दिल्ली: पटरी बाजार से शुरू हुआ गांधी नगर बाजार बना एशिया का सबसे बड़ा गार्मेट हब, प्रतिदिन औसतन 100 करोड़ का टर्नओवर
गांधीनगर बाजार छोटे ग्राहकों से लेकर बड़े ग्राहक, व्यापारियों के रोजगार और व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र है। यह ऐसा मार्केट है जो मौसम के अनुसार रंग बदलता है। गर्मी के दिनों में सूती व हल्के कपड़ों का केंद्र बन जाता है।
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कभी पटरी पर लगने वाला बाजार आज एशिया का सबसे बड़ा गार्मेंट हब बन गया है। एक हजार रुपये प्रतिदिन टर्न ओवर वाला बाजार अब औसतन 100 करोड़ रुपये का बाजार हो गया है। दिल्ली ही नहीं पूर्वांचल समेत अन्य राज्यों के 20 लाख से भी अधिक लोगों को रोजगार भी देता है। हम बात कर रहे है दिल्ली के गांधीनगर रेडीमेड गांधी बाजार की। जो पूर्वी की दिल्ली की पहचान देश-विदेश में भी बनाए हुए है।
गांधीनगर बाजार छोटे ग्राहकों से लेकर बड़े ग्राहक, व्यापारियों के रोजगार और व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र है। यह ऐसा मार्केट है जो मौसम के अनुसार रंग बदलता है। गर्मी के दिनों में सूती व हल्के कपड़ों का केंद्र बन जाता है। लखनऊ केचिकन शूट तो जयपुर की कशीदे वाले लेडी शूट की चमक बिखेरता है तो कोलकाता का सूती कपड़ा। वहीं सर्दी के दिनों में चीन समेत भारत में ही बने जैकेट, ऊनी कपड़ों से अटा रहता है।
पटरी बाजारवालों ने बसाया बाजार
दिल्ली में साप्ताहिक बाजार लगाने वाले लोगों ने इतने बड़े मार्केट को खड़ा करने में योगदान दिया है। रात के वक्त साप्ताहिक बाजार लगाते थे तो दिन में गांधी बाजार में कपड़ों की बिक्री करते थे। 1971 में स्थापित बाजार 1982 से व्यापारिक केंद्र बन गया। पंजाब में जब उग्रवाद का दौर आया है तो वहां के व्यापारी दिल्ली आकर बस गए और गांधी नगर में दुकान खरीदना शुरू कर दिए। इसी तरह राजस्थान से मारवाड़ी भी यहां पहुंचने लगे तो आसाम से भी व्यापारी दिल्ली पहुंच गए।
कभी रिहायशी इलाका होता था अब व्यापारिक केंद्र बना
गांधीनगर मार्केट कभी रिहायशी इलाका होता था। यहां रहने वाले शुरू में तो कोलकाता से कपड़ा लाते थे और अपने घरों से ही व्यापार करते थे। धीरे-धीरे यहां शटर लगने लगा यानी दुकान में तब्दील हो गया और दिन में मार्केट लगने लगा।
देशराज मल्होत्रा ने बताया कि दिल्ली की सड़कों पर रात में साप्ताहिक बाजार में यहां के लोग 1982 तक लगाते थे। बाद में बाजार का आकार बड़ा होते गया। सभी ने दुकानें गांधी नगर में खरीद ली और होलसेला का काम शुरू कर दिया। कोलकाता व लुधियाना से कपड़ा लाते थे और उसकी बिक्री करते थे। आज गांधीनगर से ही देश के हर कोने में माल भेजते हैं। कोविड की वजह से इन दिनों बाहर से व्यापारी नहीं आ रहे हैं। 50 प्रतिशत व्यापार कम हो गया है।
दो तरह का बिजनेस होता है
व्यापारी केके बल्ली ने कहा कि गांधीनगर में दो तरह का बिजनेस होता है। यहां एक तो मैन्यूफैक्चरर है। जो रेडीमेड कपड़ा बनाते है। डिजाइनर कपड़ें को बना कर बेचते है। दूसरे ट्रेडिंग का काम करने वाले है। लखनऊ, जयपुर, लुधियाना, उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों से आने वाले माल को मंगाते है और उसी को कुछ मुनाफा के साथ बिक्री करते हैं। ट्रेडिंग करने वाले जैकेट समेत अन्य रेडीमेड कपड़ा चीन से भी मंगाते हैं। जैसे माल आता है वैसे ही कुछ मुनाफे के साथ चला जाता है।
देश के हर कोने में होता है व्यापार
राम प्रसाद सांघी ने कहा कि गांधी नगर मार्केट से देश के हर कोने से व्यापार होता है। चूंकि यहां हर राज्य का मसहूर कपड़ा मिल जाता है, लिहाजा व्यापारियों को एक बड़ा बाजार मिल जाता है। यहां आकर व्यापारियों को ये मजबूरी नहीं होती है कि लखनऊ का मशहूर चिकन शूट वाला आइटम खरीदने जाना होगा या लुधियाना जाकर गर्म कपड़े। इसी मार्केट में होसियरी से लेकर वह हर आइटम मिल जाता है जिसकी जरूरत होती है। जिंस पैंट का भी एक बड़ा मार्केट है।
. 1982 में जब पंजाब में उग्रवाद शुरू हुआ तो मार्केट ने अपना आकार बड़ा कर लिया।
. त्योहारी सीजन में प्रतिदिन करीब 200 करोड़ रुपये का बाजार इस मार्केट में होता है।
. गांधीनगर में औसतन टर्न ओवर प्रतिदिन का 100 करोड़ रुपया है।
. अधिकृत रूप से 10 हजार से अधिक दुकानें अकेले इस मार्केट में है।
. अनधिकृत रूप से 15-20 हजार दुकानें प्रतिदिन इस मार्केट में खुलती है।
. हर तरह के रेडीमेड गार्मेट वाला एशिया का सबसे बड़ा मार्केट है।
. लोकल से लेकर ब्रांडेड कपड़ों का हब है गांधीनगर
क्या है व्यापारियों की सबसे बड़ी परेशानी
. अतिक्रमण की समस्या से व्यापारी परेशान रहते हैं।
. सफाई और शौचालय की समस्या भी है बड़ी।
. रेहड़ी-पटरी पर बाजार सजने से भी है परेशानी।
. छोटी-छोटी गलियों में दुकान व नालिया टूटी पड़ी है।
. बारिश के दिनों में हल्का जलजमाव होता है।
. कोविड की वजह से कैश मनी का अभाव है।
. कोविड की वजह से कारीगरों की है कमी।
. जीएसटी के नियमों से भी है परेशान व्यापारी।