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दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा: अविवाहित बेटियों का भरण-पोषण और शादी पिता का कर्तव्य, उनकी देखभाल से मुंह नहीं फेर सकते
Mon, 10 Jan 2022 07:33 PM IST
शाहरुख खान
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: शाहरुख खान
Updated Mon, 10 Jan 2022 07:33 PM IST
सार
अदालत ने इस मामले में पिता को अपनी दो बेटियों की शादी के खर्च के लिए क्रमश: 35 लाख व 50 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया है। पीठ ने यह निर्देश फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ पत्नी द्वारा दायर एक अपील स्वीकार करते हुए दिया है।
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फाइल फोटो
- फोटो : PTI
विस्तार
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपनी अविवाहित बेटियों का भरण-पोषण करने साथ-साथ उनकी शादी करना पिता का कर्तव्य है। कानून में इसे स्पष्ट रूप से मान्यता प्रदान की गई है। ऐसे में एक पिता अपनी अविवाहित बेटियों की देखभाल करने की जिम्मेदारी से बच नहीं सकता है और उनकी शिक्षा और शादी के खर्चों समेत उनकी देखभाल करना उसका कर्तव्य और दायित्व है।
अदालत ने यह टिप्पणी करते हुए एक मामले में पिता को बेटियों के विवाह का खर्च प्रदान करने का निर्देश देते हुए की। न्यायमूर्ति विपिन सांघी और न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की पीठ ने कहा कि 'कन्या दान' एक हिंदू पिता का गंभीर और पवित्र दायित्व है, जिससे वह पीछे नहीं हट सकता।
अदालत ने इस मामले में पिता को अपनी दो बेटियों की शादी के खर्च के लिए क्रमश: 35 लाख व 50 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया है। पीठ ने यह निर्देश फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ पत्नी द्वारा दायर एक अपील स्वीकार करते हुए दिया है।
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फैमिली कोर्ट ने क्रूरता के आधार पर पत्नी को तलाक प्रदान कर दिया था लेकिन उसे और उसकी दो वयस्क बेटियों के लिए भरण-पोषण का आदेश देने से इनकार कर दिया गया था। पिता ने तर्क रखा कि सभी बच्चे बड़े है और अपना भरण पोषण करने में समर्थ है।
पीठ ने कहा भारतीय समाज में बच्चे के जन्म से ही बेटी की शादी को सबसे अहम माना जाता है। माता-पिता शुरू से ही अपनी बेटियों की शादी के लिए गहने और पैसे बचाना शुरू कर देते हैं। ऐसे में दोनों व्यस्क बेटियां भी अपनी शादी के खर्च के लिए भरण-पोषण राशि की हकदार है।
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अदालत ने यह टिप्पणी करते हुए एक मामले में पिता को बेटियों के विवाह का खर्च प्रदान करने का निर्देश देते हुए की। न्यायमूर्ति विपिन सांघी और न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की पीठ ने कहा कि 'कन्या दान' एक हिंदू पिता का गंभीर और पवित्र दायित्व है, जिससे वह पीछे नहीं हट सकता।
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अदालत ने इस मामले में पिता को अपनी दो बेटियों की शादी के खर्च के लिए क्रमश: 35 लाख व 50 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया है। पीठ ने यह निर्देश फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ पत्नी द्वारा दायर एक अपील स्वीकार करते हुए दिया है।
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फैमिली कोर्ट ने क्रूरता के आधार पर पत्नी को तलाक प्रदान कर दिया था लेकिन उसे और उसकी दो वयस्क बेटियों के लिए भरण-पोषण का आदेश देने से इनकार कर दिया गया था। पिता ने तर्क रखा कि सभी बच्चे बड़े है और अपना भरण पोषण करने में समर्थ है।
पीठ ने कहा भारतीय समाज में बच्चे के जन्म से ही बेटी की शादी को सबसे अहम माना जाता है। माता-पिता शुरू से ही अपनी बेटियों की शादी के लिए गहने और पैसे बचाना शुरू कर देते हैं। ऐसे में दोनों व्यस्क बेटियां भी अपनी शादी के खर्च के लिए भरण-पोषण राशि की हकदार है।
पीठ ने पिता की वित्तीय स्थिति को देखते हुए कहा कि अविवाहित बेटियों की शादी के खर्च का भुगतान करने से इनकार करना सबसे दुर्भाग्यपूर्ण है और स्वीकार्य नहीं है। पीठ ने कहा हम इस तथ्य से अपनी आंखें बंद नहीं कर सकते हैं कि दोनों बेटियां, वास्तव में विवाह योग्य उम्र की हैं।
छोटी बेटी की शादी तय है, और बड़ी बेटी को भी उसकी शादी के लिए धन की आवश्यकता होगी। मामले में वह 3 बच्चों का पिता है और उनके प्रति उसकी जिम्मेदारी है। केवल यह कहना कि बेटियां बड़ी हैं और आय अर्जित कर रही हैं इस कारण विवाह खर्च न देना उचित रवैया नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि नैतिक और कानूनी रूप से, माता-पिता दोनों का दायित्व है कि वे अपने बच्चों को भरण-पोषण के रूप में अपने जीवन की स्थिति के अनुसार सुविधाएं प्रदान करें। मात्र माता-पिता के अलग होने के आधार पर खर्च से बचले का बहाना ठीक नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि बेटियां बड़ी उम्र की हो सकती हैं, लेकिन पिता उसके साथ रिश्ते और साथ में जुडे कानूनी और नैतिक दायित्व यह बताने के लिए पीछे नहीं हट सकते कि वह उनकी देखभाल नहीं करेंगे। अदालत ने कहा एक अविवाहित बेटी भले ही नौकरी कर रही हो यह नहीं माना जा सकता है कि उसके पास अपने वैवाहिक खर्चों को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं।
पीठ ने फैमिली कोर्ट के उस निष्कष को खारिज करते हुए कहा कि बेटियां आवेदन दाखिल करने की तारीख तक बालिग थीं, इसलिए वे किसी भी भरण-पोषण की हकदार नहीं है।
छोटी बेटी की शादी तय है, और बड़ी बेटी को भी उसकी शादी के लिए धन की आवश्यकता होगी। मामले में वह 3 बच्चों का पिता है और उनके प्रति उसकी जिम्मेदारी है। केवल यह कहना कि बेटियां बड़ी हैं और आय अर्जित कर रही हैं इस कारण विवाह खर्च न देना उचित रवैया नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि नैतिक और कानूनी रूप से, माता-पिता दोनों का दायित्व है कि वे अपने बच्चों को भरण-पोषण के रूप में अपने जीवन की स्थिति के अनुसार सुविधाएं प्रदान करें। मात्र माता-पिता के अलग होने के आधार पर खर्च से बचले का बहाना ठीक नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि बेटियां बड़ी उम्र की हो सकती हैं, लेकिन पिता उसके साथ रिश्ते और साथ में जुडे कानूनी और नैतिक दायित्व यह बताने के लिए पीछे नहीं हट सकते कि वह उनकी देखभाल नहीं करेंगे। अदालत ने कहा एक अविवाहित बेटी भले ही नौकरी कर रही हो यह नहीं माना जा सकता है कि उसके पास अपने वैवाहिक खर्चों को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं।
पीठ ने फैमिली कोर्ट के उस निष्कष को खारिज करते हुए कहा कि बेटियां आवेदन दाखिल करने की तारीख तक बालिग थीं, इसलिए वे किसी भी भरण-पोषण की हकदार नहीं है।