Ukraine Crisis: हर विद्यार्थी नीट पास, कॉलेज न मिलने के कारण जाते हैं विदेश
साल 2019 से विदेश जाने वाले हर छात्र को राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) पास करनी होती है। इसके बगैर विदेशी विश्वविद्यालयों में दाखिला नहीं लिया जा सकता। नीट पास करने के बाद भी छात्रों के विदेश जाने की अपनी वजह है। मसलन, दिल्ली में हर साल 60 हजार छात्र-छात्राएं नीट परीक्षा में शामिल होते हैं।
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यूक्रेन संकट के बीच कमजोर छात्रों के विदेशों में एमबीबीएस करने पर देश में बहस चल रही है। एक केंद्रीय मंत्री ने तो यहां तक कह दिया कि विदेश जाने वाले 90 फीसदी विद्यार्थी नीट परीक्षा में फेल हो जाते हैं, जबकि हकीकत कुछ अलग है।
साल 2019 से विदेश जाने वाले हर छात्र को राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) पास करनी होती है। इसके बगैर विदेशी विश्वविद्यालयों में दाखिला नहीं लिया जा सकता। नीट पास करने के बाद भी छात्रों के विदेश जाने की अपनी वजह है। मसलन, दिल्ली में हर साल 60 हजार छात्र-छात्राएं नीट परीक्षा में शामिल होते हैं। इनमें से 20 हजार से अधिक पास होते हैं, जिनमें केवल पांच फीसदी को ही सरकारी कॉलेज मिल पाता है। इसमें भी इन्हें दिल्ली ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, कर्नाटक जैसे दूसरे राज्यों के मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश लेना पड़ता है। दिल्ली के कॉलेजों की मांग राष्ट्रीय स्तर पर होने के कारण मेरिट हाई रहती है और प्रवेश पाना कठिन रहता है।
राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी) के अधिकारियों का कहना है कि बगैर नीट पास किए एमबीबीएस में किसी को दाखिला नहीं मिलता है। दिल्ली की बात करें तो 10 में से दो मेडिकल कॉलेज एम्स और मौलाना आजाद को पूरे देश में सबसे पसंद किया जाता है। जिन छात्रों को एम्स में प्रवेश नहीं मिलता है उनकी दूसरी पसंद मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज होता है, जो दिल्ली सरकार के अधीन है।
अधिकारियों ने बताया कि साल 2019 से प्रत्येक विद्यार्थी को नीट परीक्षा में पास होने के बाद ही एमबीबीएस में दाखिला मिलने का नियम है। फिर चाहे वह भारत के किसी मेडिकल कॉलेज में अध्ययन करे या फिर किसी विदेश में जाकर शिक्षा ग्रहण करे।
अधिकांश बाहरी राज्यों में लेते हैं प्रवेश
एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि दिल्ली में सरकारी, प्राइवेट और ट्रस्ट मिलाकर 10 मेडिकल कॉलेज हैं। इनमें 1,447 एमबीबीएस की सीट हैं। बीते साल 2021 में 1,447 सीट के लिए दिल्ली में 59,006 छात्रों ने नीट परीक्षा दी थी। एम्स में 132 और मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में 250 सीट पर अधिकांश बाहरी राज्यों के छात्र प्रवेश लेते हैं। क्योंकि, इनकी रैंक काफी बेहतर होती है।
उन्होंने कहा, ‘जो छात्र दिल्ली के कॉलेजों में प्रवेश नहीं ले पाते हैं वे दूसरे राज्य के सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट देखते हैं। यहां प्रवेश न मिलने पर छात्र देश के चर्चित प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की ओर रुख करते हैं, लेकिन वहां भी प्रवेश न मिलने के बाद ये यूक्रेन, रूस, चीन और बांग्लादेश जैसे देश रवाना होते हैं। भारत के प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में एक साल की फीस करीब 30 लाख रुपये के आसपास है, जो पांच साल की 1.50 करोड़ रुपये तक होती है, लेकिन दूसरे देशों में पूरा कोर्स ही करीब 30 लाख रुपये में हो जाता है।
प्राइवेट कॉलेजों पर होगा नियंत्रण, सस्ती होगी पढ़ाई
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि देश के प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों को लेकर काफी समय से प्रक्रिया चल रही है। यूक्रेन का मामला हाल ही में सामने आया है, लेकिन एनएमसी काफी समय से इस पर कार्य कर रहा है। आगामी दिनों में मेडिकल कॉलेजों की 50 फीसदी सीटों पर शुल्क तय किया जाएगा। इसका असर कुछ वर्षों में दिखना भी शुरू हो जाएगा।
कोरोना में मिली थी छूट
राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग के अधिकारियों ने बताया कि साल 2020 में कोरोना महामारी आने के बाद विदेशों में प्रवेश के लिए छात्रों को नीट से कुछ समय के लिए छूट दी गई थी, लेकिन इन छात्रों को साल 2021 में हुई परीक्षा में शामिल होना अनिवार्य था।