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क्लोराइड की अधिकता से राजधानी समेत उत्तर भारत में दृश्यता की कमी

Sat, 30 Jan 2021 01:59 AM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Sat, 30 Jan 2021 01:59 AM IST
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Lack of visibility in North India including capital due to excess of chloride
नई दिल्ली। राजधानी समेत उत्तर भारत में दृश्यता की कमी का मुख्य कारण क्लोराइड कणों की अधिकता है। दिल्ली और गंगा नदी किनारे तक धुंध से दृश्यता की कमी का कारण पार्टिकुलेट मैटर में सबसे अधिक अकार्बनिक अंश क्लोराइड का होना है। आईआईटी, मद्रास ने अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में खुलासा किया है कि एसिड प्लास्टिक युक्त कचरा जलाना और औद्योगिकी प्रक्रिया भी प्रमुख कारक हैं। इसमें मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर केमिस्ट्री जर्मनी, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी( यूएसए) और मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी( यूके) ने सहयोग किया है। शोध प्रतिष्ठित पीयर-रिव्यू इंटरनेशनल जर्नल नेचर जियो साइंस में भी प्रकाशित हुआ है।
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आईआईटी, मद्रास के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर व प्रमुख शोधकर्ता डॉ. सचिन एस गुंथे ने बताया कि पीएम2.5 की रासायनिक संरचना और अन्य महत्वपूर्ण गुणों के साथ दिल्ली की सापेक्ष आर्द्रता और तापमान मापने के लिए अत्याधुनिक उपकरण लगाए। यहां एक महीने तक 24 घंटे का रासायनिक मॉडल पर अवलोकन किया गया। इसमें सामने आया कि पीएम 2.5 में क्लोराइड अधिक है।
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बीजिंग से पीएम 2.5 लेवल कम पर दृश्यता में कमी
केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. आर रवि कृष्ण ने कहा, चीन के बीजिंग समेत दुनिया के अन्य प्रदूषित महानगरों की तुलना में दिल्ली में पीएम2.5 लेवल बहुत कम होने के बाद भी दृश्यता की कमी है। दिल्ली जैसे प्रदूषित शहरी क्षेत्र में ;यह उम्मीद थी कि पार्टिकुलट मैटर का सबसे बड़ा अकार्बनिक अंश सल्फेट होगा। जबकि हमने क्लोराइड को पार्टिकुलेट मैटर का उच्चतम अकार्बनिक अंश पाया। एचसीएल विभिन्न स्रोतों से निकल कर अमोनिया से जुड़ता है, जिससे इस क्षेत्र में बड़ी मात्रा में उत्सर्जन होता है। अत्यधिक क्लोराइड नही हो तो कोहरा बनना कम हो जाएगा। दिल्ली के आसपास एयरोसोल कणों द्वारा आधा जल ग्रहण करने और दृश्यता में कमी की वजह एचसीएल का स्थानीय उत्सर्जन है। इसका मुख्य कारण प्लास्टिक युक्त कचरे का जलना और अन्य औद्योगिक प्रक्रिया है।
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प्रजनन, इम्यून सिस्टम को नुकसान
डॉ. सचिन का कहना है कि फिलहाल अभी ओर शोध की जरूरत है। प्लास्टिक युक्त कचरा जलने से अत्यधिक विषैले रसायन डाइऑक्सिन का उत्सर्जन हो सकता है। यह खाने के माध्यम से शरीर में जाकर रोग प्रतिरोधक, प्रजनन, इम्यून सिस्टम आदि को नुकसान पहुंचा सकता है।
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