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लॉकडाउन की अनकही कहानी: रो-रोकर गुजरी हैं रातें, जेहन में था अनहोनी का डर
Tue, 23 Mar 2021 01:11 AM IST
Vikas Kumar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Vikas Kumar
Updated Tue, 23 Mar 2021 01:11 AM IST
सार
-नहीं हारी हिम्मत, खुशियों के साथ हुआ दर्द का अंत
-अगर किसी को कोई परेशानी होती तो उसके पास डॉक्टर या स्टाफ 45 मिनट बाद पहुंचते थे
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निकिता गुप्ता और उनका बेटा युवी
- फोटो : amar ujala
विस्तार
वह जून का पहला हफ्ता था। पहली बार मां बनने की खुशी भी थी और कोविड-19 का डर भी। किसी तरह महीने के पहले सात दिन गुजर गए। आठ जून को प्रसव पीड़ा होने से आनन-फानन में राम मनोहर लोहिया अस्पताल पहुंची। पति भी साथ थे। एडमिट करने से पहले अस्पताल ने टेस्ट किया। जिस बात डर था, वही हुआ। रिपोर्ट पॉजिटिव आई। इसने हमारे पैरों की जमीन हिला दी। डर इस कदर बैठा कि प्रसव पीड़ा तक गायब हो गई। एक तो कोरोना जैसी बीमारी, ऊपर से पेट में पल रहा बच्चा। एक बारगी लगा कि सब कुछ खत्म हो गया है।
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बड़े खतरे से घिरे हम दोनों काफी देर तक वहीं बैठे रहे। लेकिन संघर्ष हमीं को करना था, तो वक्त गुजरने के साथ हम दोनों ने खुद को समझाया और एक-दूसरे को संभाला भी। इसके बाद अस्पताल के स्टाफ की मदद से कोविड डिलीवरी वार्ड की तरफ बढ़ चली। जाते-जाते पति ने ढांढस बंधाया और जीतकर लौट आने की हिम्मत दी। बावजूद इसके अनहोनी की आशंका में दिल बैठ गया था। दुबारा मुलाकात होने तक पर हम आश्वस्त नहीं थे।
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पति, परिवार के होते हुए भी इस विषम हालात में मेरे पास कोई अपना रहने वाला नहीं था। आगे की लड़ाई मुझे अकेले ही लड़नी थी। पति से बिछड़ने के चंद मिनटों बाद मैं वार्ड में थी। वहां पहले से पांच महिलाएं एडमिट थीं। सब कोरोना पॉजिटिव थीं। इनमें से दो मां बन चुकी थी, जबकि तीन प्रसव पीड़ा में कराह रही थीं। जैसे-तैसे कोने के खाली बेड तक पहुंची और चद्दर बिछाकर लेट गई। थोड़ी देर बाद बगैर पीपीई किट पहने एक महिला अंदर आई। सब उसे दीदी बुला रहे थे। सबका हालचाल पूछते वह हमारे नजदीक पहुंची और जरूरत पड़ने पर बुला लेने की सलाह देते हुए वापस लौट गई।
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दो दिन जैसे-तैसे वार्ड में गुजरा। हर पहल बेहद कठिन था। शब्दों में बयां नहीं कर सकती। ऐसा ही एक वाकया याद आता है। एक दिन एक महिला की प्रसव पीड़ा अपने चरम पर थी। बेड से उठकर बाथरूम में जाते वक्त बच्चा बाहर आने लगा। दर्द के मारे वह चिल्ला रही थी। दूसरा कोई मदद भी नहीं कर सकता था। वार्ड की तस्वीर रोंगटे खड़ी कर देने वाली थी। सबकी आंखें फटी रह गई थी। तभी अचानक दीदी प्रकट हुई और बिगड़ने से पहले जैसे-तैसे उनने हालात को संभाल लिया। धक से मेरा दिल बैठ गया और काफी देर तक आंखे बंद किए रही। अपने बच्चे को महसूस किया, उससे जुड़ने की कोशिश की।
मोबाइल साथ होने से इस बीच परिवारवालों से बात हो जाती थी। सब हिम्मत बंधाते। लेकिन बातचीत से लग जाता कि वह सब भी अथाह पीड़ा से गुजर रहे हैं। 11 की सुबह नार्मल डिलीवरी हुई। होश आने पर पता चला कि सांस लेने में परेशानी होने से नवजात को वेंटिलेटर वार्ड में भर्ती कर दिया गया है। अब बच्चे की फिक्र हम पर हावी हो गई। मुझे बताया गया कि अभी 7 दिन अस्पताल में और रहना था। डर अभी भी अंदर तक समाया हुआ था। कई रातें रोते-रोते निकल गईं। खाने का कुछ मन ही नहीं करता था। कोई मदद के लिए नहीं आ सकता था। डॉक्टर और नर्स ने पहले दिन बता दिया था कि उन्हें पीपीटी किट पहनने में 45 मिनट लगते है। मतलब, अगर किसी को कोई परेशानी होती तो उसके पास डॉक्टर या स्टाफ 45 मिनट बाद पहुंचते थे।
सातवें दिन नवजात की सेहत सुधार होना शुरू हुआ। उसे वेंटिलेटर से नार्मल वार्ड में शिफ्ट किया गया। मुझसे में कोरोना के लक्षण नहीं दिख रहे थे। कमजोरी होने के बाद भी पहले से बहुत बेहतर महसूस कर रही थी। दसवें 10 दिनों के बाद उसे अस्पताल से छुट्टी मिली। इस दिन बच्चा पहली बाद गोद मे लिया। यह तो मानो जिंदगी का सबसे बड़ा तोहफा था। पागलों की तरह मैं हंस भी रही थी और रो रही थी। अंत खुशी लेकर आया। और आज तक खुशियों का अंत नहीं हुआ है।
(कृष्णा नगर की निकिता गुप्ता ने जैसा अमर उजाला संवाददाता संतोष कुमार को बताया। निकिता के पति राहुल एक मोबाइल कंपनी में मैनेजर हैं। आज वह अपने बच्चे युवी के साथ खुश हैं। )