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कागज उद्योग से जुड़े लोगों ने उठाई आयात शुल्क बढ़ाने की मांग, बोले- आत्मनिर्भर बनने की राह में यह बड़ी बाधा
Thu, 24 Dec 2020 09:53 AM IST
प्राची प्रियम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: प्राची प्रियम
Updated Thu, 24 Dec 2020 09:53 AM IST
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वित्त मंत्रालय के साथ बजट पूर्व चर्चा में भारत के पेपर उद्योग ने बेरोक-टोक आयात पर अंकुश लगाने की अपील की है। यह आयात कागज के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने की राह में बड़ी बाधा है। कागज उद्योग में रोजगार के नए अवसर और किसानों के लिए पर्याप्त संभावनाएं सृजित करने की क्षमता है। देश में इसका सालाना कारोबार 70,000 करोड़ रुपये से अधिक है।
इंडियन पेपर मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन (आईपीएमए) के अनुसार, 'मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) और अन्य द्विपक्षीय व बहुपक्षीय व्यापार समझौतों के चलते शून्य आयात शुल्क के कारण भारत में पेपर एवं पेपरबोर्ड का आयात तेजी से बढ़ा है।’
महंगे ईंधन एवं अन्य इनपुट की ज्यादा कीमत के साथ-साथ महंगे कच्चे माल के कारण कागज और पेपरबोर्ड के घरेलू निर्माण की लागत बहुत बढ़ गई है।
आईपीएमए के प्रेसिडेंट एएस मेहता ने कहा कि घरेलू उद्योग बेहद चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में काम कर रहा है और दूसरी ओर एफटीए के चलते शून्य आयात शुल्क की वजह से आयातित कागज काफी कम कीमत में देश में आ रहा है।
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भारत-आसियान एफटीए और भारत-कोरिया सीईपीए के तहत भारत में कागज का आयात वर्तमान में आयात शुल्क की शून्य दरों पर होता है। एशिया पैसिफिक ट्रेड एग्रीमेंट (एपीटीए) के तहत, भारत ने चीन (और अन्य देशों) को आयात शुल्क में मिलने वाली रियायतें बढ़ाई हैं और 30 फीसदी मार्जिन प्रेफरेंस दिया है, जिससे कागज के अधिकांश ग्रेड पर मूल सीमा शुल्क 10 फीसदी से घटाकर 7 फीसदी हो गया है।
मेहता ने आगे कहा कि सस्ते कच्चे माल और अन्य इनपुट की सुनिश्चित आपूर्ति वाले उत्पादक देशों से रियायती/शून्य दरों पर आयात से घरेलू स्तर पर क्षमता विस्तार की दिशा में निवेश हतोत्साहित हो रहा है। कागज और पेपरबोर्ड की घरेलू मांग में अपेक्षित वृद्धि को पूरा करने के लिए यह क्षमता विस्तार आवश्यक है। निवेश में गिरावट का किसानों समेत पूरी वैल्यू चेन से जुड़े सभी पक्षों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
भारत दुनिया में कागज के सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक है। वर्तमान समय में कागज की खपत लगभग 2 करोड़ टन प्रति वर्ष (टीपीए) है और 2024-25 तक यह घरेलू खपत बढ़कर 2.35 करोड़ टीपीए तक पहुंचने का अनुमान है।
आईपीएमए के अनुसार कागज की मांग में इस वृद्धि को आयातित कागज से पूरा किये जाने की आशंका है। ड्यूटी-फ्री आयात भारत में व्यावसायिक रूप से छोटे और मध्यम पेपर मिलों को अस्थिर कर रहा है। इससे कृषि वानिकी में लगे हजारों किसानों की आजीविका को भी खतरा है जो पेपर मिलों को लकड़ी की आपूर्ति करते हैं। इसलिए आईपीएमए ने कागज और पेपरबोर्ड के आयात पर मूल सीमा शुल्क को 25 फीसदी तक बढ़ाने के लिए कहा है।
विश्व व्यापार संगठन की ओर से तय अधिकतम सीमा 40 फीसदी है। आईपीएमए ने एफटीए की तत्काल समीक्षा करने और कागज व पेपरबोर्ड को नकारात्मक सूची में रखने का आह्वान भी किया है। आयात शुल्क भुगतान से बचने के लिए अंडर-इनवॉइसिंग, मिस-डिक्लेरेशन और डंपिंग जैसे कदमों को रोकने के लिए कागज पर आयात नीति को 'मुक्त' से 'प्रतिबंधित' में बदल दिया जाना चाहिए। आईपीएमए के अनुसार देश में कागज की डंपिंग की जांच के लिए एक पेपर इम्पोर्ट मॉनिटरिंग सिस्टम होना चाहिए।
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इंडियन पेपर मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन (आईपीएमए) के अनुसार, 'मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) और अन्य द्विपक्षीय व बहुपक्षीय व्यापार समझौतों के चलते शून्य आयात शुल्क के कारण भारत में पेपर एवं पेपरबोर्ड का आयात तेजी से बढ़ा है।’
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महंगे ईंधन एवं अन्य इनपुट की ज्यादा कीमत के साथ-साथ महंगे कच्चे माल के कारण कागज और पेपरबोर्ड के घरेलू निर्माण की लागत बहुत बढ़ गई है।
आईपीएमए के प्रेसिडेंट एएस मेहता ने कहा कि घरेलू उद्योग बेहद चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में काम कर रहा है और दूसरी ओर एफटीए के चलते शून्य आयात शुल्क की वजह से आयातित कागज काफी कम कीमत में देश में आ रहा है।
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भारत-आसियान एफटीए और भारत-कोरिया सीईपीए के तहत भारत में कागज का आयात वर्तमान में आयात शुल्क की शून्य दरों पर होता है। एशिया पैसिफिक ट्रेड एग्रीमेंट (एपीटीए) के तहत, भारत ने चीन (और अन्य देशों) को आयात शुल्क में मिलने वाली रियायतें बढ़ाई हैं और 30 फीसदी मार्जिन प्रेफरेंस दिया है, जिससे कागज के अधिकांश ग्रेड पर मूल सीमा शुल्क 10 फीसदी से घटाकर 7 फीसदी हो गया है।
मेहता ने आगे कहा कि सस्ते कच्चे माल और अन्य इनपुट की सुनिश्चित आपूर्ति वाले उत्पादक देशों से रियायती/शून्य दरों पर आयात से घरेलू स्तर पर क्षमता विस्तार की दिशा में निवेश हतोत्साहित हो रहा है। कागज और पेपरबोर्ड की घरेलू मांग में अपेक्षित वृद्धि को पूरा करने के लिए यह क्षमता विस्तार आवश्यक है। निवेश में गिरावट का किसानों समेत पूरी वैल्यू चेन से जुड़े सभी पक्षों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
भारत दुनिया में कागज के सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक है। वर्तमान समय में कागज की खपत लगभग 2 करोड़ टन प्रति वर्ष (टीपीए) है और 2024-25 तक यह घरेलू खपत बढ़कर 2.35 करोड़ टीपीए तक पहुंचने का अनुमान है।
आईपीएमए के अनुसार कागज की मांग में इस वृद्धि को आयातित कागज से पूरा किये जाने की आशंका है। ड्यूटी-फ्री आयात भारत में व्यावसायिक रूप से छोटे और मध्यम पेपर मिलों को अस्थिर कर रहा है। इससे कृषि वानिकी में लगे हजारों किसानों की आजीविका को भी खतरा है जो पेपर मिलों को लकड़ी की आपूर्ति करते हैं। इसलिए आईपीएमए ने कागज और पेपरबोर्ड के आयात पर मूल सीमा शुल्क को 25 फीसदी तक बढ़ाने के लिए कहा है।
विश्व व्यापार संगठन की ओर से तय अधिकतम सीमा 40 फीसदी है। आईपीएमए ने एफटीए की तत्काल समीक्षा करने और कागज व पेपरबोर्ड को नकारात्मक सूची में रखने का आह्वान भी किया है। आयात शुल्क भुगतान से बचने के लिए अंडर-इनवॉइसिंग, मिस-डिक्लेरेशन और डंपिंग जैसे कदमों को रोकने के लिए कागज पर आयात नीति को 'मुक्त' से 'प्रतिबंधित' में बदल दिया जाना चाहिए। आईपीएमए के अनुसार देश में कागज की डंपिंग की जांच के लिए एक पेपर इम्पोर्ट मॉनिटरिंग सिस्टम होना चाहिए।