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ऑर्डर-ऑर्डर : पंजाब के समलैंगिक जोड़े को मिला सुरक्षित आवास, ईसाई दंपती को बनाया पालक माता पिता

Tue, 03 Aug 2021 03:20 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Tue, 03 Aug 2021 03:20 AM IST
सार

  • पंजाब निवासी याची ने तर्क रखा था कि वे शादी करना चाहते हैं जिसका उनके पारिवारिक सदस्य विरोध कर रहे हैं और उनकी जान को खतरा है
  • कोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि दंपती ने बच्ची की अच्छी तरह देखभाल की है
  • अदालत ने इस बात पर गौर किया कि इस तुरंत की तलाक देने की प्रथा के कारण मुस्लिम महिलाओं को कभी भी घर से निकाले जाने का डर सताता रहता है

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Gay couple of Punjab got safe accommodation, Christian couple made foster parents by delhi court
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

हाईकोर्ट ने परिजनों के डर से भागकर दिल्ली आए समलैंगिक युगल के मामले का निपटारा कर दिया। अदालत को बताया गया कि दोनों को सुरक्षित आवास प्रदान कर दिया गया है। पंजाब निवासी याची ने तर्क रखा था कि वे शादी करना चाहते हैं जिसका उनके पारिवारिक सदस्य विरोध कर रहे हैं और उनकी जान को खतरा है। 

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न्यायमूर्ति मुक्ता गुप्ता के समक्ष मामले की सुनवाई के दौरान याची के अधिवक्ता ने बताया कि दोनों को दिल्ली सरकार की ओर से आवास प्रदान कर दिया गया है और वे सुरक्षित हैं। अदालत ने कहा अब याचिक पर आगे सुनवाई का कोई औचित्य नहीं है। ऐसे में वे याचिका का निपटारा करती हैं।
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अदालत ने हाल ही में दिल्ली पुलिस से याचिकाकर्ता समलैंगिक युगल को सुरक्षा व सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था। अदालत ने मयूर विहार फेज-एक के एसएचओ को निर्देश दिया था कि गैर सरकारी संगठन धनक आफ ह्यूमैनिटी के कार्यालय में रह रहे युगल को किंग्सवे कैंप स्थित सेवा कुटीर परिसर में सुरक्षित घर में शिफ्ट करे। साथ ही वहां पर पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध कराना भी सुनिश्चित करें। 
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अदालत ने सरकार को निर्देश दिया था कि समलैंगिक युगल को दो कमरे, एक शौचालय और रसोई वाला 60 वर्ग गज का सुरक्षित स्थान प्रदान करे। याचिका के अनुसार एक याचिकाकर्ता पंजाब के मोगा शहर का रहने वाला है, जबकि दूसरा पंजाब के लुधियाना स्थित मलौध का है। जिटोवाल काला स्थित एक धागा मिल में अगस्त 2020 में दोनों काम करते थे और धागा मिल के होस्टल में रहते थे। 

काम करने के दौरान दोनों पहले अच्छे दोस्त बने। इस बीच दोनों फिर एक-दूसरे से प्यार करने लगे और साथ रहने का फैसला कर लिया। पारिवारिक सदस्यों के आपत्ति करने पर वे भाग कर दिल्ली आ गए।

ईसाई दंपती को छह साल की बच्ची का पालक माता पिता घोषित किया

हाईकोर्ट ने ईसाई दंपती को उस छह साल की बच्ची का पालक माता पिता घोषित किया है जिसे उन्होंने जन्म के समय गलती से हिंदू एडॉप्शन एंड मेंटीनेंस एक्ट में गोद लिया था। कोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि दंपती ने बच्ची की अच्छी तरह देखभाल की है। 


कोर्ट ने गौर किया कि चूंकि बच्चा गोद लेने की प्रक्रिया में जूवेनाइल जस्टिस (जेजे) एक्ट के प्रावधानों का पालन नहीं किया गया है। इसलिए बच्ची को अमेरिका ले जाने के लिए जरूरी एनओसी जारी न करने के मामले में सेंट्रल एडॉप्शन रिसोस अथॉरिटी (सीएआरए) को गलत नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि बच्चा वैध रूप से गोद नहीं लिया गया। 


हालांकि कोर्ट ने सारी बातों पर गौर करने के बाद सीएआरए को दंपती को एनओसी तथा केंद्र सरकार को बच्ची का पासपोर्ट जारी करने का निर्देश दिया है। साथ ही कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि एनआरआई और ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया (ओसीआई) से संबंधित जेजे एक्ट के प्रावधान के पालन के लिए जोर नहीं डालेगा। 

न्यायमूर्ति आशा मेनन ने अपने हालिया फैसले में कहा कि सीएआरए ये सुनिश्चित करेगा कि दो साल तक उसके द्वारा अधिकृत एजेंसी तिमाही और छमाही अंतराल पर होम स्टडी रिपोर्ट उसे सौंपेगी। इसके साथ ही उन्होंने दंपती को लिखित आश्वासन देने के लिए कहा कि वे बच्ची का पालन-पोषण अपनी बच्ची की तरह करेंगे और उसकी शिक्षा व विकास के अवसर प्रदान करेंगे। इसके साथ ही वह उसकी स्वास्थ्य जरूरतों का ख्याल रखेंगे। इसके साथ ही वह अपनी दत्तक बेटी के अमेरिका नागरिकता भी हासिल करेंगे। 

हाईकोर्ट ने ये फैसला उस ईसाई दंपती की याचिका पर सुनाया है जिन्होंने खुद को बच्ची का पालक माता पिता घोषित करते हुए उन्हें बच्ची को अमेरिका ले जाने के लिए अनिवार्य एनओसी जारी करने का निर्देश सीएआरए को देने का आग्रह किया था। इसके साथ उन्होंने उनके नाम का जिक्र माता पिता के तौर पर करते हुए बच्ची का पासपोर्ट जारी करने का निर्देश केंद्र सरकार को देने का भी आग्रह किया था। 

 

तीन तलाक देने के आरोपी को जमानत देने से इनकार

अदालत ने पत्नी को तीन तलाक देने के आरोपी शख्स को जमानत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने इस बात पर गौर किया कि इस तुरंत की तलाक देने की प्रथा के कारण मुस्लिम महिलाओं को कभी भी घर से निकाले जाने का डर सताता रहता है। 

मामले में आरोपी शराफत हुसैन ने अपनी पत्नी को फोन पर तीन तलाक दिया था। इसके बाद पत्नी ने उसके खिलाफ 2019 में संबंधित कानून में मुकदमा करवाया था। 

तीस हजारी अदालत की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कामिनी लॉ ने आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि इस प्रथा के कारण मुस्लिम महिलाएं सालों से घर से निकाले जाने के डर में जी रही है। अगर उनका पति सालों पुरानी शादी को तीन तलाक कहकर तोड़ने का फैसला कर लेता है। 

अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि आरोपी की पत्नी ने अपने मोबाइल में उस बातचीत को रिकार्ड और सेव किया हुआ है जिसमें पति ने उसे तीन तलाक दिया था। अदालत ने कहा रिकार्डिंग पर विशेषज्ञों की रात जानने के लिए आरोपी के आवाज के नमूने लेने जरूरी हैं। 

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने कहा कि इस पृष्ठभूमि में वह आरोपी को जमानत देने की इच्छुक नहीं हैं। ये बात उन्होंने आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए 30 जुलाई के अपने फैसले में कही। 

याचिका पर सुनवाई के दौरान पीड़िता ने कहा कि आरोपी उसका व उसके डेढ़ माह के बच्चे का खर्च नहीं दे रहा है और उन्हें बेसहारा छोड़ दिया है। वहीं आरोपी के वकील माधव चौधरी ने कहा कि उनके मुवक्किल ने कभी अपनी पत्नी को तलाक नहीं दिया और वह अपनी गृहस्थी को बचाना चाहता है। वकील ने कहा इस शादी को बचाया जा सकता है, अगर पीड़िता अपने पति के साथ रहने के लिए तैयार है। 

दूसरी ओर सरकारी वकील ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा कि अगर आरोपी को जमानत दी जाती है तो वह 24 अगस्त 2021 को पुलिस को अपनी आवाज के नमूने नहीं देगा। 

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