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दिल्ली दंगा : पुलिस पर 25 हजार रुपये जुर्माने संबंधी फैसले पर रोक
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नई दिल्ली। सत्र अदालत ने दिल्ली पुलिस के खिलाफ लगाए गए 25 हजार रुपये जुर्माने के आदेश पर रोक लगा दी है। जुर्माने का आदेश चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट अरुण कुमार गर्ग ने दिया था। कड़कड़डूमा अदालत के जिला एवं सत्र न्यायाधीश रमेश कुमार ने थाना भजनपुरा थानाध्यक्ष द्वारा जुर्माना राशि को चुनौती याचिका पर सुनवाई 12 नवंबर तय की है।
चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट (सीएमएम) अरुण कुमार गर्ग ने अपने आदेश में पुलिस आयुक्त को दंगों के मामलों की उचित जांच, अभियोजन और त्वरित परीक्षण के संबंध में उठाए गए सभी कदमों की विस्तृत रिपोर्ट सात दिनों की अवधि के भीतर पेश करने का निर्देश दिया था। उन्होंने कहा था कि दंगों के मामलों में बार-बार दिए गए निर्देश वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के बहरे कानों में पड़े, इसके लिए जुर्माना जरूरी है।
उन्होंने कहा था कि इस अदालत द्वारा न केवल डीसीपी (उत्तर पूर्व), संयुक्त पुलिस आयुक्त (पूर्वी रेंज) और पुलिस आयुक्त, दिल्ली को बार-बार निर्देश जारी किए जा चुके हैं, जो उत्तर पूर्व दंगों से संबंधित मामलों में उनके व्यक्तिगत हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं। हालांकि, ऐसा प्रतीत होता है कि उपरोक्त सभी निर्देश बहरे कानों पर पड़े हैं।
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उक्त आदेश को चुनौती देते हुए थाना भजनपुरा के एसएचओ ने एक पुनरीक्षण याचिका दायर की है। उन्होंने कहा कि अदालत के आदेश का पालन किया गया है और संबंधित जज ने बिना तथ्यों का अध्ययन किए जुर्माना लगाया है। ऐसे में उक्त आदेश का खारिज किया जाए।
सत्र अदालत ने विशेष सरकारी वकील (एसपीपी) की दलीलों और तथ्यों एवं परिस्थितियों के मद्देनजर अगले आदेश तक संबंधित अदालत में मामले की सुनवाई पर रोक लगा दी।
एसपीपी ने अदालत को बताया कि अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा 10 सितंबर 21 को पारित एक आदेश के संदर्भ में मामले में आगे की जांच आवश्यक थी। जिसमें यह कहा गया था कि शिकायतकर्ता अकील अहमद की शिकायत की जांच की गई है। घटना को वर्तमान एफआईआर के साथ नहीं जोड़ा जा सकता था।
कोर्ट को यह भी बताया गया कि 10 सितंबर 2021 के बाद इस मामले में कोई केस डायरी नहीं लिखी गई थी और फैजान खान की शिकायत के लिए पूरक आरोपपत्र तीन दिनों के भीतर दाखिल किया जाएगा।
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चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट (सीएमएम) अरुण कुमार गर्ग ने अपने आदेश में पुलिस आयुक्त को दंगों के मामलों की उचित जांच, अभियोजन और त्वरित परीक्षण के संबंध में उठाए गए सभी कदमों की विस्तृत रिपोर्ट सात दिनों की अवधि के भीतर पेश करने का निर्देश दिया था। उन्होंने कहा था कि दंगों के मामलों में बार-बार दिए गए निर्देश वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के बहरे कानों में पड़े, इसके लिए जुर्माना जरूरी है।
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उन्होंने कहा था कि इस अदालत द्वारा न केवल डीसीपी (उत्तर पूर्व), संयुक्त पुलिस आयुक्त (पूर्वी रेंज) और पुलिस आयुक्त, दिल्ली को बार-बार निर्देश जारी किए जा चुके हैं, जो उत्तर पूर्व दंगों से संबंधित मामलों में उनके व्यक्तिगत हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं। हालांकि, ऐसा प्रतीत होता है कि उपरोक्त सभी निर्देश बहरे कानों पर पड़े हैं।
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उक्त आदेश को चुनौती देते हुए थाना भजनपुरा के एसएचओ ने एक पुनरीक्षण याचिका दायर की है। उन्होंने कहा कि अदालत के आदेश का पालन किया गया है और संबंधित जज ने बिना तथ्यों का अध्ययन किए जुर्माना लगाया है। ऐसे में उक्त आदेश का खारिज किया जाए।
सत्र अदालत ने विशेष सरकारी वकील (एसपीपी) की दलीलों और तथ्यों एवं परिस्थितियों के मद्देनजर अगले आदेश तक संबंधित अदालत में मामले की सुनवाई पर रोक लगा दी।
एसपीपी ने अदालत को बताया कि अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा 10 सितंबर 21 को पारित एक आदेश के संदर्भ में मामले में आगे की जांच आवश्यक थी। जिसमें यह कहा गया था कि शिकायतकर्ता अकील अहमद की शिकायत की जांच की गई है। घटना को वर्तमान एफआईआर के साथ नहीं जोड़ा जा सकता था।
कोर्ट को यह भी बताया गया कि 10 सितंबर 2021 के बाद इस मामले में कोई केस डायरी नहीं लिखी गई थी और फैजान खान की शिकायत के लिए पूरक आरोपपत्र तीन दिनों के भीतर दाखिल किया जाएगा।