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दंगों का दर्दः खौफनाक खामोशी बयां कर रही है जुल्म की दास्तान, चौक-चौराहों पर दशहत कायम

Sun, 21 Feb 2021 03:37 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली  
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली   Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sun, 21 Feb 2021 03:37 AM IST
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Delhi News : victims remember the black days of blood and violence
दंगों के आरोपी ताहिर हुसैन का घर... - फोटो : अमर उजाला

सालभर बाद भी दंगों की दहशत उत्तर-पूर्वी दिल्ली की गलियों और चौक-चौराहों पर कायम है। हर तरफ पसरी खौफनाक खामोशी दंगों की दास्तान बयां कर रही है। दंगों के सवाल से हर चेहरा बेचैन हो उठता है। खासतौर से उन इलाकों में, जिन्हें दंगों ने गहरे जख्म दिए हैं। एक साल पहले तक गुलजार रहने वाली वहां की गलियां अब तक सूनी हैं। किशन कुमार और अभिषेक पांचाल की रिपोर्ट...

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पुराने जख्मों को कुरेद रही है इमारत
शनिवार सुबह करीब 10 बजे भजनपुरा को करावल नगर से जोड़ने वाली मुख्य सड़क की ज्यादातर दुकानें खुल चुकी थीं। लोगों की चहलकदमी भी शुरू हो गई थी, लेकिन चौक से बमुश्किल 200 मीटर दूर इलाके की सबसे ऊंची इमारत के नजदीक पहुंचने पर जिंदगी जैसे ठहर सी गई। दंगा फैलाने के लिए बदनाम हुई चार मंजिला इमारत के आसपास पसरी खामोशी दंगे की दर्दनाक दास्तान बयां कर रही थी।
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इमारत का मुख्य दरवाजा बंद था और बराबर की दुकान के शटर से झांकते दो चेहरे दंगे का नाम सुनते ही सहम गए। लड़खड़ाती हुई जुबां से सिर्फ इतना कहा...अब यहां कोई नहीं रहता है। मकान खाली है। इससे ज्यादा कुछ नहीं पता, जबकि अंदर से बंद दरवाजे से इमारत में कुछ लोगों के होने का पता चल गया। इमारत के पड़ोस में रहने वाले लोग भी दंगों को लेकर सहज नहीं दिखे।
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बहुत कुरेदने पर सामने बने मकान में रहने वाले अरुण कुमार ने बताया कि यहीं से दंगाइयों ने पूरे इलाके में कहर बरपाया था। पेट्रोल बम से लेकर, तेजाब, पत्थर और गोलियां बरसाई गईं। यदि उस समय कॉलोनी के मुख्य दरवाजे को मजबूत लोहे की जंजीर से नहीं बांधा होता तो शायद अब भी इस मोहल्ले के निवासी नहीं होते। इलाके के लोगों को अब इस इमारत से कोई मतलब नहीं रहा। इसमें कौन आ रहा है, कौन जा रहा, इसका पता करने की कोई कोशिश भी नहीं करता है।

पार्किंग को बनाया बैंक्वेट हाल, फिर भी बेरौनक
दंगों में शिव विहार की एक पार्किंग की भी दर्दनाक तस्वीर सामने आई थी। दंगाइयों ने करीब 60 गाड़ियों में आग लगा दी थी। अब तक इस पार्किंग की रौनक नहीं लौटी है। शनिवार को बमुश्किल तीन-चार वाहन ही खड़े दिखे। अब लोग इससे मुंह मोड़ चुके हैं। डर इसी बात का है कि कहीं एक बार फिर वही तस्वीर न देखनी पड़ जाए। पार्किंग का धंधा बंद होने से इसका ढांचा बदल दिया गया।

इसकी जगह तीन-चार महीने पहले बैंक्वेट हॉल बना दिया गया, लेकिन अब तक एक भी बुकिंग नहीं हुई। इसके मालिक ठाकुर ब्रह्म सिंह परिहार ने बताया कि पहले यहां करीब 60 गाड़ियां खड़ी हो जाती थी, लेकिन अब इसमें तीन से चार गाड़ियां हैं। लोग अब अपनी गाड़ियां खड़ी करने से डरने लगे हैं। बैंक्वेट हॉल बना देने के बाद भी लोग इसमें दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। डर की वजह से यहां बुकिंग के लिए कोई तैयार नहीं है।
 

मजार भले जलाई हो, बाबा के प्रति आस्था अब भी जिंदा है...

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के भजनपुरा चौक पर शनिवार सुबह करीब 11 बजे वाहनों की भीड़ थी। मेट्रो का काम होने के कारण वाहन थोड़ा धीमा चल रहे थे। इस सबके बीच चौक पर चांद बाबा की मजार पर कुछ लोग फूल और धूप बत्ती बेचते नजर आए। दो महिलाएं मत्था टेकती भी दिखाई दी। मजार की तीनों दीवारों पर अब भी दंगे के निशान नजर आते हैं।

मजार की देखभाल करने वाली भूरी बताती हैं कि 25 फरवरी की दोपहर दंगाइयों की भीड़ मजार की ओर बढ़ रही थी। वह अपनी जान बचाने के लिए सड़क की दूसरी तरफ भाग गई, जहां से उन्होंने मजार को दंगाइयों की भेंट चढ़ते देखा। तोड़फोड़ करने के बाद भीड़ वहां से चली गई। बाबा में दोनों समुदायों के लोगों की आस्था है। दंगे के बाद भी इसमें ज्यादा बदलाव नहीं आया। इस वक्त भी दोनों समुदायों के लोग यहां मत्था टेकते हैं। हालांकि, अब तक मजार का जीर्णोद्घार नहीं हो सका है। इसके लिए धीरे-धीरे कार्य चल रहा है।
फिलहाल टाइल लगाई गई है।

स्कूल फिर से बन गया, अब बच्चों का इंतजार
वजीराबाद रोड से शिव विहार की ओर जाने वाले प्रमुख रास्ते पर बाबू नगर में डीआरपी कांवेंट स्कूल है। शनिवार दोपहर के करीब एक बजे स्कूल का मुख्य दरवाजा खुला था। अंदर प्रवेश करने पर दिल्ली पुलिस का एक जवान तैनात दिखा। वहां स्कूल के मैनेजर और व्यवस्थापक से मुलाकात हुई। व्यवस्थापक धर्मेश शर्मा ने बताया कि 24 फरवरी को स्कूल के गार्ड से उन्हें जानकारी मिली कि बराबर की एक इमारत से 100 से अधिक दंगाई उनके स्कूल में प्रवेश कर उपद्रव मचा रहे हैं। उन्होंने तुरंत गार्ड को वहां से निकलने के लिए कहा। 

29 फरवरी को वह स्कूल में पहुंचे, जहां सभी कक्षाओं का सामान जला हुआ था। मुख्य गैलरी को भी पूरी तरह आग के हवाले कर दिया गया। पत्थरों से सभी शीशे तोड़ दिए गए। यह देखकर वह काफी विचलित हो गए थे। आसपास रहने वाले लोगों ने उनकी हिम्मत बढ़ाई और स्कूल को दोबारा संवारने के लिए उन्हें प्रेरित किया। करीब छह महीने तक चले काम के बाद वह स्कूल को नया रूप दे पाए। अब एक साल बाद स्कूल फिर से खुल रहा है। उन्हें उम्मीद है कि कुछ दिनों में बच्चे पहले की तरह यहां आकर पढ़ाई करेंगे।

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