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सीआरपीएफ के कांस्टेबल को बहाल करने का आदेश देने से इनकार
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नई दिल्ली। उच्च न्यायालय ने सेवा से अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त सीआरपीएफ के कांस्टेबल को बहाल करने का आदेश देने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि तथ्यों से पता चलता है कि उसने एक अधिकारी को बदनाम करने के इरादे से 200 अन्य कर्मचारियों को आपत्तिजनक व्हाट्सएप संदेश भेजा था।
न्यायमूर्ति मनमोहन और न्यायमूर्ति नवीन चावला की पीठ ने कांस्टेबल की याचिका खारिज करते हुए कहा कि उसका यह मैसेज गलत इरादे से वरिष्ठ अधिकारियों के साथ साझा किया गया था, जो तथ्यों के विपरीत है। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता सिपाही ने एक मैसेज सभी को भेजा था कि कंपनी कमांडर एक वेश्या के साथ होटल के कमरे में हैं।
पीठ ने कहा याची ने अधिकारी का नाम, छवि और प्रतिष्ठा को कम करने के इरादे से बिना किसी सत्यापन के इसे करीब दो सौ सीआरपीएफ कर्मियों को व्हाट्सएप संदेश भेजा था।
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अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने व्हाट्सएप मैसेज के साथ एक फोटो भी डाली थी। हालांकि ये अपर्याप्त इंटरनेट के कारण अपलोड नहीं हो सका। अदालत ने कहा याची ने सीआरपीएफ के करीब दो सौ कर्मियों के साथ एक ग्रुप चैट पर यह सब करने के बाद ही संबंधित डीआईजी (ऑपरेशंस) के साथ मैसेज को साझा किया था।
अदालत ने कहा यदि मामला ठीक था तो उसे पहले वरिष्ठ अधिकारियों को मैसेज देना चाहिए था लेकिन उसने अधिकारी की प्रतिष्ठा खराब करने के लिए ऐसा नहीं किया।
पेश मामले में याचिकाकर्ता को आपत्तिजनक व्हाट्सएप इमेज और मैसेज शेयर करने के आरोप में पेंशन और ग्रेच्युटी दोनों के लिए 67 फीसद मुआवजे के साथ सेवा से अनिवार्य रूप से रिटायर किया गया था। याचिकाकर्ता ने अदालत से कहा कि उसे नहीं पता कि संबंधित अधिकारी कौन है और इसलिए उसे बदनाम करने का कोई मकसद नहीं था।
उसने कहा कि डीआईजी (ऑपरेशन) सीआरपीएफ ने याचिकाकर्ता से इस मुद्दे की आगे जांच करने और यह पता लगाने को कहा था कि तस्वीर कहां क्लिक की गई और किस तारीख को। याची ने कहा कि ऐसे में अनिवार्य सेवानिवृत्ति की सजा स्पष्ट रूप से वर्तमान मामले के तथ्यों और परिस्थितियों से असंगत है।
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न्यायमूर्ति मनमोहन और न्यायमूर्ति नवीन चावला की पीठ ने कांस्टेबल की याचिका खारिज करते हुए कहा कि उसका यह मैसेज गलत इरादे से वरिष्ठ अधिकारियों के साथ साझा किया गया था, जो तथ्यों के विपरीत है। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता सिपाही ने एक मैसेज सभी को भेजा था कि कंपनी कमांडर एक वेश्या के साथ होटल के कमरे में हैं।
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पीठ ने कहा याची ने अधिकारी का नाम, छवि और प्रतिष्ठा को कम करने के इरादे से बिना किसी सत्यापन के इसे करीब दो सौ सीआरपीएफ कर्मियों को व्हाट्सएप संदेश भेजा था।
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अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने व्हाट्सएप मैसेज के साथ एक फोटो भी डाली थी। हालांकि ये अपर्याप्त इंटरनेट के कारण अपलोड नहीं हो सका। अदालत ने कहा याची ने सीआरपीएफ के करीब दो सौ कर्मियों के साथ एक ग्रुप चैट पर यह सब करने के बाद ही संबंधित डीआईजी (ऑपरेशंस) के साथ मैसेज को साझा किया था।
अदालत ने कहा यदि मामला ठीक था तो उसे पहले वरिष्ठ अधिकारियों को मैसेज देना चाहिए था लेकिन उसने अधिकारी की प्रतिष्ठा खराब करने के लिए ऐसा नहीं किया।
पेश मामले में याचिकाकर्ता को आपत्तिजनक व्हाट्सएप इमेज और मैसेज शेयर करने के आरोप में पेंशन और ग्रेच्युटी दोनों के लिए 67 फीसद मुआवजे के साथ सेवा से अनिवार्य रूप से रिटायर किया गया था। याचिकाकर्ता ने अदालत से कहा कि उसे नहीं पता कि संबंधित अधिकारी कौन है और इसलिए उसे बदनाम करने का कोई मकसद नहीं था।
उसने कहा कि डीआईजी (ऑपरेशन) सीआरपीएफ ने याचिकाकर्ता से इस मुद्दे की आगे जांच करने और यह पता लगाने को कहा था कि तस्वीर कहां क्लिक की गई और किस तारीख को। याची ने कहा कि ऐसे में अनिवार्य सेवानिवृत्ति की सजा स्पष्ट रूप से वर्तमान मामले के तथ्यों और परिस्थितियों से असंगत है।