चुनाव तक जुबानी जंग में कौन कितना फिसलेगा?
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सुन जा पिंग फा एक बहुत पुरानी किताब है। करीब ढाई हजार साल पहले चीन में लिपिबद्ध की गई यह किताब युद्ध की रणनीति और मनोविज्ञान के बारे में है लेकिन हैरानी की बात यह नहीं है कि धर्म से इतर कोई पुस्तक इतने दिन तक बची रही।
हैरानी तब होती है जब पता चलता है कि उसका एक-एक शब्द आज के माहौल में भी उतनी ही शिद्दत से लागू होता है बल्कि पसर कर उसका विस्तार जीवन के हर क्षेत्र पर चस्पां हो जाता है।
चुनाव भी एक युद्ध
आखिरकार जीवन संघर्ष का दूसरा नाम है, और फिर चुनाव भी तो एक युद्ध ही है। कुल जमा 80 पन्नों की इस किताब में एक पंक्ति है कि सिपहसालार की असल परीक्षा आसन्न पराजय और विकराल परिस्थितियों का सामना करते समय होती है।
अति-सामान्य दिखाई देने वाला यह वाक्य दरअसल सामान्य नहीं है और अगर इसका अनलिखा हिस्सा उसके साथ पढ लिया जाए तो बात साफ हो जाती है। यह कि अंतिम परिणाम इससे प्रभावित होता है। परिणाम का सकारात्मक या नकारात्मक होना ऐसे में ज्यादा मानी नहीं रखता।
अगर सुन जा पिंग फा को आधार माना जाए तो अगले दो-तीन महीने में होने वाले आम चुनाव के संदर्भ में हो रही क्रियाएं-प्रतिक्रियाएं अचानक राजनीतिक दलों की मानसिक स्थिति को खोलकर रख देती हैं।
कौन कहां खड़ा है?
सारी बेचैनी, सारा उत्साह, सब आशंकाएं, सारे डर और सारी कल्पनाएं एक झटके में बेपर्दा हो जाती हैं। समझ में आने लगता है कि कौन कहां खडा है।
सिपहसालारों या आज के संदर्भ में विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं को हटा दिया जाए तब देखिए कि वे चुनावी दंगल में ताल ठोंकते कहां खडे हैं और क्या बेचने की कोशिश कर रहे हैं।
हडबडी का पैमाना भी उसी से तय हो जाएगा और दूरगामी अंतिम परिणाम भी।
इस लिहाज से शायद कांग्रेस पार्टी को आगामी जंग के सिलसिले में सबसे अधिक नंबर देने पडेंगे।
कांग्रेस को दस में से आठ
असंयम की फुटकर और इक्का-दुक्का वारदातों के अलावा कांग्रेस ने बतौर राजनीतिक दल जिस तरह का बरताव रखा है उसकी सराहना की जानी चाहिए। उसे संभवतः सुन सू भी दस में से आठ नंबर दे देते।
दस साल की निर्बाध सत्ता जाने का डर मामूली नहीं होता, वह किसी भी पल बौखलाहट में तब्दील हो सकता है। बृहदारण्यकोपनिषद के उस भालू की तरह व्यवहार कर सकता है जिसका चट्टान से पांव फिसल गया हो और गहरी घाटी में गिरना तय हो।
अपनी गलती का सारा दोष चट्टान पर मढकर वो भालू ऊंची आवाज में अपशब्दों की बौछार करता हुआ जीवन और संसार से मुक्त हो गया था। कांग्रेस का पांव भी पहाडी की चोटी पर ऐसी ही एक चट्टान पर है और उसका फिसलना करीब-करीब तय है।
संयम से होगा फायदा
तो पार्टी क्या करे? उपनिषदीय भालू की तरह 128 साल बाद जीवन और संसार से मुक्ति प्राप्त कर ले, अपने पर कुढते या दूसरों पर दोष मढते? या चुप रहे, सोचे कि एक कदम पीछे खींचने से पचास साल का जीवन और मिल सकता है। इतने में तो कम से कम दस चुनाव हो लेंगे।
अपशब्द और उच्छृंखलता आपका पीछा करती है। संयम और वाक्-चातुर्य आपके साथ रहता है। अगर आखिरी दो हथियार बचे रहें तो यह संभावना बनी रहती है कि आसन्न पराजय अंतिम पराजय नहीं होगी।
अपशब्द अंसयम से ही उपजते हैं और हर बार, बल्कि बार-बार हमने उन्हें मुंह की खाते देखा है।
पता चल जाएगा ऐड़ा कौन!
गूंगी गुडिया, बाबा लोग, मौत का सौदागर या पचास करोड की गर्लफ्रेंड असंयम से उपजे शब्द समूह हैं, जिनकी सजा लोगों ने उनके आत्ममुग्ध वक्ताओं को दे दी है। जिन्हें नहीं मिली होगी, आगे मिल जाएगी।
इसी जीवन में हमारे देखते-देखते पता चल जाएगा कि ऐड़ा कौन है और थूक किसके मुंह पर गिरने वाला है।
ले-दे कर तीन महीने बचे हैं कांग्रेस के ताजा अवतार में। उसके बडकऊ नेता तीन महीना और संभाल लें और छुटकऊ ज्यादा उत्पात न करें तो संभव है उसकी उम्र 178 साल हो।
तब की तब देखेंगे, लेकिन यह अध्याय तो करीब-करीब समाप्त हुआ।