कंप्यूटिंग, स्टोरेज और ट्रांसमिशन के लिए डाटा सेंटर पर निर्भर होते हैं, जो बड़ी मात्रा में ऊर्जा खपत करते हैं। अकेले जर्मनी में ही 2020 में डाटा सेंटर पर 1600 करोड़ किलोवाट बिजली खर्च हुई थी। यह वहां की कुल खपत का लगभग एक प्रतिशत है। बीते पांच वर्षों में जटिल एआई अनुप्रयोगों की आमद से दुनियाभर में डाटा सेंटर की क्षमता में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। भविष्य में भी इसके ग्राफ में उत्तरोत्तर वृद्धि तय है।
वर्तमान बिजली खपत पर ही 100 गुना बढ़ेगी एआई की क्षमता
एआई के प्रयोग के साथ बिजली खपत के बढ़ते भार को कम करने के लिए म्यूनिख तकनीकी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एक तकनीक विकसित की है, जो वर्तमान बिजली खपत पर ही एआई की क्षमता को 100 गुना तेज कर देगी। इससे ऊर्जा खपत काफी कम हो जाएगी। हाल ही में इसे कनाडा के वैंकूवर में आयोजित न्यूरल इंफॉर्मेशन प्रोसेसिंग सिस्टम्स कॉन्फ्रेंस ‘न्यूरलपीएस 2024’ में प्रस्तुत किया गया।
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बिजली खपत का कारण
फोटो पहचानने या भाषा प्रोसेस करने जैसे कार्यों के लिए एआई में उपयोग किए जाने वाले न्यूरल नेटवर्क की कार्यप्रणाली मानव मस्तिष्क के काम करने के तरीके पर आधारित है। इन नेटवर्क में कृत्रिम न्यूरॉन्स परस्पर नोड से जुड़े होते हैं। इनमें इनपुट सिग्नल को कुछ पैरामीटर के साथ भेजा जाता है, फिर जोड़ा जाता है। यदि एक निर्धारित सीमा पार हो जाती है तो सिग्नल को अगले नोड पर भेज दिया जाता है।
नेटवर्क को प्रशिक्षित करने के लिए पैरामीटर का प्रारंभिक चयन रैंडमली किया जाता है। उसके बाद नेटवर्क को बेहतर बनाने के लिए जानकारी को क्रमिक रूप से समायोजित किया जाता है। इसमें कई चीजों की पुनरावृत्ति की जरूरत होती है, इसलिए यह प्रशिक्षण लंबा चलता है और अत्यधिक बिजली की खपत करता है।
कैसे होगी कम...?
शोध टीम के प्रमुख प्रोफेसर फेलिक्स डिट्रिच के अनुसार, यह सिस्टम नोड्स के बीच पैरामीटर को पुनरावृत्ति के साथ निर्धारित करने की जगह संभावनाओं का उपयोग करता है। उसकी संभाव्यता विधि प्रशिक्षण डाटा में महत्वपूर्ण स्थानों पर सूचनाओं के लक्षित उपयोग पर आधारित है, जहां सूचनाओं में बड़े और तेज परिवर्तन हो रहे हैं। यह न्यूनतम कंप्यूटिंग शक्ति के साथ जरूरी पैरामीटर को निर्धारित करना संभव बनाती है। यह न्यूलर नेटवर्क के प्रशिक्षण को बहुत तेज बना सकता है और परिणामस्वरूप एआई के प्रयोग को ऊर्जा दक्ष बना सकता है।
भारत में दोगुना तेजी
हाल ही में आई माइक्रोसॉफ्ट की ‘ग्लोबल ऑनलाइन सेफ्टी सर्वे रिपोर्ट’ के अनुसार, 65 प्रतिशत भारतीय एआई का प्रयोग करते हैं। वैश्विक स्तर पर 2023 के मुकाबले 2024 में एआई के प्रयोग में 26 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इससे भी एआई के बढ़ते प्रयोग के बारे में अंदाजा लगाया जा सकता है।
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