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Delhi News: कैंपस में डंका, सियासत में सन्नाटा, जनप्रतिनिधि बनने से रह गए वंचित
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कैंपस में डंका, सियासत में सन्नाटा, जनप्रतिनिधि बनने से रह गए वंचित
1980 के बाद डूसू की कुर्सी संभालने वाले अधिकतर अध्यक्ष चुनावी राजनीति में सफल नहीं हुए
विनोद डबास
नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) की अध्यक्षी को लंबे समय से दिल्ली की मुख्यधारा की राजनीति में प्रवेश की मजबूत सीढ़ी माना जाता रहा है। इस कुर्सी से निकलकर कई नेता पार्षद, विधायक, सांसद, मंत्री और मुख्यमंत्री तक पहुंचे। हालांकि डूसू की राजनीति का दूसरा पहलू भी कम दिलचस्प नहीं है। वर्ष 1980 के बाद अध्यक्ष रहे कई ऐसे चेहरे हैं, जिन्होंने चुनावी राजनीति में कदम तो रखा, लेकिन नगर निगम व विधानसभा के चुनाव में जीत दर्ज नहीं कर सके। कुछ संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों तक पहुंचे, जबकि कुछ समय के साथ सक्रिय राजनीति से दूर हो गए।
1980 के दशक में सुधांशु मित्तल, बलराम यादव जैसे नाम डूसू की राजनीति में उभरे। लेकिन उनकी पहचान संगठनात्मक और सार्वजनिक जीवन तक ज्यादा मजबूत रही। इसके बाद 1990 के दशक में भी डूसू की राजनीति से निकले कई चेहरों ने राजनीतिक दलों में सक्रिय भूमिका निभाई, लेकिन सभी को चुनावी सफलता नहीं मिली। वर्ष 2000 के बाद यह अंतर और स्पष्ट दिखाई देता है। अमित मलिक (2000-01) डूसू अध्यक्ष रहने के बाद दिल्ली युवा कांग्रेस के अध्यक्ष बने। संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका के बावजूद पार्षद और विधानसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। रोहित चौधरी (2003-04) एनएसयूआई और कांग्रेस संगठन में महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचे, लेकिन पार्षद और विधायक बनने का सपना पूरा नहीं हो सका। रागिनी नायक (2005-06) ने कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता के तौर पर मजबूत पहचान बनाई और टीवी बहसों में पार्टी का प्रमुख चेहरा बनीं, लेकिन विधानसभा चुनाव में उन्हें सफलता नहीं मिली। रॉकी तुसीद (2017-18) को कांग्रेस ने 2020 में राजेंद्र नगर विधानसभा चुनाव में मैदान में उतारा, लेकिन वह भी जीत दर्ज नहीं कर सके।
कई अध्यक्षों को चुनाव का मौका ही नहीं
डूसू की कुर्सी संभालने के बाद हर अध्यक्ष चुनावी मैदान तक नहीं पहुंच सका। नरेंद्र टोकस (2004-05) और अमृता बाहरी (2007-08) जैसे अध्यक्षों की राजनीतिक यात्रा चुनावी राजनीति में उस मुकाम तक नहीं पहुंची, जहां डूसू से निकले कई अन्य चेहरे पहुंचे। हालांकि 2010 के बाद यह तस्वीर और बदलती दिखती है। अमन अवाना (2013-14) ने एबीवीपी और भाजपा के युवा संगठन में काम किया, लेकिन 2019 में सक्रिय राजनीति छोड़कर निजी कारोबार का रास्ता अपना लिया। मोहित नगर (2014-15), सतेंद्र अवाना (2015-16) और अमित तंवर (2016-17) ने भी छात्र राजनीति के बाद भाजपा और संगठन में जिम्मेदारियां संभालीं, लेकिन अब तक निर्वाचित जनप्रतिनिधि बनने का अवसर नहीं मिला।
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इस सूची में नरेंद्र टंडन, अंजू सचदेवा, अवधेश शर्मा, मोनिका कक्कड़, ऋतु वर्मा, नकुल भारद्वाज, मनोज चौधरी, जितेंद्र चौधरी, अजय छिकारा, शक्ति सिंह और अक्षय दहिया समेत कई नाम शामिल हैं। इनमें मोनिका कक्कड़ और नकुल भारद्वाज को चुनाव लड़ने का अवसर मिला, लेकिन वे जीत दर्ज नहीं कर सके।
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1980 के बाद डूसू की कुर्सी संभालने वाले अधिकतर अध्यक्ष चुनावी राजनीति में सफल नहीं हुए
विनोद डबास
नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) की अध्यक्षी को लंबे समय से दिल्ली की मुख्यधारा की राजनीति में प्रवेश की मजबूत सीढ़ी माना जाता रहा है। इस कुर्सी से निकलकर कई नेता पार्षद, विधायक, सांसद, मंत्री और मुख्यमंत्री तक पहुंचे। हालांकि डूसू की राजनीति का दूसरा पहलू भी कम दिलचस्प नहीं है। वर्ष 1980 के बाद अध्यक्ष रहे कई ऐसे चेहरे हैं, जिन्होंने चुनावी राजनीति में कदम तो रखा, लेकिन नगर निगम व विधानसभा के चुनाव में जीत दर्ज नहीं कर सके। कुछ संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों तक पहुंचे, जबकि कुछ समय के साथ सक्रिय राजनीति से दूर हो गए।
1980 के दशक में सुधांशु मित्तल, बलराम यादव जैसे नाम डूसू की राजनीति में उभरे। लेकिन उनकी पहचान संगठनात्मक और सार्वजनिक जीवन तक ज्यादा मजबूत रही। इसके बाद 1990 के दशक में भी डूसू की राजनीति से निकले कई चेहरों ने राजनीतिक दलों में सक्रिय भूमिका निभाई, लेकिन सभी को चुनावी सफलता नहीं मिली। वर्ष 2000 के बाद यह अंतर और स्पष्ट दिखाई देता है। अमित मलिक (2000-01) डूसू अध्यक्ष रहने के बाद दिल्ली युवा कांग्रेस के अध्यक्ष बने। संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका के बावजूद पार्षद और विधानसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। रोहित चौधरी (2003-04) एनएसयूआई और कांग्रेस संगठन में महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचे, लेकिन पार्षद और विधायक बनने का सपना पूरा नहीं हो सका। रागिनी नायक (2005-06) ने कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता के तौर पर मजबूत पहचान बनाई और टीवी बहसों में पार्टी का प्रमुख चेहरा बनीं, लेकिन विधानसभा चुनाव में उन्हें सफलता नहीं मिली। रॉकी तुसीद (2017-18) को कांग्रेस ने 2020 में राजेंद्र नगर विधानसभा चुनाव में मैदान में उतारा, लेकिन वह भी जीत दर्ज नहीं कर सके।
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कई अध्यक्षों को चुनाव का मौका ही नहीं
डूसू की कुर्सी संभालने के बाद हर अध्यक्ष चुनावी मैदान तक नहीं पहुंच सका। नरेंद्र टोकस (2004-05) और अमृता बाहरी (2007-08) जैसे अध्यक्षों की राजनीतिक यात्रा चुनावी राजनीति में उस मुकाम तक नहीं पहुंची, जहां डूसू से निकले कई अन्य चेहरे पहुंचे। हालांकि 2010 के बाद यह तस्वीर और बदलती दिखती है। अमन अवाना (2013-14) ने एबीवीपी और भाजपा के युवा संगठन में काम किया, लेकिन 2019 में सक्रिय राजनीति छोड़कर निजी कारोबार का रास्ता अपना लिया। मोहित नगर (2014-15), सतेंद्र अवाना (2015-16) और अमित तंवर (2016-17) ने भी छात्र राजनीति के बाद भाजपा और संगठन में जिम्मेदारियां संभालीं, लेकिन अब तक निर्वाचित जनप्रतिनिधि बनने का अवसर नहीं मिला।
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इस सूची में नरेंद्र टंडन, अंजू सचदेवा, अवधेश शर्मा, मोनिका कक्कड़, ऋतु वर्मा, नकुल भारद्वाज, मनोज चौधरी, जितेंद्र चौधरी, अजय छिकारा, शक्ति सिंह और अक्षय दहिया समेत कई नाम शामिल हैं। इनमें मोनिका कक्कड़ और नकुल भारद्वाज को चुनाव लड़ने का अवसर मिला, लेकिन वे जीत दर्ज नहीं कर सके।