फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Delhi ›   Mobile Addiction : mobile addiction is affecting children badly

Mobile Addiction : चुप कराने के लिए थमाया मोबाइल, अब बच्चा गुमसुम, किशोर और युवाओं पर होता है अलग असर

Fri, 18 Nov 2022 07:18 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Fri, 18 Nov 2022 07:18 AM IST
सार

Mobile Addiction : बच्चों में बढ़ती फोन की लत अभिभावकों और मनोचिकित्सकों से लेकर समाजसेवियों के बीच चिंता का विषय है। इसी विषय पर हम आज से एक सीरीज शुरू कर रहे हैं। इसकी पहली कड़ी ...

विज्ञापन
Mobile Addiction : mobile addiction is affecting children badly
child using mobile - फोटो : pixabay

विस्तार

लेखक निर इयाल की चर्चित पुस्तकों में से एक हुक्ड: हाउ टू बिल्ड हैबिट-फोर्मिंग प्रोडक्ट्स के अनुसार एक व्यक्ति औसतन रोज 5: 27 घंटे मोबाइल पर समय बिताता है, जबकि युवा 5: 42 घंटे। हिसाब लगाएं तो 10 वर्ष में एक व्यक्ति औसतन 19710 घंटे सिर्फ फोन को देता है, यानी करीब ढाई साल। इयाल ने अपनी किताब में भले ही बच्चों का जिक्र नहीं किया हो, लेकिन उनकी स्थिति इनसे अलग नहीं है।

विज्ञापन


केस 1 
निर्भय की उम्र तीन साल है। परिवार दिल्ली के पश्चिम विहार में रहता है। कोविड के वक्त माता-पिता संक्रमित हुए तो उसे ननिहाल हल्द्वानी भेज दिया गया। वहां मां की याद आने पर वह चीखने लगता। नानी ने एक-दो दिन तो किसी तरह संभाला, लेकिन बाद में चुप कराने के लिए उसे यू-ट्यूब पर कार्टून लगाकर मोबाइल पकड़ा दिया जाता। इसका असर यह हुआ कि वह शांत रहने लगा। तुरंत की इस चुप्पी का असर डेढ साल बाद परिवार वालों को अब जाकर समझ में आया। अब वह मोबाइल लेकर ही चुप होता है। मम्मी-पापा अब धीरे-धीरे उसे मोबाइल से दूर कर रहे हैं। आदत तो नहीं छूटी पर वह हमेशा गुमसुम रहता है।
विज्ञापन


केस 2
बात 2021 की है। अराध्या की उम्र करीब चार साल रही होगी। कोरोना काल में स्कूल बंद थे। सुबह  ऑनलाइन कक्षाएं चलती थीं। क्लास का समय भी वही था, जब उसको नाश्ता करना होता। मां दोनों में बाधा नहीं डालना चाहती थी। इसकी काट उसने यह निकाली कि क्लास में कविता शुरू होते ही वह बच्ची को खाना खिलाने लगीं। महीनों तक ऐसा ही होता रहा। अब हालत यह है कि फोन पर बिना संगीत सुने अराध्या एक निवाला भी नहीं लेती। इसकी तस्दीक अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), दिल्ली के बाल रोग चिकित्सा विभाग के बाल तंत्रिका प्रभाग की प्रमुख प्रोफेसर डॉ. शेफाली गुलाटी ने की है।
विज्ञापन
विज्ञापन


केस 3
दसवीं में पहला स्थान पाने के बाद एक पिता ने बेटे को उपहार में लैपटॉप दिया। बेटा लैपटॉप के साथ घंटों कमरे में बंद रहने लगा। पिता ने सोचा कि पढ़ाई कर रहा होगा। 8-9 माह बाद जब पिता को शक हुआ, तो उन्होंने पाया कि बेटा दिन-रात ऑनलाइन गेम खेल रहा है। परेशान पिता ने वाईफाई कटवा दिया। इससे बच्चे में गुस्सा इस कदर चढ़ा कि उसने पिता पर हमला कर दिया। इसमें उनके कान का परदा फट गया। एम्स के बिहेवियरल एडिक्शन सेंटर के प्रभारी डॉ. यतन पाल सिंह बल्हारा ने इसकी तस्दीक की।

खुशी और जरूरत बाद में बन जाती है लत 
मोबाइल की लत के शिकार तीन मामले बानगी भर हैं। मौजूदा दौर में दिल्ली-एनसीआर में बच्चे, किशोर और युवा बुरी तरह मोबाइल की लत से घिरे हैं। बच्चों की खुशी और युवाओं की जरूरत से शुरू होने वाली कहानी मोबाइल के नशे में तब्दील हो जाती है। बिस्तर छोड़ने से लेकर बिस्तर पर जाने तक हाथ में मोबाइल रहता है। रात में नींद खुलने पर भी मोबाइल पर नजरें टिकीं रहती हैं। इसमें किसी तरह की बाधा उनको बर्दाश्त नहीं होती। उम्र के हिसाब से अपनी प्रतिक्रिया जाहिर भी करते हैं। छोटे बच्चे चीख-चिल्लाकर अपना गुस्सा जाहिर करते हैं तो युवा हिंसक व्यवहार कर। एम्स में हर शनिवार को चलने वाली बिहेवियरल एडिक्शन क्लीनिक में आने वाले सभी मामले मोबाइल की लत से ही जुड़े होते हैंं।

रोकने-टोकने पर हिंसक हो जाते हैं बच्चे
डॉ. यतन पाल सिंह बल्हार बताते हैं कि पहले बच्चों को खुश करने के लिए मोबाइल दिया जाता है। लेकिन मोबाइल में अभिभावक इसकी निगरानी नहीं रख पाते कि बच्चा क्या और कितना समय मोबाइल पर बिता रहे हैं। जबकि डेस्कटॉप व टीवी पर यह संभव था। लैपटाॅप पर भी थोड़ा बहुत निगरानी संभव है। अब इससे हो यह रहा है कि बच्चे बिना रोकटोक लंबे वक्त तक मोबाइल पर समय बिताते हैं। इस दौरान वह अपनी पसंदीदा चीजें देखते हैं। बाल मन को बुरी चीजें ज्यादा आकर्षित करती हैं। धीरे-धीरे यह लत में तब्दील हो जाती है। रोकने पर कई बार वह हिंसक भी हो जाते हैं। एम्स में हर शनिवार को चलने वाली बिहेवियरल एडिक्शन क्लीनिक में आने वाले औसतन नौ मामले मोबाइल की लत से ही जुड़े होते हैं।

लत के लक्षण

  • सुबह बिस्तर छोड़ने और रात में सोने से पहले मोबाइल चेक करना
  • बाथरूम में भी मोबाइल साथ लिए जाना
  • परिवार या दोस्तों के बीच हो रही बातचीत के दौरान मोबाइल पर नजर टिकाए रखना
  • उस वक्त भी मोबाइल देखना, जब मोबाइल में कोई हरकत न हो रही हो
  • मोबाइल गुम होते ही बेचैन हो जाना
  • सभी नोटिफिकेशन बार-बार देखना
  • दिन भर में बार-बार बैटरी चार्ज करते रहना
  • इसलिए जकड़ती जाती लत
  • मोबाइल हाथ में आने के बाद नहीं रहता कोई बंधन
  • पूरी दुनिया होती है हाथ में
  • परिवार में नहीं करता कोई रोकटोक
  • आसानी से मिल जाते हैं गेम
  • बिना दोस्त के भी कट जाता है समय

इस तरह की पड़ती है लत

  • छोटे बच्चे... मोबाइल गेम व कार्टून
  • किशोर...सोशल मीडिया, गेम, वेब सीरीज, पोर्न
  • युवा...ऑनलाइन जुआ खेलने, वेब सीरीज, पोर्न व सोशल मीडिया

12 वीं कक्षा के एक बच्चे ने मोबाइल की लत में स्कूल जाना तक बंद कर दिया है। यू-ट्यूब, इंस्टाग्राम और ऐसी साइट्स के चक्कर में दिनरात लगा रहता है। माता-पिता ने मोबाइल उससे लेने की कोशिश की तो उग्र हो गया। अब उसे मनोरोग की दवाएं दी जा रही हैं। अभी उसका इलाज चल रहा है। इस वक्त इस तरह के कई उदाहरण सामने आ रहे हैं। 


-डा. ब्रह्मदीप सिंधू, वरिष्ठ मनोचिकित्सक, गुरुग्राम

मोबाइल की लत का असर,  बच्चों पर किया गया पहला अध्ययन

  • मोबाइल फोन के ज्यादा इस्तेमाल से व्यवहार में बदलाव
  • लड़कियों की तुलना में लड़कों में ज्यादा दिक्कत। 32.3 फीसदी लड़कियां और 36 फीसदी बच्चे मोबाइल का बहुत ज्यादा प्रयोग करते मिले
  • सुबह देरी से उठना उनकी दिनचर्या में है
  • मोबाइल लत के शिकार बच्चों में अपना अधिकतम समय सर्फिंग में बिताया

(नोट: नेशनल सेंटर फॉर बॉयोटेक्नॉलिजी का अध्ययन दिल्ली के शहरी क्षेत्र के निम्न आय वर्ग के 10-19 साल के बच्चों में बीच किया गया। )

मेडिकल छात्रों पर किया गया दूसरा अध्ययन

  • 87 % छात्र करते हैं नियमित मोबाइल इंटरनेट का प्रयोग
  • 74 % इंटरनेट पर सर्फिंग 
  • 66.1 % ग्रुप मैसेजिंग
  • ब्राउजिंग सोशल मीडिया नेटवर्क 64.8 फीसदी

(नोट: इंडियन जर्नल ऑफ साइकोलॉजिकल मेडिसिन में प्रकाशित अध्ययन से लिए गए आंकड़े, अध्ययन मेडिकल छात्रों पर हुआ था, अध्ययन में मौलाना आजाद अस्पताल के डॉक्टर भी शामिल थे।) नोट: स्टोरी में दिए गए आंकड़े व रुझान एम्स व सफदरजंग अस्पताल, इहबास और मेडिकल जनरल से लिए गए हैं)

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed