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फेफड़ों की समस्या को न करें नजरअंदाज, विशेषज्ञों ने दी जागरूक रहने की सलाह
Thu, 24 Dec 2020 08:50 AM IST
प्राची प्रियम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: प्राची प्रियम
Updated Thu, 24 Dec 2020 08:50 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : Pixabay
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सीओपीडी यानी क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज अपने आप में कोई एक बीमारी नहीं, बल्कि फेफड़े की गंभीर बीमारियों के लिए प्रयुक्त होने वाला शब्द है। इन बीमारियों में फेफड़ों में हवा के प्रवाह में रुकावट आती है।
डॉ. केके पांडे, एमडी व एफसीसीपी, शांति मुकंद हॉस्पिटल ने बताया कि धूम्रपान, औद्योगिक धुएं का एक्सपोजर, चूल्हे का लंबे समय तक उपयोग कुछ ऐसे कारण हैं, जिनके चलते सीओपीडी की समस्या हो सकती है। सीओपीडी को फेफड़ों का अटैक भी कहा जाता है।
उन्होंने कहा कि स्पेसर युक्त इन्हेलर या नया ब्रेथ एक्चुएटेड इन्हेलर इसके मरीजों को राहत दे सकता है। हालांकि स्थिति गंभीर होने पर मरीज को अस्पताल में भर्ती कराना ही सही विकल्प है। डॉ. अजमत करीम, एमडी चेस्ट, मेट्रो हॉस्पिटल ने इस बारे में जागरूकता की कमी पर चिंता जताई है।
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उन्होंने कहा कि जानकारी कम होने के कारण मरीज जब तक अस्पताल पहुंचता है, तब तक फेफड़ों को बहुत नुकसान पहुंच चुका होता है। जैसे बीपी और शुगर की जांच होती है, उसी तरह फेफड़ों की जांच भी नियमित तौर पर कराना जरूरी है। भारत विकासशील देश है और यहां प्रदूषण का स्तर ज्यादा है। ऐसे में यहां ज्यादा सतर्कता जरूरी है।
फेफड़ों का फंक्शन जानने के लिए स्पाइरोमेट्री जांच का सबसे आम तरीका है। इस टेस्ट से यह पता चलता है कि फेफड़े कितनी तेजी से और कितनी हवा निकाल सकते हैं। सीओपीडी का समय रहते इलाज न होने पर यह जानलेवा भी हो सकता है।
2016 ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज अध्ययन के अनुसार, सीओपीडी के मामलों में भारत चीन के बाद दुनिया में दूसरे स्थान पर है। हालांकि सीओपीडी से मौत के मामले में भारत पहले स्थान पर है।
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डॉ. केके पांडे, एमडी व एफसीसीपी, शांति मुकंद हॉस्पिटल ने बताया कि धूम्रपान, औद्योगिक धुएं का एक्सपोजर, चूल्हे का लंबे समय तक उपयोग कुछ ऐसे कारण हैं, जिनके चलते सीओपीडी की समस्या हो सकती है। सीओपीडी को फेफड़ों का अटैक भी कहा जाता है।
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उन्होंने कहा कि स्पेसर युक्त इन्हेलर या नया ब्रेथ एक्चुएटेड इन्हेलर इसके मरीजों को राहत दे सकता है। हालांकि स्थिति गंभीर होने पर मरीज को अस्पताल में भर्ती कराना ही सही विकल्प है। डॉ. अजमत करीम, एमडी चेस्ट, मेट्रो हॉस्पिटल ने इस बारे में जागरूकता की कमी पर चिंता जताई है।
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उन्होंने कहा कि जानकारी कम होने के कारण मरीज जब तक अस्पताल पहुंचता है, तब तक फेफड़ों को बहुत नुकसान पहुंच चुका होता है। जैसे बीपी और शुगर की जांच होती है, उसी तरह फेफड़ों की जांच भी नियमित तौर पर कराना जरूरी है। भारत विकासशील देश है और यहां प्रदूषण का स्तर ज्यादा है। ऐसे में यहां ज्यादा सतर्कता जरूरी है।
फेफड़ों का फंक्शन जानने के लिए स्पाइरोमेट्री जांच का सबसे आम तरीका है। इस टेस्ट से यह पता चलता है कि फेफड़े कितनी तेजी से और कितनी हवा निकाल सकते हैं। सीओपीडी का समय रहते इलाज न होने पर यह जानलेवा भी हो सकता है।
2016 ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज अध्ययन के अनुसार, सीओपीडी के मामलों में भारत चीन के बाद दुनिया में दूसरे स्थान पर है। हालांकि सीओपीडी से मौत के मामले में भारत पहले स्थान पर है।