संघर्ष: अफगानी मूल के लोगों ने किया प्रदर्शन, बोले- कमाई का जरिया खत्म, गुजारा हुआ मुश्किल
अफगानिस्तान के खराब हालात से बचने के लिए भारत आए लोगों की जिंदगी पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। न पढ़ाई और न कमाई का जरिया। अफगानिस्तान में गोलियों से तो खुद को बचा लिया, मगर भारत में आर्थिक तंगी मार रही है।
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विस्तार
अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद दिल्ली में रह रहे अफगानी मूल के लोगों ने अपनी वजूद के लिए संघर्ष शुरू कर दिया है। पिछले कुछ वर्षों से दिल्ली में रह रहे 21 हजार से अधिक लोगों ने 60 फीसदी बचे लोगों को शरणार्थी का दर्जा देने, दीर्घकालीक वीजा या तीसरे देशों में जाने के लिए सपोर्ट लेटर जल्द दिलवाने की मांग की। अफगानिस्तान के मौजूदा हालात को देखते हुए सपोर्ट लेटर का दर्जा देने सहित बच्चों और युवाओं की शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा देने की मांग के समर्थन में प्रदर्शन किया। वसंत विहार स्थित शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त (यूएनएचसीआर) के सामने महिलाएं, पुरुषों के हाथों में पोस्टर तो जुंबा पर वजूद की मांग उठती दिखी। मांगों की सुनवाई होने तक ऐसे ही अपनी मांगों के समर्थन में आगे भी प्रदर्शन जारी रखने की तैयारी है।
अफगान सॉलिडरिटी कमेटी (एएससी) की अपील पर सुबह से ही हाई कमीशन के सामने अफगानी मूल के लोग इकट्ठा होने लगे। कमेटी के प्रमुख अहमद जिया गनी ने कहा कि 21 हजार से अधिक लोग यहां वर्षों से रह रहे हैं। इनमें से 60 फीसदी से अधिक अफगानी मूल के लोगों को शरणार्थी का भी दर्जा नहीं मिला है। इस कारण शिक्षा, स्वास्थ्य और नौकरी सहित तमाम बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं।
अगर लंबित मामलों पर सुनवाई नहीं हुई तो उन्हें न तो भारत में दिल्ली से बाहर कहीं आने जाने की इजाजत है। कम होती जमा पूंजी खत्म होने की कगार पर हैं, इसलिए लोगों को जीने के लिए शरणार्थी का दर्जा मिलने का इंतजार है। उन्होंने सवाल उठाया कि न तो यहां रहने के लिए उनके पास आधार कार्ड या कोई और दस्तावेज है। शरणार्थियों का दर्जा मिलने के बाद भी वीजा की अवधि बीत जाने पर जुर्माना भी सवाल उठाते हुए सरकार से राहत देने की मांग की।
किराया चुकाने के नहीं हैं पैसे, दूसरे देशों में जाना भी मुश्किल
अहमद जिया गनी ने कहा कि अफगानिस्तान के मौजूदा हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि सभी को अपने परिवार की चिंता सता रही है। दिल्ली में रह रहे अधिकतर परिवारों के पास पैसे खत्म हो चुके हैं जबकि काबुल सहित पूरे अफगानिस्तान से कारोबार भी बंद हो गया है। परिजनों से रुपये मांगने का रास्ता भी मुश्किल हो गया है। अब आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि लाजपत नगर, भोगल, तिलक नगर सहित दिल्ली के अलग अलग इलाकों में रहने वालों के लिए मकान किराया भरना भी मुश्किल हो गया है। कुदरतउल्लाह नियाजी ने बताया कि रिफ्यूजी कार्ड न होने की वजह से दूसरे देशों में भी जाना मुश्किल हो गया है। अगर यूएनएचसीआर की तरफ से सपोर्ट लेटर जल्द मिले तो दूसरे देशों में भी बतौर शरणार्थी रहने का मौका मिल सकेगा।
सामाजिक कार्यकर्ताओं, वामपंथी महिला और छात्र संगठनों ने मंडी हाउस पर किया प्रदर्शन
अफगान शरणार्थियों को सहायता, सहयोग और स्वागत करने की अपील के साथ सोमवार को मंडी हाउस पर सामाजिक कार्यकर्ताओं, वामपंथी महिला और छात्र संगठनों का जमावड़ा हुआ। यहां जुटे लोगों ने सरकार से मांग की कि अफगानिस्तान के नागरिकों विशेषकर नारीवादियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, स्वास्थ्य कर्मियों, कल्याण क्षेत्र के कार्यकर्ताओं की स्वतंत्रता और जीवन तालिबान के खतरे में है, ऐसी स्थिति में जान बचाकर भारत आने वाले खासकर महिलाओं, बच्चों और छात्रों का स्वागत किया जाए।
प्रदर्शन में भारत आए अफगानिस्तानी शरणार्थियों ने भी हिस्सा लिया। चार साल से यहां शरणार्थी बनकर रह रहीं फरहद, उनकी बहन नरगिस और उनके अन्य साथी भी मौजूद थे। अपनी बात रखते हुए फरहद की आंख में आंसू भर आए। सहज होने के बाद उन्होंने बताया कि चार साल पहले वह अफगानिस्तान से आईं तब आना आसान था, लेकिन अभी उनके रिश्तेदार चाहकर भी अफगानिस्तान से नहीं आ सकते। उनके पास बीजा-पासपोर्ट नहीं है। उनके माता-पिता भारत आ गए हैं, लेकिन चाचा और बाकी परिवार अफगानिस्तान में फंसा है।
बिना धार्मिक भेदभाव के शरण देने की अपील
प्रदर्शन में अखिल भारतीय महिला संस्कृति संगठन, एआईडीएमएएम, एआईपीडब्ल्यूए, आइसा, अनहद और करीब आधा दर्जन अन्य संगठनों ने प्रदर्शन में हिस्सा लिया। सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी ने कहा 20 साल शासन करने के बाद अमेरिका अफगानिस्तान की सत्ता तालिबान को सौंपकर वापस चल दिया। सरकार से अपील है कि ऐसी परिस्थिति में वह तालिबान का खुलकर विरोध करे। अफगानिस्तानी शरणार्थियों को बेझिझक बिना धार्मिक भेदभाव के यहां शरण दे। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद छात्रों को पढ़ने के लिए छात्रवृत्ति का प्रबंध कराए।
तालिबान के समर्थक फांसीवादी
सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी ने कहा कि कई मीडिया व मुस्लिम समाज के लोग यह कह रहे हैं कि आज का तालिबान पहले वाला तालिबान नहीं है, वह ये जान लें कि तालिबान वही है। तालिबान कौन होता है यह कहने वाला कि वह महिलाओं को पढ़ने की आजादी देगा, लोगों को सुरक्षा देगा। तालिबान का समर्थन करने वाले लोग फांसीवादी हैं।
धर्म के आधार पर शरणार्थियों में भेदभाव गलत
प्रदर्शन में शामिल आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एन. साई बालाजी ने कहा कि शरणार्थियों में धर्म के आधार पर फर्क करना बेहद शर्मनाक है। सरकार ने सीएए का उल्लेख किया है और घोषणा की है कि वह अफगानिस्तान से हिंदू और सिख शरणार्थियों को भारत लाने में प्राथमिकता देगा। यह संविधान के समान नागरिकता के आश्वासन के खिलाफ है। उनके साथ कॉमरेड एनी राजा, कविता कृष्णन, राजा पोएट भी मौजूद थे।
खत्म हुई राहत मिलने की गुंजाइश भी, सवालों के घेरे में शरणार्थियों की जिंदगी
अफगानिस्तान के खराब हालात से बचने के लिए भारत आए लोगों की जिंदगी पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। न पढ़ाई और न कमाई का जरिया। अफगानिस्तान में गोलियों से तो खुद को बचा लिया, मगर भारत में आर्थिक तंगी मार रही है। शरणार्थी का दर्जा मांगने वालों को चिंता है तो देश के बाहर जिंदगी बिताने की। कहां जाएं, क्या खाएं और रहने के लिए कहां होगा आशियाना। अमर उजाला संवाददाता सर्वेश कुमार से बातचीत में अफगानी नागरिकों ने अपने दर्द इस तरह बयां किए....
पुराने कपड़े बेचकर पांच बच्चों को दे रही हैं निवाला
अपने पति को काबुल में खो चुकी महिला पश्तुन के भी पांच बच्चे दिल्ली में उनके साथ हैं। हालात इतने खराब हो गए हैं कि अब उनके पास 10 रुपये भी नहीं बचे हैं। पुराने कपड़े बेचकर गुजारा अपने बच्चों को दो वक्त को निवाला दे रही हैं। उन्होंने भारत सरकार से गुहार लगाई है कि शरणार्थी का दर्जा तो है, लेकिन कुछ सुविधाएं मिलने से जिंदगी बिता सकेंगी।
कमाई का जरिया भी खत्म, गुजारा हुआ मुश्किल
कदरउल्लाह नियाजी ने बताया कि उनके छह बच्चे हैं, लेकिन न तो पढ़ाई और न ही स्वास्थ्य सुविधा मिल रही है। कुछ महीने पहले तक अफगानिस्तान से आने वालों को किराये पर गेस्ट हाउस की सुविधा देकर अपने परिवार का गुजारा कर रहे थे। लेकिन अब तो वहां से आने वाले काफी कम हैं। अगर कुछ लोग हैं भी तो दहशतजदा और खाली हाथ। वहां से न तो पैसे मंगवा सकते हैं और न ही कोई भेजने वाला अफगानिस्तान में बचा है। कुछ लोग हैं भी जिंदगी से उनकी जद्दोजहद जारी है।
पढ़ाई के लिए दूसरे देश की शरणार्थी बनने को लड़कियां हैं राजी
10 वर्षीय अफगान शरणार्थी जरीफा ने बताया कि 2016 से यहां हूं, अब कनाडा में बसना चाहते हैं। अफगानिस्तान लौट नहीं सकती, क्योंकि मौत का डर है। शरणार्थी मसला ने कहा कि वहअमेरिका में बसना चाहते हैं, लेकिन तालिबान के सामने इसकी इजाजत नहीं है। देशों ने अपने नागरिकों को अफगानिस्तान से निकालने की मुहिम तेज कर दी है, लेकिन हमारी सुनवाई क्यों नहीं हो रही है। पिछले कई दशकों में ऐसी स्थिति रही, लेकिन मौजूदा हालात ने लोगों को इस कदर मजबूर कर दिया हैकि दूसरे देशों में भागना अफगानिस्तान वासियों की मजबूरी बन चुकी है।
सुविधाओं की कमी के बीच किया कोरोना का किया मुकाबला
पिछले करीब डेढ़ साल से पूरी दुनिया, वैश्विक बीमारी कोरोना से जंग लड़ रहा है। अफगानी मूल के करीब 3000 से अधिक बच्चे ऐसे हैं जिन्हें सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल रही है। शरणार्थी का दर्जा न होने की वजह से दो साल से 11 साल के लड़के और लड़कियों के लिए मुश्किलें और बढ़ा दी है। 11 वर्षीय अर्मागान, दियाना और दिया ने कहा कि पिछले कुछ महीनों से पास के स्कूल में जाती हैं। उन्हें भी चिंता इस बात की है कि शरणार्थी का दर्जा न मिलने से आगे कितनी परेशानी होगी। छठी में पढ़ाई करने वाली बच्ची दीया ने बताया कि उनकी मां सिलाई कर, दोनों बहनों को पढ़ा रही हैं। अर्मागान की मां भी किसी तरह मेहनत कर बेटी को नजदीकी स्कूल में पढ़ा रही हैं।
....लोगों को इंसाफ के लिए लड़ेंगी आरजू
आरजू ने बताया कि पढ़ाई के बाद अब उनकी ख्वाहिश जज बनने की है। उच्च शिक्षा हासिल कर, देश के बाहर रहकर लोगों को उनका हक दिलवाने के लिए लड़ना चाहती हैं। मुस्तफा और मंसूर ने कहा कि कुछ महीने पहले तक उनके पिता अफगानिस्तान में खाना बेचकर गुजारा कर रहे थे। अब तो यहां उनकी परेशानी इस कदर बढ़ गई है कि कई बार खुद भी खाने के लिए इंतजार करना पड़ता है।