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दुष्कर्म के झूठे आरोप से आरोपी की जिंदगी और कॅरियर तबाह हो जाता है: हाईकोर्ट

Tue, 17 Aug 2021 11:51 PM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Tue, 17 Aug 2021 11:51 PM IST
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False allegation of rape spoils life and career of accused
नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने कहा कि दुष्कर्म के झूठे आरोप से आरोपियों की जिंदगी और कॅरियर तबाह हो जाता है। दुष्कर्म के झूठे मामले में आरोपी अपना सम्मान खो देता है, अपने परिवार का सामना नहीं कर सकता और यह उसके जीवन के लिए कलंक है। अदालत ने कहा यह काफी दुर्भाग्यपूर्ण है कि आपसी मामलों को हल करने के लिए कुछ लोग दुष्कर्म के झूठे आरोप का सहारा लेते हैं। अदालत ने दुष्कर्म के मामले में दर्ज प्राथमिकी को समझौते को आधार पर रद्द करने से इनकार करते हुए उक्त टिप्पणी की।
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न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने अपने फैसले में कहा कि इस मामले में दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ दुष्कर्म का आरोप लगाया है। उन्होंने शिकायतकर्ता और आरोपी व्यक्तियों से समझौते को नकारते हुए कहा कि अपराध की गंभीर प्रकृति के कारण छेड़छाड़ और दुष्कर्म के झूठे दावों और आरोपों को सख्ती से निपटाने की जरूरत है।
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उन्होंने कहा कि इस तरह के मुकदमों को बेईमान लोगों द्वारा इस उम्मीद में दर्ज करवाया जाता है कि दूसरी पार्टी डर या शर्म से उनकी मांगों को मान लेगी। उन्होंने कहा जब तक गुनाहगारों को उनके कार्यों के परिणामों का सामना नहीं करना पड़ता, तब तक ऐसे तुच्छ मुकदमों को रोकना मुश्किल होगा।
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अदालत ने यह फैसला अमन विहार थाने में धारा 376 आईपीसी के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए सोमवार को दिया है। मामले में दोनों पक्षों ने 2019 में इसी थाने में एक-दूसरे के खिलाफ दुष्कर्म के क्रॉस केस दर्ज करवाए थे। एक मामले में एक वकील दूसरे वकील के खिलाफ शिकायतकर्ता है तो दूसरे मामले में आरोपी वकील की पत्नी शिकायतकर्ता है।
लोग दुष्कर्म के आरोप को सामान्य मान रहे हैं
अदालत ने आदेश में कहा कि यह दुखद है कि कानूनी बिरादरी से संबंधित अधिवक्ता दुष्कर्म के अपराध को तुच्छ बता रहे हैं। दुष्कर्म केवल एक शारीरिक हमला नहीं है, यह अक्सर पीड़ित के पूरे व्यक्तित्व पर विनाशकारी प्रभाव डालता है। यह गंभीर चिंता का विषय है कि लोग दुष्कर्म के आरोपों को बहुत ही सामान्य तरीके से ले रहे हैं।
अदालत ने कहा कि समझौते के आधार पर दुष्कर्म जैसे अपराधों से संबंधित प्राथमिकी को रद्द करने से अभियुक्तों को एक समझौते के लिए सहमत होने का पीड़ितों पर दबाव डालने के लिए प्रोत्साहित करने जैसा होगा। इससे आरोपी के लिए एक जघन्य अपराध करने के दरवाजे खुलेंगे जिसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।
पुलिस व कोर्ट का समय होता है बर्बाद
अदालत ने कहा व्यक्तिगत मामलों को निपटाने के लिए धारा 376 यानि दुष्कर्म के आरोप को लगाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा झूठे मामलों की जांच में पुलिस द्वारा लगाया गया समय के कारण उन्हें अन्य गंभीर अपराधों की जांच में कम समय मिलता है और इसके कारण पुलिस का जांच दोषपूर्ण हो जाती है और मामले में आरोपी कानून से बच जाते हैं।
इतना ही नहीं ऐसे झूठे मामलों की सुनवाई के चलते अदालत का मूल्यवान समय खराब होता है और इसके परिणामस्वरूप कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होता है। ऐसे में दुष्कर्म के झूठे आरोप लगाने वाले लोगों को खुली छूट की अनुमति नहीं दी जा सकती।

अदालत ने आदेश में कहा कि इससे दुख होता है कि धारा 354, 354ए, 354बी, 354बी और 354डी के तहत दुष्कर्म व छेड़छाड़ के झूठे मामलों में चिंताजनक वृद्धि हुई है। ये केवल आरोपी को फंसाने और उन्हें शिकायतकर्ता की मांगों के आगे झुकाने के लिए किया जा रहा है।
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