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दिल्ली: पत्नी अपने पति के घर में रहने के दौरान भी पति से भरण-पोषण की हकदार, अदालत ने किया स्पष्ट

Thu, 20 Jan 2022 07:52 PM IST
अनुराग सक्सेना अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: अनुराग सक्सेना Updated Thu, 20 Jan 2022 07:52 PM IST
सार

अदालत ने कहा कि भारतीय समाज में एक शिक्षित महिला को नियमित नौकरी करने की अनुमति नहीं दी जा रही क्योंकि उसे अपने वैवाहिक घर की जरूरतों को पूरा करना होता है। उन्होने मजिस्ट्रेट अदालत के उस आदेश को गलत ठहराया है जिसमें महिला की पति से अंतरिम गुजारा भत्ता संबंधी दायर याचिका खारिज कर दी थी।

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Delhi: Wife is entitled to maintenance from husband even while living in her husband's house the court clarified
कोर्ट का आदेश। - फोटो : amar ujala

विस्तार

अदालत ने स्पष्ट किया है कि एक पत्नी अपने पति के घर में रहने के दौरान भी पति से भरण-पोषण की हकदार है। अदालत ने यह आदेश पत्नी की भरण पोषण के लिए दायर याचिका को स्वीकार करते हुए दिया। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश मोनिका सरोहा ने कहा कि यह अविश्वसनीय है कि उसका पति उसे कोई भरण-पोषण नहीं दे रहा या उसकी जरूरतों का ध्यान नहीं रख रहा है। 

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अदालत ने कहा कि भारतीय समाज में एक शिक्षित महिला को नियमित नौकरी करने की अनुमति नहीं दी जा रही क्योंकि उसे अपने वैवाहिक घर की जरूरतों को पूरा करना होता है। उन्होने मजिस्ट्रेट अदालत के उस आदेश को गलत ठहराया है जिसमें महिला की पति से अंतरिम गुजारा भत्ता संबंधी दायर याचिका खारिज कर दी थी।

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महिला द्वारा पति पर घरेलू हिंसा का आरोप लगाने का है मामला

महिला ने अपने पति पर प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम (डीवी एक्ट) की धारा 12 के तहत शिकायत दर्ज कराई है। पति द्वारा आरोपों से इनकार करने के बाद निचली अदालत ने अंतरिम भरण पोषण के लिए आदेश देने से इनकार कर दिया था। अदालत ने कहा महिला स्नातक डिग्री धारक है और स्वयं अपना खर्च वहन कर सकती है।

सेशन कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि एक अधेड़ उम्र की महिला और तीन बच्चों की मां, जिसने अपने पति और ससुराल वालों पर घरेलू हिंसा की धमकी देने का आरोप लगाया है, उसे इस आधार पर भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता है कि उसने कई साल पहले बीए और बी.एड की डिग्री हासिल की थी।

कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने यह मानकर गलती की कि पति खर्च वहन कर रहा था क्योंकि वह वैवाहिक घर में रहती है। उन्होंने कहा कि यह हमारे समाज में कई घरों में एक आम परिदृश्य है, जहां घरेलू हिंसा की शिकार को बुनियादी जरूरतों से वंचित किया जाता है और उसे अपनी दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए एक रुपया नहीं दिया जाता है भले ही वह एक ही घर में रहती है।

विवाह में यौन संबंध रखने के अधिकार का दावा नहीं कर सकते

उच्च न्यायालय ने कहा कि विवाह में चाहे हम यौन संबंधों की अपेक्षा कितनी ही ऊपर ले जाएं, आप पार्टनर के साथ यौन संबंध रखने के अधिकार का दावा नहीं कर सकते। अदालत ने वैवाहिक दुष्कर्म को अपराधीकरण की श्रेणी में लाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की।

न्यायमूर्ति राजीव शकधर और न्यायमूर्ति सी हरिशंकर की पीठ के समक्ष न्याय मित्र रेबेका जॉन ने कहा, शादी में यौन संबंधों की उचित अपेक्षा होती है। पति या पत्नी को नागरिक उपचार का सहारा लेने का अधिकार है। जबरदस्ती और बल के आधार पर एक शारीरिक क्रिया बन जाती है, तो वह यौन क्रिया एक अपराध बन जाएगी। उन्होंने कहा वैवाहिक रिश्ते में हर आदमी को दंडित करने की मांग नहीं की जाती। पत्नी के साथ उसकी सहमति के खिलाफ यौन संबंध बनाने के कार्य को कानून के दायरे में लाने की मांग की जा रही है।

अदालत ने कहा कि कानून लैंगिक रूप से तटस्थ हो तो क्या यह असंाविधानिक हो सकता है। पीठ ने न्याय मित्र अधिवक्ता रेबेका जॉन से कहा मान लीजिए कि आईपीसी की धारा 375 (दुष्कर्म की परिभाषा) लैंगिक रूप से तटस्थ है और यह अपवाद कहता है कि जब दो पक्ष विवाहित हैं तो आपके मुताबिक क्या अपवाद तब भी असांविधानिक होगा।

अदालत के सवाल पर अधिवक्ता जॉन ने कहा वे शुक्रवार को इसका जवाब देने की कोशिश करेंगी। उन्होंने अपनी दलील में कहा कि वैवाहिक साथी के ना का अवश्य ही सम्मान किया जाना चाहिए। दुष्कर्म खुद में एक गंभीर अपराध है। उन्होंने कहा कि अपवाद 2 के तहत दी गई सुरक्षा अपवाद की प्रकृति में नहीं है बल्कि एक छूट है। ऐसे में अपवाद 2 को धारा से हटाया जाए। उन्होंने अपने तर्क के समर्थन में सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों का हवाला दिया।

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