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हाईकोर्ट : तय नियमों का पालन किए बिना गिरफ्तारी के बाद किसी निर्दोष की रिहाई या बरी होना कोई सांत्वना नहीं
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नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि तय नियमों का पालन किए बिना गिरफ्तारी के बाद किसी निर्दोष की रिहाई या बरी होना कोई सांत्वना नहीं है। यह प्रतिष्ठा के नुकसान या बहुमूल्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता को हुए अस्थायी नुकसान के लिए कोई क्षतिपूर्ति नहीं है। हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस के एक उप निरीक्षक को एक दिन की साधारण कैद की सजा सुनाते हुए यह टिप्पणी की।
न्यायमूर्ति नजमी वजीरी ने अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित निर्देशों के उल्लंघन में एक व्यक्ति को गिरफ्तार करने के मामले में उप निरीक्षक को अदालत की अवमानना का दोषी ठहराया। अदालत ने उप निरीक्षक के बिना शर्त माफी मांगने के आग्रह को खारिज करते हुए कहा गिरफ्तार व्यक्ति 11 दिनों तक जेल में रहा और जमानत पर बाहर है।
कोर्ट ने कहा उपरोक्त को और यह ध्यान में रखते हुए कि वह दिल्ली पुलिस में सेवारत पुलिस अधिकारी है, उसने सात साल की सेवा की है और उसके आगे एक लंबा कॅरियर हो सकता है। ऐसे में वे उक्त पुलिस अधिकारी को एक दिन के साधारण कारावास की सजा और दो हजार रुपये का जुर्माना की सजा सुनाते हैं। इसके अलावा अदालत ने पुलिस अधिकारी को याची को बतौर हर्जाना 15 हजार रुपये देने का भी निर्देश देते हैं।
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कोई सफाई शर्मिंदगी को कम नहीं करेगी
अदालत ने कहा पड़ोसियों या जिन्होंने गिरफ्तारी देखी है उन्हें दी गई कोई भी सफाई याचिकाकर्ता और उसके रिश्तेदारों द्वारा झेली गई शर्मिंदगी और आक्रोश को कम नहीं करेगी। गिरफ्तारी और कैद एक व्यक्ति को नष्ट कर देती है। बाद में रिहाई या बरी एक निर्दोष को कोई सांत्वना नहीं देता है और प्रतिष्ठा की हानि या बहुमूल्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अस्थायी नुकसान के लिए कोई क्षतिपूर्ति नहीं करता है।
अदालत ने इस तथ्य पर ध्यान दिया कि जहां याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक विश्वासघात के आरोप थे जिसमें अधिकतम तीन साल की सजा दी जा सकती है, वह उस प्रकार गिरफ्तारी की अपेक्षा नहीं करता था, जिस प्रकार से यह की गई थी। अदालत ने कहा याचिकाकर्ता की खुद की पुलिस की शिकायतों का जवाब नहीं दिया गया और पुलिस अधिकारी की मनमानी स्पष्ट है।
अदालत ने कहा ऐसे मामले में उस व्यक्ति के साथ एक कलंक जुड़ जाता है, जिसे पुलिस पकड़ लेती है, हिरासत में रखती है या सलाखों के पीछे डाल देती है। अदालत ने कहा कि यह माना जाता है कि एक पुलिस अधिकारी को एक नागरिक के अधिकारों और कानून में निर्धारित प्रक्रिया के बारे में उचित जानकारी होगी।
अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य का दिया हवाला
कोर्ट ने कहा याचिकाकर्ता के व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को संविधान द्वारा सुनिश्चित किया गया है। इसे केवल कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया द्वारा ही रोका जा सकता है।
उन्होंने कहा सुप्रीम कोर्ट ने अर्नेश कुमार मामले में कहा कि धारा 41 ए सीआरपीसी के तहत नोटिस आवश्यक है। नोटिस नहीं देकर कानून का उल्लंघन किया गया है। यह केवल याचिकाकर्ता नहीं है जिसे गिरफ्तार किए जाने से अपमान का सामना करना पड़ा है। इसने परिवार यानी उसके बच्चों, पत्नी और माता-पिता की प्रतिष्ठा को प्रभावित किया होगा।
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न्यायमूर्ति नजमी वजीरी ने अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित निर्देशों के उल्लंघन में एक व्यक्ति को गिरफ्तार करने के मामले में उप निरीक्षक को अदालत की अवमानना का दोषी ठहराया। अदालत ने उप निरीक्षक के बिना शर्त माफी मांगने के आग्रह को खारिज करते हुए कहा गिरफ्तार व्यक्ति 11 दिनों तक जेल में रहा और जमानत पर बाहर है।
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कोर्ट ने कहा उपरोक्त को और यह ध्यान में रखते हुए कि वह दिल्ली पुलिस में सेवारत पुलिस अधिकारी है, उसने सात साल की सेवा की है और उसके आगे एक लंबा कॅरियर हो सकता है। ऐसे में वे उक्त पुलिस अधिकारी को एक दिन के साधारण कारावास की सजा और दो हजार रुपये का जुर्माना की सजा सुनाते हैं। इसके अलावा अदालत ने पुलिस अधिकारी को याची को बतौर हर्जाना 15 हजार रुपये देने का भी निर्देश देते हैं।
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कोई सफाई शर्मिंदगी को कम नहीं करेगी
अदालत ने कहा पड़ोसियों या जिन्होंने गिरफ्तारी देखी है उन्हें दी गई कोई भी सफाई याचिकाकर्ता और उसके रिश्तेदारों द्वारा झेली गई शर्मिंदगी और आक्रोश को कम नहीं करेगी। गिरफ्तारी और कैद एक व्यक्ति को नष्ट कर देती है। बाद में रिहाई या बरी एक निर्दोष को कोई सांत्वना नहीं देता है और प्रतिष्ठा की हानि या बहुमूल्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अस्थायी नुकसान के लिए कोई क्षतिपूर्ति नहीं करता है।
अदालत ने इस तथ्य पर ध्यान दिया कि जहां याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक विश्वासघात के आरोप थे जिसमें अधिकतम तीन साल की सजा दी जा सकती है, वह उस प्रकार गिरफ्तारी की अपेक्षा नहीं करता था, जिस प्रकार से यह की गई थी। अदालत ने कहा याचिकाकर्ता की खुद की पुलिस की शिकायतों का जवाब नहीं दिया गया और पुलिस अधिकारी की मनमानी स्पष्ट है।
अदालत ने कहा ऐसे मामले में उस व्यक्ति के साथ एक कलंक जुड़ जाता है, जिसे पुलिस पकड़ लेती है, हिरासत में रखती है या सलाखों के पीछे डाल देती है। अदालत ने कहा कि यह माना जाता है कि एक पुलिस अधिकारी को एक नागरिक के अधिकारों और कानून में निर्धारित प्रक्रिया के बारे में उचित जानकारी होगी।
अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य का दिया हवाला
कोर्ट ने कहा याचिकाकर्ता के व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को संविधान द्वारा सुनिश्चित किया गया है। इसे केवल कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया द्वारा ही रोका जा सकता है।
उन्होंने कहा सुप्रीम कोर्ट ने अर्नेश कुमार मामले में कहा कि धारा 41 ए सीआरपीसी के तहत नोटिस आवश्यक है। नोटिस नहीं देकर कानून का उल्लंघन किया गया है। यह केवल याचिकाकर्ता नहीं है जिसे गिरफ्तार किए जाने से अपमान का सामना करना पड़ा है। इसने परिवार यानी उसके बच्चों, पत्नी और माता-पिता की प्रतिष्ठा को प्रभावित किया होगा।