Delhi : संचारी रोगों से ज्यादा प्रदूषण कम कर रहा लोगों का जीवन, जीवन प्रत्याशा पर पड़ता है सीधा असर
Delhi : दूरदराज के इलाकों तक प्रदूषण का असर साफ दिखाई दे रहा है। ऐसे में स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कुछ अध्ययन का हवाला देते हुए कहा कि संचारी रोग जैसे टीबी, एचआईवी या फिर युद्ध से भी ज्यादा प्रदूषण लोगों का जीवन कम कर रहा है।
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वायु प्रदूषण के बीच दिल्ली-एनसीआर में जहां सांसों का संकट बना हुआ है। वहीं, दूरदराज के इलाकों तक प्रदूषण का असर साफ दिखाई दे रहा है। ऐसे में स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कुछ अध्ययन का हवाला देते हुए कहा कि संचारी रोग जैसे टीबी, एचआईवी या फिर युद्ध से भी ज्यादा प्रदूषण लोगों का जीवन कम कर रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक (एक्यूएलआई) दर्शाता है कि पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) प्रदूषण संचारी रोग जैसे तपेदिक, एचआईवी/एड्स से भी ज्यादा जीवन प्रत्याशा कम करता है। यदि भारत प्रदूषण में कमी बनाए रखता है, तो इससे उल्लेखनीय स्वास्थ्य सुधार होगा। करीब 25% की कमी से राष्ट्रीय जीवन प्रत्याशा औसत 1.4 साल और दिल्ली के निवासियों के लिए 2.6 साल बढ़ जाएगी।
मेदांता अस्पताल के वरिष्ठ डॉ. अरविंद कुमार बताते हैं, वायु प्रदूषण में वृद्धि ने भारत में जीवन की गुणवत्ता और दीर्घायु दोनों पर एक असाधारण प्रभाव डाला है। दुनिया के दस सबसे प्रदूषित शहरों में से नौ भारत में हैं और यहां मानव जीवन प्रत्याशा 10 साल तक कम हो रही है। उन्होंने कहा कि दिल्ली या अन्य शहरों में प्रदूषण हमेशा रहता है। अभी मौसम शुष्क होने की वजह से धुंध के रूप में यह दिखाई दे रहा है।
हर साल प्रदूषण को लेकर हालात गंभीर होते हैं लेकिन ठोस उपायों पर कभी काम नहीं होता है। यह स्थिति तब है जब भारत की राष्ट्रीय स्वच्छ वायु रणनीति का लक्ष्य 2024 तक पार्टिकुलेट मैटर के उत्सर्जन को 30% तक कम करना है। उन्होंने बताया कि कुछ समय पहले शिकागो यूनिवर्सिटी का अध्ययन सामने आया था जिसमें पता चला कि प्रदूषण से उत्तर भारतीयों की औसतन आयु 7.6 वर्ष कम हो रही है। वहीं, दिल्ली या एनसीआर के लोगों की आयु करीब 10 वर्ष कम हो रही है।
अध्ययन में स्थिति गंभीर
- 2019 की एक लैंसेट रिपोर्ट में कहा गया था कि अकेले भारत में वायु प्रदूषण के कारण 16.7 लाख लोग मारे गए। यह किसी भी देश में वायु प्रदूषण से संबंधित मौतों की सबसे बड़ी संख्या थी।
- आईक्यू एयर डेटा के ग्रीनपीस दक्षिण पूर्व एशिया विश्लेषण ने एक रिपोर्ट में वायु प्रदूषण से 2020 में दिल्ली में लगभग 54,000 मौतों का दावा किया था। उस रिपोर्ट में कहा गया था कि दिल्ली में वायु प्रदूषक का स्तर निर्धारित डब्ल्यूएचओ सीमा से लगभग छह गुना अधिक है।
बहुत जरूरी होने पर बाहर निकलें तो मास्क लगाएं
एम्स के पूर्व निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया का कहना है कि बहुत जरूरी होने पर बाहर निकलें तो मास्क जरूर लगाएं। साथ ही, चिकित्सक से परामर्श के बाद ही किसी दवा का सेवन करें।
- पीएम 2.5 जहरीले पदार्थों से बना एक अत्यंत सूक्ष्म कण है जो फेफड़ों व अन्य अंगों में गहराई तक जाकर शरीर की सुरक्षा को तोड़ता है।
- दिल्ली का पीएम 2.5 स्तर 107.6 मापा गया है, जो डब्ल्यूएचओ की सुरक्षित सीमा की तुलना में 10 गुना अधिक है। लोगों को ज्यादा वक्त घर पर देना चाहिए।
प्रदूषण बना रहा नौनिहालों को सांस का मरीज
दिल्ली-एनसीआर का प्रदूषण नौनिहालों को सांस का मरीज बना रहा है। बीते कुछ दिन में दिल्ली के अस्पतालों में सांस की तकलीफ से परेशान बच्चों की संख्या में इजाफा हुआ है। इनमें से अधिकतर बच्चों को नेबुलाइजर देना पड़ रहा है। डॉक्टरों की माने तो बच्चे आसानी से प्रदूषण की चपेट में आ जाते हैं। इन्हें बुजुर्गों की तरह ही ज्यादा बचाव की जरूरत है।
मौसम में बदलाव के साथ ही दिल्ली में प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ा है। दिल्ली के कई इलाकों में प्रदूषण स्तर 400 तक पहुंच रहा है। ऐसे में बड़ी संख्या में बच्चे प्रदूषण की चपेट में आ रहे हैं। लोकनायक अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. सुरेश कुमार ने कहा कि अस्पताल आ रहे 15 साल से छोटे बच्चों की संख्या में 5-6 फीसदी की बढ़त दर्ज की जा रही है। यहां आ रहे ज्यादातर बच्चों को नेबुलाइजर देना पड़ रहा है। ज्यादातर बच्चे सांस लेने में दिक्कत के साथ आंखों में जलन की शिकायत करते हैं।